श्री जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में जयधुरंधर मुनि के सानिध्य में जयपुरंदर मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र का वांचन करते हुए कहा भगवान महावीर ने समस्त जीवों के कल्याण के लिए ज्ञान, दर्शन, चरित्र रूपी मोक्ष मार्ग का प्रतिपादन किया।
जो साधक मोक्ष मार्ग पर कदम अग्रसर कर देते हैं, वह एक न एक दिन अवश्य ही मोक्ष रूपी मंजिल को प्राप्त कर लेते हैं। सम्यक ज्ञान और क्रिया के समन्वय के बिना मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती।
केवल बाह्य धर्म से , धर्म का प्रतिपादन करने मात्र से कुछ नहीं होता, धर्म को आचरण में उतारना जरूरी है। संग्रहवृत्ति आसक्ति का कारण होती है। अतः आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति कल की चिंता न करते हुए वर्तमान में जीता है वही संग्रह वृत्ति का त्याग कर सकता है।
जिस प्रकार कोई व्यक्ति विकृतियों का सेवन करने से रोग्रास्त बनकर मृत्यु को प्राप्त होता है। उसी प्रकार अपने इंद्रियों और मन पर नियंत्रण न रख पाने वाला व्यक्ति दुख प्राप्त करता है। मनुष्य बहुमूल्य पूंजी के समान है जिसके महत्व को समझ कर पूंजी में वृद्धि करने का लक्ष्य होना चाहिए।
व्यापार में मूल पूंजी के नाश होने जैसी स्थिति कभी नहीं आनी चाहिए। मनुष्य भव को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। समुद्र के तुलना में पुष्य अग्रभाग पर स्थित जल बिंदु जिस प्रकार अत्यंत तुच्छ है उसी प्रकार दिव्य सुखों के सामने मनुष्य संबंधी कामभोग अत्यंत तुच्छ होते हैं।
विवेकशील व्यक्ति को धिरता के साथ अपने प्रज्ञा से विवेकशील बनते हुए अधर्म का त्याग कर धर्म का आराधन करना चाहिए। मुनिवृंद के सानिध्य में 25, 26, 27 अक्टूबर को दीपावली पर्व के उपलक्ष में सामूहिक तेले तप का आयोजन किया गया है।