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तीरथ दो प्रकार के होते हैं: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना ज गुरुणी मैया

तीरथ दो प्रकार के होते हैं: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं।

उन्होंने बताया कि जिन शासन में तीरथ की स्थापना अरिहंतो ने की है। जिसमें साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूपी चार तीरथ तीरथ दो प्रकार के होते हैं।

 पहला जड़ तीर्थ दूसरा चेतन तीर्थ जड़ तीरथ जहां महापुरुषों के जन्मदिन का केवल व निर्माण कल्याणक हुए उन तीनों को पवित्र मानकर क्षेत्र में जाकर भक्ति भाव से उन महापुरुषों का स्तुति करने की भावना करना है। समय आने पर सतगुरु का सत्संग मिलता है महापुरुषों का मिलता है।

 तो वह साधक अनादिकाल के मित्थात्वको तोड़कर जड में प्रवेश करता है। वहां से संसार यात्रा मार्ग में प्रवेश करती है उस वितराग यात्रा की प्राप्ति होती है। जैन आगम में वर्णन आता है कि जो साधक जीव व जीव अजीव के भेद को जानता है सत्यव्रत तत्व पर श्रद्धान करता है। वह सम्यक्तवी तत्व है तत्वार्थ श्रद्धा नाम समेत दृश्यम तत्व पर श्रद्धा करने वाले सम्यक दर्शन की प्राप्ति होती है।

 अनादिकाल से जी वने अज्ञान में संसार यात्रा की इस संसार यात्रा का मूल कारण अजीव को जीव मानना अर्थात देह को जीव मानना एवं जीव के गुण करना है। श्री आचरण सूत्र में प्रभु ने फरमाया कि तीर्थंकरों से ज्ञानी गुरु से या स्वयं की साधना से जीव को बोध होता है कि मैं कौन हूं क्या है मेरा स्वरूप मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है ?

प्रत्येक श्रावक को जीव पर श्रद्धा कर जीव को समय देना चाहिए। बारवा वृत कर्म निर्जरा के लिए अतिथि साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूप चारों तरफ की सेवा कर कर्म निर्जरा करता है। इसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में विनय धर्म को स्वीकार ना चाहिए।

जय जिनेंद्र जय महावीर, कांता सिसोदिया, भाईंदर💜💜🙏

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