Sagevaani.com @चेन्नई. श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में बिराजमान आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म वाणी देते हुए कहा कि व्यक्ति के जीवन में आचरण का विशेष महत्व है। श्रेष्ठ आचरण से व्यक्ति का बहुमुखी विकास होता है। मानव योनि में जन्म मिलने के बाद इसे व्यर्थ नहीं गंवाएं। खाली हाथ मनुष्य इस संसार में आता है और रोता बिलखता, खाली हाथ ही चला भी जाता है। उसका सारा ताना-बाना यहीं रखा का रखा रह जाता है। पापों की गठरी इतनी भारी हो जाती है कि एक दिन जब काल सामने होता है तो उसके पास पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाता है। इसलिए समय रहते ही अपने आचरण को ठीक करने के लिए सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयास करें ताकि इस संसार से विदा होने के बाद भी लोग आपको याद करें। महावीर आज अपने सत्कर्मों की वजह से आज भी अमर हैं। इन्होंने सबसे पहले अपने अंदर सदाचरण का बीज बोया। अपने आचार-वि...
प्रवचन- संसार की बुराईयों से धर्म क्षेत्र को दूर रखें, धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं Sagevaani.com @शिवपुरी। हमने अपने धर्म को सिर्फ आराधना और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित कर दिया है। इसमें साधना का समावेश ना होने से धर्म क्षेत्र संसार की बुराईयों से मुक्त नहीं हो पाया है। जिससे संसार में जो लड़ाई, झगड़ा, प्रतिद्वंदता, अहंकार, कपट आदि कषायों का बोलबाला है। उसी से धर्म क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। हमें समझना चाहिए कि धर्म क्षेत्र मल्ल युद्ध स्थल नहीं है इसमें किसी को नीचा दिखाने की भावना नहीं है। संसार में भले ही बल, बुद्धि और चालाकी को अहमियत मिलती हो, लेकिन धर्म में जोडऩे का भाव है। एक दूसरे को प्रेम करने और गले मिलने का भाव है। धर्मसभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने उक्त भावनाएं व्यक्त करते हुए श्रोताओं के मन को झकझोरा और कहा कि संसार की बुराईयों से कृपया कर धर्म क्षेत्र को दूर रखें। धर्मसभा...
एस एस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा ने बताया कि पुण्य वाणी घट जाय तो सांस लेना भी कठिन हो जाता है श्वास के अन्दर भी पुण्यवाणीका संयोग है, इसलिए ज्ञानी जन कहते है अच्छे कर्म करन वाला उच्च गति को प्राप्त करता है सम्भल करके चलना सोच समझकर पद्धत्ति को जैन धर्म पाप कर्म का निषेध करोगे तो पाप से बच जाओगे और सम्यक प्रकार से पालन करोगे तो पाप से बच जाओगे। जीनवाणी कहती है एक पानी के जीव में असंख्यात जीव है तो बिना प्रयोजन के पानी में एक अंगुली भी नहीं डालें। नीमित पाकर कर्म भी उदय में आ जाते है। पानी को वेग ज्यादा होने पर सरकार निषेध करती है यह भगवान की वाणी ही है। कोई भी कही भी जबरदस्ती से बुलायेगा वहाँ चले जायेगे क्या। जहाँ मजा है वहाँ सजा है, प्रबल पुण्यवाणी का उदय होने पर पानी में फिसला हुआ आदमी भी नदी के किनारे पहुँचकर सुरक्षित हो जाता है। पहाड़ों पर फ...
🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰 *ता :27/7/2023 गुरुवार* श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म. सा. के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. का भव्य वर्षावास चल रहा है। ~ प्रभु महावीर स्वामी ने स्वयं के केवल ज्ञान में जीव की 84 लाख भिन्न-भिन्न स्थानों में जन्म, मरण, सुख-दुख की अवस्था देखी है। ~काया से करते हुए पापों की संख्या मर्यादित (limited) है किंतु मन से करते हुए पापों की संख्या अमर्यादित (unlimited) है । ~ हमारे जीवन में आंतरिक परिवर्तन हो, दोषों का नाश हो, गलतियां मिट जाए वह हमारे जीवन की सफलता है। ~ क्रिया से जीवन में परिवर्तन आएगा यह निश्चित नहीं किंतु ज्ञान से जीवन में परिवर्तन अवय...
टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चातुर्मासिक प्रवचन Sagevaani.com @रायपुर. कभी-कभी लोग सिंगल पर फोकस हो जाते हैं। वो उसी में रम जाते हैं। जो जिसमें रमन करता है, वो भी वैसा बन जाता है। यही साधना का सूत्र है। ज्ञानियों के लिए ऐसा करना मुश्किल है। जिनमें वात्सल्य का बल है, उनके लिए यह बहुत सहज है। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में गुरुवार को उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि एक मां अपने बेटे के सिवाय किसी और को देखती तक नहीं है। मरुदेवी ने अपने पुत्र को निरंतर देखा। और किसी को देखा ही नहीं। किसी और में जिज्ञासा ली ही नहीं। न किसी से मिलने की तमन्ना थी। न किसी को जानने की। उतनी गहराई से जब हम किसी के साथ जुड़ते हैं तो उसकी शिखरता भी हमें सहज उपलब्ध हो जाती है। ये अनन्य भक्ति का सूत्र है। इस सूत्र को मरुदेवी ने पूरे जीवन किस तरह ...
अनुमोदनीय घटनाओं का बार बार स्मरण करने की दी प्रेरणा Sagevaani.Com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के तीसरे अध्याय की गाथा का विवेचन करते हुए कहा कि संसार के साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविकाओं की दृढ़ता, उनके चारित्र, उनकी क्रियाओं के बार बार दर्शन करके, जो हमारे भीतर में अनुमोदना के भाव प्रकट होते है, उनसे हो सकता है कितने जन्मों, कितने कर्मों के बंधन को काट सकता है। अतः अनुमोदनीय क्रियाओं के दर्शन, चिन्तन पुनः पुनः करने चाहिए। लेकिन उन घटनाओं या क्रियाओं का चिन्तन कभी मत करो जिससे कर्मों का बंधन होता है। हमारे जीवन में अनुमोदनीय और निन्दनीय दोनों घटनाएं सामने आती हैं। एक ही व्यक्ति जिसने पुर्व...
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। जिसे तो धरती पर कई जो जमती है उसे निगोद कहते हैं जैसे अपने किचन में आलू को देखा है। एक आलू के अंदर एक सुई जितना लोग कितनी पतली होती है उससे भी अनंत जीव होते हैं। आलू के अंदर कभी मन करता है कि आलू की सब्जी खाओ खाओ कि नहीं खाओ आलू के अंदर जीव से बचने के लिए आलू का त्याग करना चाहिए। एक समुद्र में तो एक बार अगर पाव लगा दिया उनका भी इतना पाप लगता है । निर्जरा के बारे में बताएं एवं और कहा कि कोईभी समभाव से सहन करें तो निर्जरा कम होती हैं। प्रवचन के माध्यम से हमें रोज में अपनी वाणी सुनाते हैं। एवं करुणा का चोथा दिव्य भाव हृदय यानी जो हमारे काम आया उसके प्रति धन्यवाद से भरे रहना आज मनुष्य में कृतज्ञता क...
श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन के माध्यम से कहा कि लोग आध्यात्मिकता को जीवन-विरोधी या जीवन से पलायन मानते है। लोगों में भ्रामक धारणा है कि आध्यात्मिक जीवन में आनंद लेना वर्जित है और कष्ट झेलना जरूरी है। जबकि सच्चाई यह है कि आध्यात्मिक होने के लिए आपके बाहरी जीवन से कोई लेना-देना नहीं है।आध्यात्मिकता का किसी धर्म, संप्रदाय या मत से कोई संबंध नहीं है। आप अपने अंदर से कैसे हैं, आध्यात्मिकता इसके बारे में है। आध्यात्मिक होने का मतलब है, भौतिकता से परे जीवन का अनुभव कर पाना। अगर आप सृष्टि के सभी प्राणियों में भी उसी परम-सत्ता के अंश को देखते हैं, जो आपमें है, तो आप आध्यात्मिक हैं। अगर आपको बोध है कि आपके दुख, आपके क्रोध, आपके क्लेश के लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है, बल्कि आप खुद इनके निर्माता हैं, तो आप आध्यात्मिक म...
