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   पुण्य पाप की फलश्रूति बहोत कुछ है: आगमश्रीजी म.सा.

 श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने कहां महा पुण्योदय से शासन मिला, इस शासन में क्या-क्या है यह पूछना ही नहीं है। इसमें नौ तत्वों का अद्भुत खजाना है। कर्मों की बेजोड़ फिलॉसाफी, आत्मा परमात्मा के स्वरूप की जानकारी है। पुण्य पाप की फलश्रूति बहोत कुछ है पर हमें ज्यादा से आगे बढ़ना है। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने बताया इसे इबादत करें, बगावत नहीं। इंसान की जिंदगी बंदगी करने के लिए मिली है, गंदगी फैलाने के लिए नहीं। मंत्री हस्तीमल बाफना ने अभिवादन किया। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने संचालन ने किया।

धर्म ही एक मात्र शरण, जो करे सब दुखो का वरण: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने बताया कि जब आत्मा निज स्वरूप में रमन करने लगती है तो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होने लगता है। प्रश्न ये है आत्मा भोग रही या शरीर । उत्तर है वेदना तो शरीर को मिलती है। पर शरीर जड है इसलिए आत्मा को दुख की अनुभूति होती है जिससे आर्त ध्यान रौद्र ध्यान आत्मा करती है। और कर्म बन्धन होते रहते हैं। ज्ञानी जन कहते हैं यदि चार कषायों का शमन कर लिया जाये तो कर्म बन्धन रूक जायेगे। जैसे पारस पत्थर में लोहे को सोना बनाने का सामर्थ्य है। पर यदि लोहे पर मिट्टी का लेप आ जाये तो पारस पत्थर का स्पर्श पाकर भी वह सोना नही बन पायेगा! वैसे ही आत्मा में अनन्त साम्थर्य है जिससे मोक्ष प्राप्त हो सकता है। पर कर्म आवरण की वजह से आत्मा बेभान हो जाती है। और आत्मा को अपने साम्थर्य का बोध नही होता है। अत: ज्ञानीजन कहते है कि कर्म आवरण को हटाने का पुरुषार्थ करो जिससे आत्मा की अनन्त शक्त...

सम्मान समारोह में भावुक हुईं साध्वी पूनमश्री, कहा- पिता और बुआ की कृति हूं मैं

सिद्धि तप करने पर तपस्वी रत्ना की उपाधि से हुईं सम्मानित, निकली भव्य शोभायात्रा शिवपुरी। सिद्धि तप की पूर्णाहूति पर आयोजित समारोह में साध्वी पूनमश्री जी ने भावुक होकर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि सिद्धि तप का पूरा श्रेय मेरे पिता, मेरे गुरू और मेरी गुरूणी को है जिनके आशीर्वाद के बिना तप करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं अपने पिता और सांसारिक बुआ तथा आध्यात्मिक गुरूणी मैया की कृति हूं। मुझे अपने गुरू पूज्य सौभाग्यमल जी म.सा. का भी बहुत आशीर्वाद मिला है। उनके कई प्रत्यक्ष चमत्कार मैं स्वयं देख चुकी हूं। सिद्धि तप पूर्ण करने पर श्वेताम्बर जैन श्रीसंघ ने साध्वी पूनमश्री जी को तपस्वी रत्ना की उपाधि से अलंकृत किया। सम्मान समारोह से पूर्व पाश्र्वनाथ श्वेताम्बर जैन मंदिर से तपस्वी साध्वी पूनमश्री जी म.सा. की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में जैन धर्मावलंबियों ने ...

जो साधक सत्य रस्ते पर सम्यक भाव से चलता है उसे सत्य मिलता ही है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.

     🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय श्री अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ जो साधक स्वयं के अंतःकरण, गुणों के अनुभव, परिवर्तन से जुड़ता है उसका मानव जीवन, धर्म, ज्ञानी भगवान सफल कहते हैं। ~ जब हम कोई भी क्रिया रस पूर्वक करते हैं तब उसके संस्कार भावों भाव तक हमें साथ देते ही हैं। ~ जो साधक सत्य रस्ते पर सम्यक भाव से चलता है उसे सत्य मिलता ही है। ~ परम पूज्य प्रभु महावीर स्वामी ने जगत को बोध दिया कि परमात्मा केवल मार्ग को समझाने वाले हैं लेकिन चलना तो हमें ही पड़ेगा । ~प. प. प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी मह...

