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करुणा के आते ही भगवान बुद्ध की जीवन गाथा याद आ जाती है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे कि आज भगवान पार्श्वनाथ का निर्माण कल्याणक है, उसमें हमारे को बहुत ही सुचारू ढंग से प्रवचन के माध्यम से समझाया एवं बताया कि भगवान पार्श्वनाथ के सहायक देवियां कितनी है और बताया कि 216 प्लस 218 देवियां हैं एवं उनके बारे में बहुत सारी जानकारियां दी। आज दया भी कराई उसमें शो 100 भाइयों और बहनों ने दया व्रत क्या। अब देखिए की करुणा ह्रदय का तीसरा दिव्य भाव है करुणा प्रेम और मैत्री की सार्थक परिणति है।  करुणा प्रेम का विस्तार ही है करुणा के आते ही भगवान बुद्ध की जीवन गाथा याद आ जाती है। जिनके जीवन की नींव ही करुणा थी नेमिनाथ कि उस करुणा का स्मरण कीजिए जिस से प्रेरित होकर उन्होंने बालों में बंद जानव...

खुद को बदलकर, हर बदलाव की शुरुआत करो : देवेंद्रसागरसूरि

जीवन हमेशा एक-सा नहीं रहता। परिवर्तन को स्वीकार कर ही हम अपनी हताशा-निराशा से उबर सकते हैं और समय के साथ चलकर अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं, उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन मूर्तिपूजक संघ में प्रवचन देते हुए कही , वे आगे बोले कि परिवर्तन को स्वीकारना ही हमें गतिशील बना सकता है। हम समय की ऐसी रेलगाड़ी के साथ-साथ चल रहे हैं, जिसमें रुकने का मतलब पिछड़ जाना होता है। जीवन के सफर का वास्तविक आनंद हम तभी उठा सकते हैं, जब हम समय के साथ चलें, उन्होंने यह भी कहा कि बदलाव की शुरुआत हमें खुद से करनी चाहिए, अगर हम खुद में बदलाव ला सकते है तभी हम इस दुनिया को बदल सकते है। एक कहावत के अनुसार “हर बदलाव की शुरुआत कर, तू खुद को बदलकर, जमाने को बदलना चाहता है, तो खुद से पहल कर। कोई इंसान परफेक्ट नहीं होता है, उसके अंदर कुछ खामियां अवश्य होती है। उसे अपनी कमियो...

ह्रदय का दूसरा भाव है प्रसन्नता: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसा कि हम सभी जानते हैं की ह्रदय का दूसरा भाव है प्रसन्नता। हर हाल में खुश रहना अभाव में भी और प्रभाव में भी खुद को लाफिंग बुद्धा बनाना ही सच्ची प्रसन्नता है अगर भावो में प्रमोद भावना आए तो मानवता दुखी होगा। आप बड़े जनों को देखकर नदी में परेशान हो हमेशा आधा गिलास भराही देखें अवगुणों कमियों पर गौर ना करें सकारात्मक सोच सकारात्मक नजरिया आपस में तनाव से बचने का अचूक मंत्र है। जीवन का मार्ग कुछ ऐसा है यहां पर कदम कदम पर दुख पीड़ा और कसक है माना कि दुनिया देखती है फिर भी आनंद रहने का अवसर जरूर बनाएं खुद को हमें चिंता की जनता में ना जलाए खुद को माचिस की तिल्ली ना बनाएं कि थोड़ा से संघर्ष लगते ही क्रो...

मन को समझाकर साधना के पथ पर आगे ले जाये

मुनि *विरति* का उपदेश करे, विरति यानी *त्याग* का उपदेश करे , मन को समझाकर साधना के पथ पर आगे ले जाये वह साधक, मन के अनुसार चले वह विराधक यह बात बताते हुए *पूज्य श्री प्रवर्तक प्रकाश मुनि महारासा* ने अपनी मधुर वाणी में फरमाया कि.. भगवान की आज्ञा का पालन करने वाला आराधक, साधक है ,परमात्मा त्याग का उपदेश करते है भोग का नही । *अकडं करिष्यामि इति मंद माणे*- जो नही किया वह मुझे करना है, आज तक जिसने नही किया वो में करूँगा, रिकार्ड को तोडूंगा। यह शब्द समझाता है कि आपमे *अभिमान* है , अभिमान है मतलब *क्रोध* भी है । भोगी जीव मानता नही, त्यागी सोचता है कि त्याग कर लो कल किसने देखा !! हमारा शब्द *कषाय* से जुड़ा रहता है ,कषाय(क्रोध,मान, माया लोभ,राग द्वेष)भीतर से काम करती है जब चोट पड़ती है तो बाहर आती है। भोगी प्राणियों का विनाश करता है, छेदता है, लुटाता है , मानसिक दुख देता है । किसी शायर ने कहा है कि &...

