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संसार में सबसे बड़ा भय मरण है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि जिनेश्वर भगवान महावीर ने जिनरुपी गंगा बहाई‌। संसार में ऐसा कोई भी जीव नहीं होगा जो मरना चाहे, मरण आये फिर भी जीने की अभिलाषा। संसार में सबसे बड़ा भय मरण का। यदि कोई दुःख से पीडित होकर भी मरने की कामना करता है बस संसार में दुःख नहीं झेल सकता है लेकिन जब मरण सामने आ जाती हैं तो थर थर कांपने लगता है मरण सामने आता है तो भयभीत होता है और जीने की अभिलाषा, प्रार्थना करने लग जाता है। ऐसा भी जीव अभिलाषा होती है मुझे जीना है जिसने जीवन के अंदर धर्म को धारण कर लिया है वह मरण से भयभीत नहीं होता वह जानता है मेरा तीन काल में भी मरण नहीं होता है क्योंकि मैंने ऐसा धर्माचरण कर लिया है उनको मरने की डर नहीं होती है जो दिन रात पाप में लगा रहता है उसे मरण का डर होता है जो धर्म की राह पर चलता है वह मरण को जीत लेता है अपने मरन से संथारा...

तृप्ति में ही है आनन्द की अनुभूति: गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

  श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने शनिवारीय प्रवचन में कहा कि समता में रहना ही आनन्द में रहना है और आनन्द में रहना ही समता में रहना है। जीवन में जो है, उसमें भी सन्तुष्टि के साथ में रहने वाला अभाव में होते हुए भी आनन्दित रह सकता है, प्रसन्नचित रह सकता है। आनन्द के लिए जीवन में प्राप्ति ही नहीं, अपितु तृप्ति चाहिए। आनन्द हमेशा तृप्ति में है। एक व्यक्ति नेगेटिव न्यूज को पढ़ कर भी मुस्कुराहट में रहता है। वह जब अखबार में कोई दुर्घटना या मृत्यु की खबर पढ़ता है, तब वह उस के प्रति मंगलकामना करता हुआ, प्रभु को धन्यवाद देता है कि- मैं तो सुखी हूँ, स्वस्थ हूँ। हृदय में आनन्दित रहे। ◆ सामुहिक बंधन से ही सामुहिक वेदना का भुगतान ...

तपस्या आत्मोत्थान का महत्वपूर्ण साधन है: साध्वी डॉ गवेषणाश्री

मासखमण तप अनुमोदनार्थ कार्यक्रम Sagevaani.com @तिरूपुर: युवामनीषी महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या डॉ साध्वी गवेषणाश्री के सान्निध्य में तेरापंथ सभा भवन, तिरूपुर में श्रीमती सरिता श्यामसुखा के मासखमण तप का अभिनंदन समारोह मनाया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ साध्वीश्रीजी द्वारा नमस्कार महामंत्र से किया गया। मंगलाचरण महिला मंडल द्वारा किया गया। तेरापंथ सभाध्यक्ष श्री अनिल आंचलिया ने स्वागत स्वर प्रस्तुत किया। साध्वी डॉ गवेषणाश्री ने फरमाया कि आटे का धोवन पीने वाला दूध को नहीं नहीं समझता, चीड का आभूषण पहनने वाला मोती का महत्व नहीं जानता, वैसे ही जो प्रतिदिन खाने वाला है वह तप का महत्व नहीं समझ सकता। इस दुर्लभ, दुष्कर तप का स्वाद वही ले सकता है, जिसने अपनी जिव्हा पर नियंत्रण किया है। इस प्रतियोगिता के युग में तपस्या का अनुसरण विरला ही कर सकता है। तपस्या आत्मोत्थान का महत्वपूर्ण साधन है।...

हमारी आत्मा को देखने का जरिया उसके अंदर रहे परमात्म स्वरूप को देखना है: आचार्य उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीश्वरजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में बताया कि हमारे पास आंखें हैं, इसका सबूत यह है कि हमें दिखता है। हमारे पास मन हैं, जिससे चिंतन मनन कर सकते हैं। इसी तरह कुछ लोग पूछते हैं हमारे पास आत्मा है, उसका क्या प्रमाण है? हमारे पास आत्मा को देखने का जरिया ही नहीं है। आत्मदर्शन का मार्ग है ध्यानयोग। उन्होंने कहा नमक अकेला होता है तो खारा लगता है, किसी के साथ मिल जाए तो प्यारा लगता है। वैसे ही आदमी का अकेलापन सबको खारा लगेगा। परमात्मा हमारी आत्मा में बसे हुए हैं, आत्मा को जूम करके देखो तो महसूस होगा। आचार्यश्री ने कहा निज की आत्मा में परमात्मा का दर्शन करने के लिए छ:काय के जीवों की रक्षा करो। सिद्ध भगवंतों का उपकार याद करो कि हमें अव्यवहार से व्यवहार राशि में प्रवेश का काम किया है। सिद्धों ने सर्वप्रथम सा...

