यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि जैन धर्म का आचरण करने वाला जीव मोक्ष की प्रधानता को श्रृत करता है। जिसके लिए जीव अजीव का ज्ञान आवश्यक है सम्यगदृष्टि तत्व ज्ञान को प्राप्त कर छह काय का प्रतिपाल बन सकता है। संसार से तिरने के लिए तत्व को जानना जरूरी है। वरना आस्त्रव को सवंर और बंध को ही मोक्ष मान लेगा यदि ऐसा कर लिया तो कर्मों की निर्जरा नही होगी। इसलिए भगवान कहते है जब तक संसार में जीने की कला नही आयेगी, तब तक वह कर्म निर्जरा नहीं होगी और कर्म बंध से नहीं बच पायेगा। भगवान कहते है कि संसार से तिरने के लिए आप संसार में रहो पर संसार अपने भीतर न रहे यदि जीव के भीतर संसार है तो वह संसार से तिर नही सकता। इसलिए भगवान ने संसार से तिरने के लिए स्त्रियों के लिए 64 कला और पुरुषों के लिए 72 कला बताई दोनों का मूल दो ही है एक तो आजीविका और एक धर्म की। संसार में रहते हुए आसक्त ...
श्री राजेन्द्र भावन चेन्नई साक्षात्कार वर्षावास विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प. पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास के इस प्रवचन का विषय श्री अभीधान राजेंद्र कोष भाग 7 काया से अपराध करने को कर्म बंद कहते हैं लेकिन मन से हो रही हर पल हिंसा की क्रिया को अनुबंध कहते हैं बंद से भी बलवान है अनुबंध। ~ जिस मानव को हिंसा के बल रूप दुख, रोग ,भयंकर पीड़ा ,नर्क में जाने का ज्ञान है, वह कभी भी कोई भी पाप, हिंसा मन से नहीं ही करेगा। ~ जब तक हमें हमारे जीवन में हो रही गलतियां, दोषों का ज्ञान नहीं होगा तब तक हमें दोषों से, पापों से मुक्ति को पाना असंभव है। ~ जहां बोध है ज्ञान है वहां ही हम वास्तविक सुख, आनंद को पा ...
★ खतरगच्छ दिवस पर गौरवशाली इतिहास को किया उजागर Sagevaani.com @चेन्नई: श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में 1005वॉ खतरगच्छ दिवस गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. के सान्निध्य में मनाया गया। गच्छाधिपति ने कहा कि हमारा जीन शासन घना छायादार, विशाल वटवृक्ष है, जिस पर बड़ीबड़ी, छोटीछोटी डालियां है, हरे हरे पत्ते है। जितनी भी बड़ीबड़ी है डालियाँ मूल गच्छ है, उनमें निकली छोटीछोटी डालियाँ समुदाय है। हरे हरे पत्ते साधु-साध्वीयाँ, श्रावक-श्राविकाएं है। इस तरह चतुर्विध धर्मसंघ का वटवृक्ष है। यह वटवृक्ष सम्पूर्ण होता है तभी हमें छाया देता है। वटवृक्ष की जडें एक है, जमीन से पानी लेता है और डाली अंतिम पत्ते तक पानी पहुंचाती हैं। हाथ के अंगूठे, अंगुलियां अलग अलग होते हुए भी आपस में सहयोगी बन कर कार्य करती है,...
Sagevaani.com @चैन्नाई। वाणी में विवेक लुप्त होता है औंर जीवन अर्थ बन सकता है।सोमवार एस.एस. जैन भवन साहूकार पेठ में महासाध्वी धर्मप्रभा ने श्रध्दालूओ को सम्बोधित करते हूए कहा कि वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व का आईना है। जो बोलचाल बुद्धि, विवेक और मन की दशा को दर्शाती है । शब्द बुद्धि, विवेक, मन और आत्मिक संग्रहित पूंजी से निकलते हैं। मन-बुद्धि, विवेक की आंतरिक अवस्था जैसी होती है, हम वैसे ही शब्द बोलने लगने लग जाता है। मानव के मन में यानि भीतरी खोह में जब गुस्सा होता है, तो गुस्से वाले शब्द और जब प्यार होता है, तो प्यार वाले शब्द अपने आप निकलते हैं। दोष शब्दों में नहीं होता मनुष्य कि सोच में होता है । बिखरे हुए मन से बिखरे हुए शब्द निकलते हैं और सधे हुए मन से सधे, सटीक और सार्थक शब्द ही निकलते हैं। सारा खेल शब्दों यानि वाणी का ही है। शब्दों से ही हम किसी को अपना बना लेते हैं और शब्द ही हैं जो...