मन चंगा कसोटी में गंगा

  *आश्रव*- आत्मा में कर्मो का आना, संसार मे हर स्थान पाप का है, जंहा पाप न होता हो । यह पाप, झूठ, चोरी कब तक करुंगा यह कब छूटेगा सोचने वाला आश्रव के स्थान पर *संवर* में है। महत्व है.. *विचारों का* इसलिए कहावत है *मन चंगा कसोटी में गंगा*। स्थान का प्रभाव होता है ,क्षेत्र का महत्व है। धर्म स्थान में रहा हुआ जीव कर्म बांधता है, और संसार में रहने वाला कर्म से छुट जाता है। बैठा यहाँ धर्म स्थान में है और मन वहाँ दुसरी जगह चल रहा है, आँख से देख रहा हे पर भाव से जुड़ा नहीं, देखना अलग, विचार करना अलग- अलग।   🔰नाटक, नाटक करते आये, नाटक देखते आये अनुमोदन करते आये, पैसा बर्बाद, समय बर्बाद तुमको रस आ रहा है। जहाँ जीव की विराधना हो वहाँ *आरम्भ*। करे, करावे, अनुमोदन करे वहाँ आरंभ है। कर्म प्रकृति, 25 क्रिया का थोकड़ा दो चीज सीखो। इससे आरंभ में जाने से कर्म बंध से रोकती है पश्च्याताप करने से कर्म ...

त यानि तत्काल प यानि पवित्र, जिसका सेवन करने से तत्काल आत्मा पवित्र बनती है: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बन्धुओ तप स्वरूप का निरुपण करते हुए बताया, त यानि तत्काल प यानि पवित्र, जिसका सेवन करने से तत्काल आत्मा पवित्र बनती है। नव तत्वों में संवर और निर्जरा दोनो बड़े महत्वपूर्व है जिसे मोक्ष जाना है। उसे सवंर, निर्जरी को धारणा होगा। उत्तराध्ययन में एक उदाहरण है कि तालाब में कई छिद्रों से पानी आ रहा है तालाब कि सफाई के लिए सभी छिंद्रो को बन्द करके पानी उलीछ कर बाहर निकालना होगा और फिर सूर्य के ताप से तालाब को सुखा कर साफ किया जा सकता है। वैसे ही आत्मा के आस्त्रव छिद्रो को बन्द कर सचित कर्मो की निर्जरा करनी होगी और तप द्वारा आत्मा को पवित्र करना होगा । चार्तुमास यानि वर्षाकाल तपस्या का काल है। भगवान कहते है साधु के समान गृहस्थ को भी गमनागमन न करके घर या उपासरे में रहते हुए ज्यादा से ज्यादा तपस्या करनी चाहिए। तपस्या करने वाले क...

प्रभु को भी प्रभु बनने में आनंद नहीं: मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा.

        श्री राजेन्द्र भावन चेन्नई मे विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प. पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म. सा. के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास चल रहा है। ~ प्रभु महावीर स्वामी ने अहिंसा धर्म की पालना संसार के मान, पूजा, प्रतिष्ठा के लिए नहीं किंतु स्वयं के ज्ञान, दर्शन, गुणों को पाने के लिए की थी। ~ प्रभु को भी प्रभु बनने में आनंद नहीं, किंतु प्रभुता प्रकट करने में आनंद है। ~ जिस मानव का निर्णय स्पष्ट है उसके लिए प्रभुता प्रकट करना अत्यंत सरल है। ~ अज्ञानी मानव के लिए स्वयं के जीवन में परिवर्तन लाना कठिन है किंतु समझदार के लिए मूलभूत परिवर्तन संभव है। ~ जो मानव इस अमूल्य मानव भव का मूल्य समझ गया है वह हर पल गुणों को पाने के लिए ही प्रब...

चित्त की मलीनता न हो : जिनमणिप्रभसूरिश्वर

★ कषायों से दूर होने की दी प्रेरणा Sagevaani.com@चेन्नई: श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के तीसरे अध्याय की गाथा का विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य भव को सुलभ बनाने के चार सूत्र है- दान रुचि, साधर्मिक भक्ति, अल्पकषाय और मध्यम गुण। दान रुचि यानि हमारे अन्दर में देने का भाव, जो है वो देने का भाव। कोई भी व्यक्ति खाली नहीं है, हो सकता है उसके पास में पैसे नहीं है, पर उसके पास में जीवन है, समय है, आँखें है, हाथ इत्यादि अवयव है, बुद्धि है, विवेक है। जो है मेरे पास उसे उन्हें अर्पण करने का भाव रखूं, जिन्हें इसकी जरूरत है। उससे मुझे आनन्द की प्राप्ति होती है। साधर्मिक व्यक्ति के प्रति दया करुणा के भाव रखना चाहिए...