संसार में कोई अपना नहीं है: जयतिलक मुनिजी

यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि नाता किससे है? संसारी से। स्वार्थ से हर कोई जुड़ता है। जब वक्त आयेगा तब मुहुँ दिखाने के लिए भी नहीं आयेंगे। कभी 2 माता-पिता, पत्नी पुत्र-पुत्री भी मौका मिलता है तो छोड़कर चले जाते है। पत्नी-पत्नी का साथ अंतिम तक हो। लेकिन स्वार्थ की पूर्ति न हो । व्यक्ति खारा लगने लग जाता है। ज्ञानी जन कहते है संसार में कोई अपना नहीं है, जिस दिन स्वार्थ की पूर्ति न हो तो कोई भी अच्छा नहीं लगता है। पिता के पास धन है तो पुत्री भी जाना आना लगाए रखती है। सीख देते हैं (सीख याने ज्ञान, शिक्षा) सीख देते है तो अच्छा लगता है। चार दिन पिता की सेवा करना है यह समझ रखे। बिना स्वार्थ से रखे। संकट में अपने भी पराये हो जाते है। दो बेटे है एक कमाता है एक नही कमाता है माँ किसको पूछती है धन कमाने वाले को। धर्म ध्यान करने वाले से भ...

जिसके मन में प्रभु आज्ञा का प्रेम नहीं उसके लिए कोई भी बंधन नहीं है: जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के

🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰           *ता :04/8/2023 शुक्रवार*      🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय श्री अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ शासन प्रभावना और शासन रक्षा का सौभाग्य जो स्वयं कि आत्म रक्षा करता है उसके लिए ही संभव है। ~ सद्गुरु मिलना सरल है किंतु सद्गुरु के प्रति समर्पण होना और आज्ञा का पालन बहुमन भाव से होना कठिन है। ~ जो पाप करता है वह इतना पापी नहीं है जितना पापी वह है कि जिनके सिर पर गुरु तत्व नहीं है। ~ जीवन में गुण, सकारात्मकता तभी प्रकट होती है जब साधक स्वयं के स्वभाव के मूलभूत परिवर्तन के लिए पु...

त्याग का संकल्प लेने वालों को मिला तपस्वी साध्वी को पारणा कराने का लाभ

SAgevaani.com @शिवपुरी। लगभग 45 दिन से सिद्धि तप की आराधना कर रहीं प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी महाराज की सुशिष्या नेपाल प्रचारिका साध्वी पूनमश्री जी की तपस्या पूर्ण होने पर आज उन्हें पारणा कराने का लाभ उन श्रावक-श्राविकाओं को मिला जिन्होंने कोई ना कोई व्रत और संकल्प लिया है। इनमें ब्रह्मचर्य व्रत के पालन से लेकर 8 उपवास की तपस्या सहित अन्य धार्मिक संकल्प भी शामिल हैं। साध्वी पूनमश्री जी ने आहार श्रावक धर्मेन्द्र गूगलिया के निवास स्थान पर लिया। इस अवसर पर साध्वी रमणीक कुंवर जी ने तप और त्याग की महिमा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में तप को अमृत द्वार की संज्ञा दी गई है। मोक्ष जाने का यह एक मार्ग है। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन कोई ना कोई त्याग के प”ाखाण अवश्य लेना चाहिए। जिससे हम हिंसा आदि दोषों से बच सकते हैं और कर्मों की निर्जर...

पचक्खाण ऐसा होना चाहिए जिसमें आत्मा की शोभा बढ़े- आचार्यश्री उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने चित्त दमन नामक अधिकार की विवेचना करते हुए कहा चित्त दमन के लिए यम और नियम का पालन करना अनिवार्य है। यम यानी पांच महाव्रत और नियम यानी पांचों महाव्रतों को साधने के लिए बनाए नियम का पालन करना। अपने अंतःकरण से इंद्रियों को वश में करना है, उसके लिए ‘आवश्यक’ क्रियाओं से जुड़ना अनिवार्य है। ज्ञानी कहते हैं बड़ा तप करना अपना- अपना विषय है, पर किसी भी तरह के पचक्खान लेना ‘आवश्यक’ है। आचार्यश्री ने कहा आत्मनियंत्रण के लिए मनोनियंत्रण और मनोनियंत्रण के लिए विषयनियंत्रण आवश्यक है। विषय का नियंत्रण पचक्खाण नामक नियम से आता है। विषय/ पाप के नियंत्रण से पाप काबू में आते हैं। ज्ञानी कहते हैं पचक्खाण ऐसा होना चाहिए जिसमें आत्मा की शोभा बढ़े। उन्होंने कहा धर्म लोक...