-धर्मसभा में उन्होंने बताया कि जिनकी देव, गुरू और धर्म के प्रति श्रद्धा होती है वे नहीं करते धर्मान्तरण । जिनकी भी देव, गुरू और धर्म के प्रति अगाध श्रृद्धा होती है वे विचलित नहीं होते है तथा कभी भी अपना धर्म नहीं बदलते हैं। सिख धर्म के दसवे गुरू गोविन्द सिंह जी के मासूम पुत्रों ने दीवार में चिनना स्वीकार किया लेकिन अपना धर्म परिवर्तर्न नहीं किया। धर्मर् परिवर्तित कर वह अपनी जान बचा सकते थे, लेकिन उनकी देव गुरू और धर्म के प्रति श्रद्धा और आस्था नहीं डगमगाई। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी की सुशिष्या साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय पोषद भवन में आयोजित एक धर्म सभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी जयश्री ने बताया कि संसार में रहकर भी श्रावक धर्म के 12 व्रतों का पालन कर आप एक तरह से साधु जीवन जी सकते है। साध्वी वंदना श्री जी ने धर्मसभा में सुमधुर स्वर में भजन का गायन किया क...
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया बन्धन से बंधे हुए जीव इस जगत में दिखाई देते हैं। इस बंधनों से कैसे मुक्त होना है वे कौन-कौन से बंधन है। यह जानने से पता चलेगा। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने मनुष्य जन्म का सार बताते हुए चार प्रकार के मानवों का वर्णन किया। नौ उपवास सौ मनीषा सकलेचा तथा ग्यारह उपवास प्रीति कोठारी इनके प्रत्याख्यान हुए आगे तपस्या जारी है। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने तपस्वी का स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।
🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भावन चेन्नई* 🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास चल रहा है। इस प्रवचन में विषय श्री अभीधान राजेंद्र कोष भाग 7 ~ जो मानव ने आत्मा की विराट शक्ति का बोध पा लिया है वह मानव बहुत ही कम भवों में मुक्ति को प्राप्त कर सकता ही है। ~ स्वयं के अंतःकरण को देखने का नजरिया वह ज्ञानियों की और ज्ञान पाने का मूल मार्ग है। ~ हमारे मन में रहे हुए गलत विचार गलत भावनाएं सबसे पहले हमें ही जलाते हैं, दुखी करते हैं, दर्द देते हैं। ~प्रभु महावीर स्वामी ने कहा है कि जयना धर्म केवल मनुष्य लोक तक ही नहीं किंतु देव लोक, नरक, तिर्ययंच् गती में भी जयना धर्म का पाल...
धर्म व्यापार में बने प्रॉफिट सम्पन्न : जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी श्रवण क्रिया से कला और श्रवण योग तक पहुंचाने की बताई महत्ता चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के तीसरे अध्याय की गाथा में मनुष्य भव को सुलभ बनाने के चार सूत्रों की विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य जन्म की दुर्लभता से भी दुर्लभ है श्रवण। भगवान महावीर की देशना को सुनना। शरीर के अंगों में दो अंगों का विशेष महत्व है- पाप का प्रारम्भ सबसे पहले आंखों से होता है फिर दूसरे अंगों का योग मिल सकता है। वहीं धर्म का रास्ता कान से आता है, उसी श्रवण से अध्यात्म का मार्ग प्रारम्भ होता है। तंदुल मत्च्छ की घटना से प्रेरणा देते हुए कहा कि हम निरर्थक विचारों स...