41 उपवास की तपस्या गतिशील है

मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले मे स्थित खाचरौद नगर में मालव केसरी श्री सौभाग्य मल जी म.सा.के सुशिष्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी म.सा.आदि ठाणा 3 के सानिध्य में तपस्या के ठाठ लगे है।चातुर्मास काल के मात्र लगभग एक माह के काल में ही दो मासक्षमण की पूर्णाहुति हो चुकी है तथा एक तपस्वी के 41 उपवास की तपस्या गतिशील है। खाचरोद संघ के वरिष्ठ सदस्य श्री सुशील जी कल्पना जी बुपक्या की पुत्रवधू एवं सुमीत जी बुपक्या की धर्म सहायिका मासक्षमण तपस्वी श्रीमती राजनन्दिनी जी बुपक्या के मासक्षमण तप की पूर्णाहुति पर श्रावक संघ खाचरौद के अध्यक्ष श्री मनोहर लाल भटेवरा, चातुर्मास समिति अध्यक्ष श्री पारस सिसोदिया स॔घ के सचिव महेंद्र चण्डालिया, संघ के कोषाध्यक्ष अनिल छाजेड, चंद्रप्रकाश चौरड़िया, बाबूलाल जी भटेवरा, श्रेणीक खेमसरा, राकेश चण्डालिया, राजेन्द्र छाजेड, संतोष बरखेडा वाला, ऋतुराज बुडावन वाला सहित बडी संख्या मे ...

तन में स्वस्थता- तपस्या तन, मन, जीवन, को शुद्ध करती है: प्रकाश मुनि जी

सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद जीवन में चार -→ चीजे मीलना दुर्लभ है- तन मे स्वस्थता, मन मे प्रसन्नता, जीवन में शांति , परिवार का प्रेम यह बात बताते हुए पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी महाराज साहब ने फरमाया कि.. 1- तन में स्वस्थता- तपस्या तन, मन, जीवन, को शुद्ध करती है। नंद गुरु के घर में आनंद है, आज नंदनी सुमित जी बुपक्या के 30 उपवास है ,परिवार के प्रेम के बिना, सहयोग के बिना पतस्या नहीं होती। साता पूछने में मजा कि साता पुछवाने में मजा ! तप से तन शुद्ध होता है लंघम परम औषधे- तप ऐसी दवा है जो शरीर व कर्मो की गंदगी को साफ करती है। गुरुदेव कहते थे कैंसर हो जाय तो 8 उपवास कर लो । लकवा हो जाये हो 72 घंटे का चोविहार तेला कर लो । तपस्या से शरीर शुद्ध, सुंदर हो जाता है, और वह जीव मोक्ष का आराधक बन जाता है। 2- मन मे प्रसन्नता- मन में खुशी हो तो चेहरे पर चमक दिखती है चहरे पर मुस्...

जिनवाणी से मन पवित्र होता है,और आत्मा पवित्र बनती है: साध्वी प्रितीसुधा

Sagevaani.com @भीलवाड़ा। जिनवाणी को सुनने से मन पवित्र होता है और आत्मा शुध्द बनती है। गुरूवार अहिंसा भवन शास्त्री नगर मे प्रंखर वक्ता डॉ. प्रिती सुधा ने सैकड़ों श्रध्दालूओं को धर्म उपदेश देतें हुए कहा कि जिनवाणी सुनने से मनुष्य की जीवन कि शैली में बदलाव आता है। श्रवण करने से वास्तविक मनुष्य जन्म के जीवन के सार को जानकर अपने विचारों को शुद्ध बनाकर जीवन मे परिवर्तन करके मानव जीवन को मनुष्य सार्थक बना सकता है। जीनवाणी ही वो मार्ग है जिसे मनुष्य भीतर मे उतारले और धर्म के मार्ग पर चले तो शास्वत सुख को प्राप्त कर सकता है। परमात्मा की वाणी को आत्मसात किये बिना कौई भी प्राणी आत्म उत्थान नहीं कर पाएगा। जिनवाणी से व्यक्ति आत्मा के अशुम कर्मो के बंधन छुड़वा सकता है। साध्वी संयम सुधा ने कहा कि जीनवाणी ही वो मार्ग है जिससे श्रवण करके मनुष्य आत्म कल्याण का मार्ग प्राप्त कर सकता है। अहिंसा भवन के मुख्य मार...

सामायिक की साधना से मनुष्य मे समभाव आ सकते है: महासाध्वी धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नाई । सामायिक की साधना आत्मा की साधना है। गुरूवार एस.एस.जैन भवन साहूकार पेठ में महासाध्वी धर्मप्रभा ने श्रध्दालुओं को धर्म उपदेश दे हुए कहा कि सामायिक की साधना से मनुष्य मे समभाव आ सकते है । जीवन मे समभाव आ जाऐंगे तो आत्मा शुध्द और पवित्र बन जाएगी। सामायिक शुध्द भाव से होने पर ही समभाव आयेगें सामायिक एक साधना है, जीवन पद्धति है, अकुशल मन को कुशल बनाने की कला है। अवगुणों को खो दिया तो समभाव स्वयं प्रकट हो जायेगे। एकान्त रूप से शांति से अभिलाषा रहित सामायिक हमारी शुद्ध हो जाएगी। हमारे बाहरी अवगुण जैसे आए है वैसे ही चले जाएंगे। आत्मा का निज गुण है समभाव वो सामायिक से ही प्राप्त किया जा सकता है । धर्म तो सिर्फ हमारी आत्मा को धोने का कार्य करता है। लेकिन मन वचन काया को साधने का साधन हमारी सामायिक है। यदि सामायिक से आत्मा में समभाव आ गये तो गृहस्थ भी साधु है मोक्ष प्राप्त कर स...

