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संसार में सबसे बड़ा भय मरण है: जयतिलक मुनिजी

संसार में सबसे बड़ा भय मरण है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए बताया कि जिनेश्वर भगवान महावीर ने जिनरुपी गंगा बहाई‌। संसार में ऐसा कोई भी जीव नहीं होगा जो मरना चाहे, मरण आये फिर भी जीने की अभिलाषा। संसार में सबसे बड़ा भय मरण का। यदि कोई दुःख से पीडित होकर भी मरने की कामना करता है बस संसार में दुःख नहीं झेल सकता है लेकिन जब मरण सामने आ जाती हैं तो थर थर कांपने लगता है मरण सामने आता है तो भयभीत होता है और जीने की अभिलाषा, प्रार्थना करने लग जाता है। ऐसा भी जीव अभिलाषा होती है मुझे जीना है जिसने जीवन के अंदर धर्म को धारण कर लिया है वह मरण से भयभीत नहीं होता वह जानता है मेरा तीन काल में भी मरण नहीं होता है क्योंकि मैंने ऐसा धर्माचरण कर लिया है उनको मरने की डर नहीं होती है जो दिन रात पाप में लगा रहता है उसे मरण का डर होता है जो धर्म की राह पर चलता है वह मरण को जीत लेता है अपने मरन से संथारा संलेखना धारण कर के अपने जीवन को सुधार लेता है।

संसार में माता पिता भाई बहन सभी को अपने संतान के प्रति और मोह थोड़ा भी रोना हो तो माँ से देखा नहीं जाता है कही कुछ न हो जाये, कही नीचे गिर न जाये माँ उसके ऊपर इतना समय बरसाती है। ऐसा ही तिर्यंच में भी होता है उन्हें भी अपने संतान के प्रति मोह रहता है। वे मां बाप को बंदर, बंदरिया, कुता – कुतीया अपने माँ से चिपक कर रहती है। एक मिनट के लिए भी माँ अपने बच्चे को छाती से लगाये रखती है। मनुष्य और तिर्यंच भी अपने बच्चे का पालन पोषण करते है, किसी को निकट नहीं आने देते हैं सामने वाला मारने वाला है तो उनसे भी भीड जाते है और पालन-पोषण करना चाहते है। एक बार बंदर बंदरिया नाच दिखाते हैं, और यह राजा बैठ कर देखते है और हर बात का समाधान मंत्री से कहते मंत्री से सलाह करके सिद्ध करके बताना चाहता है। झुंड के बीच में

एक बंदरी वृक्ष पर झलाक लगाती है और अपने बच्चों का पालन पोषण करते है वो भी अपने संस्कार आदि कला बंदरियों को सीखाते है राजा मंत्री से कहता है कैसे अपने संतान की रक्षा करती हैं तब मंत्री बोलता है जब खुद के ऊपर शंकट आता है तो छोड़कर भाग जाते हैं। वो मरा तो मरा मैं तो बच जाऊ खुद की रक्षा करता है। तब राजन कहता है ऐसा नहीं हो सकता है और मंत्री कहता है, मेरा बेटा मर रहा है कैसे बचाऊं। पानी गिर जाये, संकट आ जाये तो उस समय स्वयं की रक्षा करती है। एक कमरा बनाया और उसमें बंदर बंदरिया को अंदर मां के साथ डालकर उस कमरे में पानी छोडते है और पानी भरता गया। तब बंदरी ने बच्चे को नीचे डाला और उस पर खडी हो जाती है। तब तक स्वयं के प्राणों पर सकट नही आये तब तक बचाती है – राजन को संकट का स्वरूप समझ में आता है। कोई संतान अपराध करता है और पुलिस ढुंढ कर घर आती है तो माँ स्वयं बच जाती है और पुत्र को पकड़ा देती है अपना प्राण बचाना चाहते है। जिसने मोह को जीत लिया है वही अपने प्राणों को देकर बचाती है ऐसा कोई विरला ही होता है।

राजा अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए ऐलान कर दिया नव विवाहित को लाकर जेल में बंध कर दो (1 हजार 11 जोड़ा को बंध कर दिया जाये) क्या एक व्यक्ति के लिए इतने जीव की विराधना कैसे करू मंत्री ने सोचा राजा सुनने वाला नही है तो क्या करू और मन में आहाकार मच गया। मन में विचार आया और मां से सलाह मसहरा करने के लिए ग्यारह सौ जोड़ों को बचाऊं यदि बचाने में मेरे प्राण भी चले जाये तो कोई बात नहीं यह ठीक है। यह सोचकर सबको भगा दिया और सुबह राजन को पता लगा और उसे मालूम हुआ कि गयारह सौ जोड़ो को बचाकर पुण्य प्राप्त कर लूंगा। राजा ने जलाद को बुलाकर मंत्री के टुकडे करवा कर पूरे गाँव में फैंक दिया। कहते है जहाँ वे शरीर आयुष्य पूर्ण करके छे- काय जीवों की रक्षा करने के कारण उसकी दुर्गाति नही हुई । उन दो मित्रों की कहानी -क्या कोई वह जीव वाला दूध कोई पीयेगा – पत्नी तो छोड़कर चली गई, अब माँ को बुलाया गया – माँ आई और कहने लगा मेरा रोग मिट गया तो माँ मेरी रक्षा कर।

माँ से कहता है यह दूध पी लेंगे तो मेरा रोग दूर हो जायेगा और बच जाऊंगा । क्या माँ वो दूध पीयेगी क्या? मगर वो भी प्राण देकर बचा नहीं सकती । मां चिलाना शुरू करती है क्या तू मुझे मरने को कहता है तु मरे तो मर मुझे तेरी चिंता नहीं है इतना बोलकर माँ चली जाती है अब पिता दौड़कर आते है। उन्हें वह दूध पीने का आग्रह करता है पिताजी आता हूं बोलकर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। बाद में सभी मित्र आये अब वे एक दूसरे से मिलकर खुश होते है तभी वह मित्र अपने मित्र को दूध पिलाना चाहता था सभी छोड़कर चले गये हैं, जो वृद्धावस्था में आ गये वे भी साथ देने वाले नहीं है तभी देव मित्र कहता है यदि तु दीक्षा लेता है तो मै तेरा दु:ख दूर कर सकता हूँ संसार भोग विलाश में अपना जीवन समाप्त करते है भगवान ने जो राह दिखाया वही सच्चा मार्ग है । सच्चा स्वरूप समझकर संसार को समझ गया और संयम धारण करके, उत्कृष्ट संयम का पालन करके सिद्ध बुद्ध और मुक्त बन जाता है।

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