आत्म समाधि ही आत्म आनन्द है, आत्म ऊर्जा है: आचार्य जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

★ हठाग्रह, कदाग्रह, पूर्वाग्रह से दूर रहने की दी प्रेरणा Sagevaani.com @चेन्नई : श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी, चेन्नई में शासनोत्कर्ष वर्षावास में गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म.सा ने उत्तराध्यन सूत्र के चौथे अध्याय के विवेचन में धर्म परिषद् को सम्बोधित करते हुए कहा कि ऐसा जीवन जो टुटने के बाद सधता नहीं है, जीवन की डोर ऐसी है जिसमें गांठ नहीं लगती, जिसमें कोई संधि नहीं होती। एक बार टुटने के बाद किसी भी कीमत पर जोड़ा नहीं जा सकता। ऐसे दुर्लभ, महत्वपूर्ण, अवसरों से भरा, विकल्पों से परिपूर्ण जीवन का उपयोग करना है। यह हमारा मनुष्य जीवन चौराहे के समान है, जहां से हम दशों दिशाओं में से कही भी जा सकते है। बाकी जन्म तो संकड़ी गली के समान ही होते है, जहां से आगे या पिछे जाया जा सकता है। गुरुवर ने प्रतिबोध देते हुए कहा क...

संस्कार विहीन व्यक्ति धन विहीन बटुए के समान होता है : देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई. बिन्नी नोर्थटाउन सोसायटी सुमतिवल्लभ जैन संघ के संघ भवन में जिन वाणी का श्रवण कराते हुए पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि संस्कार विहीन व्यक्ति धन विहीन बटुए के समान होता है, जो ऊपर से तो अच्छा लगता है, पर भीतर से खाली होता है। अच्छा व्यवहार करने से हमें कई तरह से मदद मिल सकती है। इसलिए हमें हमेशा दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार करना चाहिए और जीवन में अच्छे संस्कारों का पालन करना चाहिए। अच्छे संस्कार जीवन में आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी है। जीवन में सफल होने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, आपको अच्छे शिष्टाचार की आवश्यकता है। अच्छे शिष्टाचार न केवल हमारे आस-पास चीजों को बेहतर बनाएंगे, बल्कि वे लंबे समय में हमारे लिए चीजों को बेहतर भी बनाएंगे। इसके अलावा, अच्छे व्यवहार से अच्छी आदतें पैदा होती हैं और अच्छी आदतें विकास और सफलता की ओर ले जाती हैं। वे आगे ...

हमें समझदार बनकर धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपनी आत्मा को को निर्मल बनाना है: रविन्द्रमुनि जी म सा

  दिवाकर भवन पर जप तप आराधना के साथ विभिन्न धार्मिक गतिविधीयो के साथ पाँच माह का चातुर्मास गतिमान है। प्रतिदिन नवकार आराधक श्रावक श्राविकाओ के साथ ज्ञान जिज्ञासु महानुभव प्रवचनो की श्रंखला के माध्यम से जिनवाणी का श्रवण कर रहे है। प्रवचनो के माध्यम से प्रखर वक्ता मेवाड़ गोरव पुज्यश्री रविन्द्रमुनि जी म सा “नीरज” ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि जब तक आप भोले बनकर रहेंगे तब तक आप समझदार नहीं बन सकते हैं। हमें समझदार बनकर धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपनी आत्मा को को निर्मल बनाना है। जिस तरह एक फूल भी मुरझाकर भी अपनी सुगंध छोड़कर जाता है उसी तरह क्या आप भी दुनिया में कुछ छोड़कर जाना चाहते हो। दुनिया में व्यक्ति कैसा भी हो लेकिन श्रद्धांजलि सभा में व्यक्ति की तारीफ की जाती है कैसा जीवन जीने से कोई लाभ नहीं। शाकाहार एवं मांसाहार मानव सभ्यता की दो अलग-अलग विपरित शाखा है जो ...

समाज में व्यक्ति का सबसे बड़ा दायित्व है परमार्थ : देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई. श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि मनुष्य और समाज, शरीर और उसके अंगों के सदृश हैं। दोनों परस्पर पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का स्थायित्व संभव ही नहीं है। दोनों में आपसी सहयोग परमावश्यक है। मनुष्य की समाज के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी होती है, जिसके बिना समाज सुव्यवस्थित नहीं रह सकता। इसे हम मानव शरीर के उदाहरण द्वारा उचित तरीके से समझ सकते हैं। शरीर के विभिन्न अंग यदि अपना काम करना छोड़ दें तो वह शिथिल और जर्जर हो जाएगा। शरीर को स्वस्थ व सुदृढ़ बनाने के लिए प्रत्येक अंग का कार्यरत और क्रियाशील होना जरूरी है। ठीक यही स्थिति समाज के लिए आवश्यक है। समाज को समुचित स्थिति में रखने के लिए प्रत्येक मनुष्य में अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिए क्रियाशीलता अपेक्षित ह...

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