जैन दिवाकर महासती श्री कमला वती जी म. सा की सु शिष्या उप प्रवर्तीनी संथारा प्रेरक महासाध्वी गौरव श्री सत्य साधना जीमा. सा. आदी ठाना 7 का चातुर्मास अंबेश भवन में गतिमान है। बीच में 5 दिवसीय प्रोगाम होने से सुख के ऊपर प्रवचन माला स्थगित थी उसे पुनः आज गतिमान करते हुए महासती जी ने आज के प्रवचन में साध्वी जी मा.सा. ने सुख के प्रकार 6ठे सुख राज में मान के ऊपर प्रवचन जारी रखते हुए कहा कि राज में मान होने पर कार्य सरलता पूर्वक हो जाते हे। इसी तरह समाज में मान होने से समाज में अपने साथ समाज की भी प्रगति होती हैं। इस चातुर्मास में तपस्या की लडी लगी हुई हे। उपवास, बेले तेले की पचखान के साथ आठ नौ, आदी बड़ी तपस्या के भी पचखान हो रहे हे। बाहर से भक्त सु श्रावको का आना भी लगातार जारी हैं । मेहमानो की कड़ी में आज ब्यावर के चेन्नई प्रवासी श्रीमहावीर जी तालेड़ा, गोतमजी तालेड़ा, पुष्पा जी तालेड़ा, बनेडिया श...
राजस्थानी एसोसिएशन तमिलनाडु कि महिला इकाई गणगौर द्वारा दुसरा कैंसर जांच शिविर का आयोजन विशेष तौर पर गणगौर की महिलाओं के लिए आयोजित किया, जिसमें कई प्रकार के आधुनिक उपकरणों द्वारा जांच की गई। Medi Alexa Cancer Camp के डॉ वेंकट, डॉ संतोष, डॉ राजरत्नम और डॉ संहिता ने इस जांच शिविर में अनुमोदनीय सेवा दी। इस शिविर में श्री सुभाष जी रांका, RYA Cosmo के अध्यक्ष रंजीत जी गादिया, मैनेजिंग ट्रस्टी अभय कुमार लौढा, गिरिराज जी मूंदड़ा, के के बाहिती, अजय जी नाहर, अरुण जी बोहरा, निर्मल जी रांका, सौरभ जी बाफना, विनोद जी छाजेड़, सुनीता जी बेताला, हरीश जी कांकरिया, रजत के अध्यक्ष श्री मोहनलाल जी बजाज, देवराज जी अच्छा ज्ञानचंद जी कोठारी और विनोद जी ओ जैन ने भी इस कार्य में अपनी सेवाएं प्रदान कर महिलाओं को प्रोत्साहित किया। गणगौर की अध्यक्ष कांता बिसानी ने सभी का स्वागत किया। संचलन अजय नाहर द्वारा किया गया। इ...
पनवेल जैन स्थानक मे विराजित साध्वी आभाश्री जी मा. सा. आदि ठाणा 3. ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि परिवार में मिठास कैसे लाई जाए, आज परिवार टूट रहे हैं। मटके की कीमत मटका बनाने वाले को ही पता होती है, वैसे ही परिवार की कीमत परिवार बनाने वाले को पता रहती हैं। वस्तुशास्त्र का दोष नहीं है, घर के झगडे में दोष तो अपनी अपनी भावना में है, सोच में होता हैं। सोच का दोष निकाले, कपड़ा फट जाता है तो उसे फेंका नही जाता है उसे सिल कर फिर ठीक कर लिया जाता है। पांचो अंगुलिया जब मिल जाती है मुठ्ठी बन जाती है और जब मुठ्ठी बन जाती है तो सबकी छुटी कर देती है। साहवी. डा. महिमाश्री जी मा. सा. ने कहां की इंसान संसार में बंधन तोड़ने आता है पर तोडता नही है उल्टा और कितने बंधन में बांध जाता है। मनुष्य के पास भव बेधन तोड़ने का अमूल्य अवसर है। इसलिए अपने मानव जन्म को सार्थक करे। साहवीडा. श्रेयांशी श्रीने मधुर गीतिका गा...
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे हमारे को नित्य कहते हैं कि जैसे भावों को शुद्ध शुद्ध करने के लिए जारी स्तोत्र है एक नेत्री दो प्रसंता तीन करुणा और चार कृतज्ञता सुख दुख का पुण्य पुण्य नगरी करुणा मुदिता पेक्षा भावना का ततचइत मित्रता करुणा प्रशस्ता कुर्ता प्रस्थान इनसे चित्त को सुभाषित किया जा सकता है। पहला भाव है मैत्री भाव एक ऐसी मंगल भावना जो सारे विश्व को एक सूत्र में बांधे मित्र यानी सब के प्रति प्रेम भाव किसी के प्रतिवेर विदृश नहीं मित्र ही तो वह आधार है जो एक और एक ही तरह सबको आपस में जोड़ती है बादल से बरसती बिखरती बुंदो को सागर में विराट तादेती है अगर मैत्री भाव नहीं है तो भक्ति भी नहीं है ऐसा कि कोई व्यक्ति का नहीं ...