शिक्षा को बढ़ावा दिया अच्छी बात है, लेकिन संस्कृति को बचाना भूल गए: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

भारत विकास परिषद के संस्कार शिविर में जैन साध्वियों ने बताया कि कैसे बचाए जा सकेंगे मानवीय मूल्य शिवपुरी। संस्कार रहित शिक्षा उस एटम बम के समान है जिसका रचनात्मक उपयोग की अपेक्षा विध्वंशात्मक उपयोग होने की संभावना अधिक है। शिक्षा को बढ़ावा मिले अच्छी बात है, लेकिन शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दिए जाने चाहिए। हमने शिक्षा को तो बढ़ावा दिया है, लेकिन संस्कृति को बचाना भूल गए हैं। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय पोषद भवन में भारत विकास परिषद द्वारा आयोजित संस्कार शिविर में उद्बोधन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने पारिवारिक और मानवीय मूल्यों तथा बच्चों में संस्कार का बीज कैसे रोपें, इस पर ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया। प्रारंभ में भारत विकास परिषद के अध्यक्ष सतीश शर्मा और सचिव प्रगति खेमरिया ने अपने उद्बोधन में जैन साध्वियों का स्वागत करते हुए उनसे मार्गदर्शन मांगा। साध्वी...

शरीर रूपी गाड़ी का ड्राइवर अगर बराबर ना हो तो गाड़ी कैसे चलेगी: प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा.

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने केशीश्रमण गौतम स्वामी की चर्चा चल रही, उसके बारे में बताया हमारी शरीर रूपी गाड़ी का ड्राइवर अगर बराबर ना हो तो गाड़ी कैसे चलेगी। गाड़ी में महत्व किसका है? बैठने वाले का या ड्राइवर का? आत्मा ये ड्राइवर है अब कैसे उपयोग करना हमारे हाथों में है। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने श्रावक का गुण बताते हुए कहा वह परोपकार करने वाला होवे। सृष्टि देखो कितना देने का कार्य करती। पहले भी जगड़ुशा, देदाशा, भामाशाह हो गए उन्होंने कितना अच्छा कार्य किया दुखियों के आंसू पोंछे। सभी को हेल्प की तो हमें भी करना है। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने तपस्वी का स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।

दूसरों का हित करने से बड़ा कोई धर्म नहीं : देवेंद्रसागरसूरि

चेन्नई . श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन मूर्तिपूजक जैन संघ में पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म वाणी का श्रवण कराते हुए कहा कि धर्म की स्थापना को एक साधारण मनुष्य केवल पूजा स्थलों की स्थापना से ही समझता है, जबकि इसके लिए धर्म शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मानव जीवन को सुचारु रूप से चलाने और सृष्टि के विकास के लिए हर संप्रदाय के महापुरुषों ने आचरण संहिता बनाई, जिसका मुख्य उद्देश्य था कि मनुष्य का मनुष्य के प्रति इस प्रकार का व्यवहार हो जिसके द्वारा दूसरे मानव को पीड़ा न हो और प्रकृति का संरक्षण हो। उस समय आज के समान कानून की किताबें नहीं थीं और इसी आचरण संहिता को धर्म नाम से पुकारा जाने लगा। हर प्रकार की चोरी, झूठ बोलना, भावनात्मक और शारीरिक हिंसा और स्त्रियों के प्रति अभद्र व्यवहार कानून के अनुसार भी गलत हैं और इसी प्रकार से धर्म की दृष्टि से भी अनुचित है। इसलिए धर्म स्थापना का वास्...

धर्म उत्कृष्ट मंगल है बशर्ते इसे सिर्फ किया ही नहीं, बल्कि जिया जाए: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

आध्यात्मिक क्लास में जैन साध्वियों ने धर्म के छिपे हुए रहस्यों को स्पष्ट किया शिवपुरी। प्रतिदिन सुबह उठकर परमात्मा का स्मरण और उन्हें धन्यवाद क्यों देना चाहिए। क्यों प्रतिदिन कोई ना कोई नियम अवश्य लेना चाहिए। ऐसे तमाम सवालों के उत्तर पोषद भवन में जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी और उनकी 5 सुशिष्याओं की धर्मसभा में जानने को मिल रहे हैं। सोमवार को धर्म सभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि भगवान महावीर ने धर्म को उत्कृष्ट मंगल बताया है, लेकिन धर्म क्या है? यह जानना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि धर्म करने का नहीं, बल्कि जीने का नाम है। धर्मसभा में साध्वी जयश्री जी ने श्रावक के 12 गुणों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय और नीति से जो धन कमाया जाता है वह अच्छे और पुण्य कार्यों में लगता है। धर्मसभा में सवाई माधौपुर राजस्थान से पधारे धर्मावलंबियों ने जैन सतियों के दर्शन और जिन वाणी श्रवण का लाभ ...

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