तीरथ दो प्रकार के होते हैं: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। उन्होंने बताया कि जिन शासन में तीरथ की स्थापना अरिहंतो ने की है। जिसमें साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूपी चार तीरथ तीरथ दो प्रकार के होते हैं।  पहला जड़ तीर्थ दूसरा चेतन तीर्थ जड़ तीरथ जहां महापुरुषों के जन्मदिन का केवल व निर्माण कल्याणक हुए उन तीनों को पवित्र मानकर क्षेत्र में जाकर भक्ति भाव से उन महापुरुषों का स्तुति करने की भावना करना है। समय आने पर सतगुरु का सत्संग मिलता है महापुरुषों का मिलता है।  तो वह साधक अनादिकाल के मित्थात्वको तोड़कर जड में प्रवेश करता है। वहां से संसार यात्रा मार्ग में प्रवेश करती है उस वितराग यात्रा की प्राप्ति होती है। जैन आगम में वर्णन आता है कि जो साधक जीव व जीव अजीव के ...

मृत्यु कौनसे भावों में आ सकती है, वह हमारे हाथ में है: आचार्य उदयप्रभ सूरी

Sagevaani.com @चेन्नई किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में मन का दमन करने के लिए इन्द्रियों का दमन और इंद्रियों का दमन करने के लिए विषयों का दमन करने का मार्ग बताया। हमारे हाथ में मन, इंद्रियों, विषय और आत्मा में से क्या है? इन चारों में बाह्य वस्तु केवल एक है, वह विषय है। हर कोई आत्मनियंत्रण करना चाहता है, परमात्म तत्व को पाना चाहता है। संसार का परम सत्य मृत्यु है और परमात्म तत्व पाने का परम सत्य मोक्ष है। महोपाध्यायश्री ने कहा वज्र के घर में भी घुस जा या यमराज के सामने गिड़गिड़ा भी ले, परंतु मृत्यु तो अवश्यंभावी है। यदि संसार छोड़ना है तो मृत्यु के साथ कई प्रश्न खड़े हो जाते हैं जैसे कहां मरना है, कैसे मरना है, कौनसे भावों में मरना है या कब मरना है? हर किसी को ये प्रश्न पूछने पर जवाब मिलेगा मुझे गुरु...

जैन समाज की सेवा व सहायता के लिए देशभर से जुटेंगे प्रतिनिधि

5 और 6 अगस्त को देशभर से जुटेंगे 200 प्रतिनिधि टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में गौतम निधि लब्धि कलश का राष्ट्रीय अधिवेशन Sagevaani.com @रायपुर. जैन समाज की सेवा और शिक्षा में मदद करने उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि देशभर में गौतम निधि लब्धि कलश की स्थापना करवा रहे हैं। डेढ़ साल पहले उन्होंने रायपुर समेत प्रदेश के कई जिलों में इसकी स्थापना कराई थी। इसी हफ्ते दान में मिली राशि टैगाेर नगर स्थित श्री लालगंगा पटवा भवन में इकट्ठी की गई थी। इन पैसों से अब समाज के जरूरतमंदों की मदद की जाएगी। इसी कड़ी में 5 और 6 अगस्त को राजधानी में गौतम निधि लब्धि कलश की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई है। गौतम निधि लब्धि कलश रायपुर के प्रमुख कमल पटवा ने बताया कि इस बैठक में 200 से ज्यादा प्रतिनिधि जुटेंगे। इस दौरान उन्हें कलश स्थापना की प्रक्रिया के साथ यह भी बताया जाएगा कि दान में मिली राशि का किस तरह इस...

ऋषभ देव भगवान के पुत्र- भरत चक्रवर्ती और बाहुबली थे: वीरेन्द्र मुनिजी

ऋषभ देव भगवान के पुत्र- भरत चक्रवर्ती और बाहुबली थे। भरत चक्रवर्ती को चक्रवती पद पाने के लिये छोटे भाई बाहुबली को हराना जरूरी था। इसके लिये दोनो में युद्ध हुआ। बाहुबली हर युद्ध जीतते गये। आखिर में जब बाहुबली जीतने वाले थे उन्होंने अपना विचार बदल लिया और भरत को जीताकर खुद मुनि बनकर सन्यास ले लिये। मुनिवर ने पन्द्रह कमदान का वर्णन किया। इनसे आवको को दूर रहना चाहिये। जैसे Factory लगाने से अनंत काय जीवो की हिंसा होती हैं। इस प्रकार के व्यापार श्रावको को नहीं करना चाहिये।

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