पूज्य श्री दर्शन मुनि जी महारासा का सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद में जीव कीतने प्रकार से कर्म बांधता है? तीन योग से बांधता है और तीन योग से छोड़ता है। तीन करण मन, वचन और काया से बांधता है । *मन से कर्म ज्यादा बांधता है।* अशुभ योग में मन लगा हुआ है इस कारण वचन से कुछ भी बोल देता है और कर्म बांधता है । कर्म बांधना सरल है , भोगना कठिन है । *वचन* के पुद्गल मिले है ,इससे अच्छे वचन बोले, परमात्मा की आराधना करें। *काया* से भी कर्म बांधते है, काया को स्थिर नही रखते,इस कारण जीव की विराधना होती है , सारे काम देखकर यतना से करे तो जीव की विराधना नही होगी, मन से कर्म निकाचित होते है *पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी महारासा*- संसार के जीव भिन्न वृत्ति वाले लोग रहते है ,सबकी वृत्ति एक समान नही । *अढाई द्वीप में 196 अंक की गणना जितने मनुष्य रहते है* इनको चार विभाग में बाट दिया.. *1 ख...
नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्मबन्धुओं भावी जनों के तिरने के तीर्थ का निरुपण किया है तीर्थ के चार घाट होते हैं वैसे ही जिनेश्वर भगवान नें तीर्थ के चार घाट साधु-साध्वी, श्रावक श्राविका का निरुपण किया है । ये चारो तीर्थ में जाने वाले निश्चित रूप से तिरते है यदि तीर्थ में जाने पर भी आप भव सागर से नही तिरते तो कमी स्वयं आप में है। तीर्थकर की पहली देशना से चार तीर्थ की स्थापना करते है। सर्वज्ञ सर्वदर्शी केवल ज्ञानी होने पर ही तीर्थकर प्रथम देशना देते है। तीर्थकर द्वारा दिया गया ज्ञान उनकी जिनवाणी को साधु साध्वी, आचार्य, उपाध्याय गाँव गाँव में सेल्समैन की तरह सब तक पहुंचाते है। भगवान महावीर की प्रथम देशना रात्रि में हुई जिसमें चार जाति के देव चार जाति के देवियाँ तो थे पर चार जाति के मनुष्य व तिर्यंच वहाँ उपस्थित नहीं है। मनुष्य ही व्रत प्र...
राजेंद्र भावन चेन्नई में विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास के इस प्रवचन में परमात्मा नेमिनाथ का जन्म कल्याणक के बरे मे बताया। ~ प्रभु की भक्ति तीन प्रकार से हो सकती हैं 1.काया से 2.मन से 3.आत्मा से। ~ प्रभु की अभिषेक की धारा हमारे मन में रहे दू:खो की धारा का नाश करने वाली हो तभी हमारा जीवन सार्थक होगा। ~हमारी भावनाओं में जो नया बल नई रोशनी नया जुनून पूरे वह है भक्ति। भक्त और भगवान यह दोनों का भेद मिटाकर भक्त स्वयं के भीतर में रहे हुए भगवान को अनुभव करें वह भक्ति। ~परमात्मा को पाने के लिए भक्त के हृदय में सर्वप्रथम भक्ति की जिज्ञासा होना अति आवश्यक है। ~परमात्मा जब हमारे में आते हैं...
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने फैमिली मैनेजमेंट के बारे में बताया कि ये रिश्ता क्या कहलाए, आज उसी रिश्ते का मजाक उड़ाया जा रहा है। सात जन्म का ऐसा पवित्र पति पत्नी का रिश्ता जो चंदन के समान होना चाहिए था, पर एक दूसरे की नासमझी के कारण ज्यादा से ज्यादा डिवोर्स हो रहे हैं। चेलना श्रेणीक के बारे में, पूर्णिया श्रावक के बारे में बताया गया। धर्म जब जीवन में उतरता है तो संबंधों में मधुरता आती है। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने श्रावक के गुणों के बारे में बताते हुए कहा उपकारी के उपकारों को कभी भी भूलाना नहीं है। कृतज्ञता व्यक्त करना है ना कि कृतज्ञ बनना है। बच्चों का शिविर लिया गया। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।