हमारा यह भारत देश अनेक धर्मों और संस्कृतियों का समन्वय है। हर धर्म – संस्कृति व सभ्यता से जुड़े अनेक पर्व यहां – मनाए जाते हैं। अधिकतर पर्वों व त्यौहारों पर तन को सजाया जाता है। पर्यूषण पर्व आत्मा को सजाने के पर्व हैं। यह डॉ. वरुण मुनि ने जैन भवन साहुकारपेट में प्रवचन करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा पर्युषण पर्व ‘आत्म जागरण के पर्व हैं। इन पर्व दिनों में साधु-साध्वी, श्रावक व श्राविकाएं यथाशक्ति जप-तप, स्वाध्याय, ध्यान, प्रतिक्रमण आदि की आराधना करते हैं। भले ही मूर्तिपूजक हों या स्थानकवासी अथवा तेरापंथी सभी संप्रदायों में धूमधाम से इस आध्यात्मिक पर्व की आराधना होती है। आठ दिनों के इस पर्व के अंतिम दिन महापर्व संवत्सरी मनाया जाता है। संवत्सरी से अगले दिन ही ‘दशलक्षण पर्व’ प्रारंभ हो जाते हैं। जिन्हें दिगंबर, आम्नाय में पर्यूषण के रूप में मनाया जाता है।
इन अठारह दिनों में जैन मतालंबी और अन्य अनेक श्रद्धालु भाई-बहने पौषध-उपवास, क्षमा, सत्य, शौच व आत्म आलोचना पूर्वक इन पर्वों की साधना करते हैं। श्रीसंघ के उपाध्यक्ष एस. महावीर बोकडिय़ा एवं बी. गौतमचन्द मुथा ने बताया कि प्रतिदिन प्रात: जैन भवन, साहुकारपेट में 6 से 7 बजे तक प्रार्थना सभा, तत्पश्चात 8.31 से 10.31 तक प्रवचन सभा का आयोजन होगा। जिसमें श्रीमद् अन्तकृत सूत्र की बड़े ही रोचक ढंग से वाचना फरमाएंगे। दोपहर 2 से 3 बजे उप प्रवर्तक पंकज मुनि की निश्रा में रूपेश मुनि श्री कल्प सूत्र का वाचन करेंगे। तत्पश्चात 3 से 4 बजे तक आठों ही दिन बहू मंडल, महिला मंडल एवं युवती मंडल द्वारा विविध धार्मिक प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। लोकेश मुनि ने बताया कि आठ दिन तक नवकार महामंत्र का जाप 24 घंटे गतिमान रहेगा। जाप समिति के चेयरमैन तारेश बेताला ने सभी भाई-बहनों से अधिक से अधिक जाप व प्रवचन में भाग लेने की विनम्र अपील की।























