लालगंगा पटवा भवन में जारी है पुच्छिंसुणं आराधना Sagevaani.com /रायपुर। जंबूस्वामी की जिज्ञासा के उत्तर में सुधर्मा स्वामी ने एक अनूठे स्तोत्र पुच्छिंसुणं (वीर स्तुति) की रचना की, जिसकी आराधना लालगंगा पटवा भवन में जारी है। उपाध्याय प्रवर ने शनिवार को कहा कि पुच्छिंसुणं की 6 गाथा (स्तोत्र 9 से 14) के मूल सूत्र को ध्यान में रखोगे तो जीवन में नई यात्रा के लिए पथ खुलेगा। ये स्तोत्र हमारे अंदर के महावीर को जगाने के स्तोत्र है। और हम अपने अंदर के महावीर को क्यों नहीं जगा पा रहे हैं उसका उत्तर है। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि वीर्य है तो ख़ुशी है और ख़ुशी है तो वीर्य है। जिस काम को करने में आनंद आता है उस काम को करने से शक्ति का जागरण होता है। जिस काम को करने से आनंद नहीं आता है, उसमे शक्ति कम होती जाती है। जिस काम को करना है उसमे पूरी शक्ति लगा दो। परमात्मा जो भी कार्य करते थे उसमे अपनी पूरी शक्ति लगा ...
नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में कहा कि आत्म बंधुओ, अनादि काल से आत्मा संसार में परिभ्रमण कर रही है। परिभ्रमण का मूल कारण आठ कर्मो का बंधन है। इस बधंन से छुटकारा पाने कि परम व चरम औषधि धर्म है। धर्म के आभाव में न कोई आत्मा संसार से मुक्त हुई है न होगी। धर्म ही आत्मा को शाश्वत सुख प्रदान करता है इस संसार में सार्थक काम धर्म ही है पर अज्ञानता के कारण व्यक्ति प्रात: उठते ही निरर्थक कार्य में लग जाता है। ज्ञानीजन कहते है प्रात: उठते ही आत्म शुद्धि की क्रिया करो जैसे प्रात: उठते ही बासी झाड़ू, पानी छानना, दंत मंजन करना, मल विर्सजन करना आवश्यक है वैसे ही प्रात: उठते ही आत्मा शुद्धि के लिए प्रतिक्रमण करना आवश्यक है जिससे मन, वचन, काया तीनों की शुद्धि स्वतः ही हो जाती है । प्रतिक्रमण में कोई खर्चा नही लगता पर घर की शुद्धि व लिए खर्च कर अलने शरीर की शुद्धि कर...
गरीब और जरूमंद शिक्षा प्राप्त करने वाले बालक बालिकाओं को पढ़ने और लिखने के किट दिये संस्कार महिला शाखा ने Sagevaani.com /चैन्नई। ज्ञान की आरधना का महापर्व है ज्ञान पंचमी।शनिवार को साहुकार पेट भवन में महासती धर्मप्रभा ने ज्ञान पंचमी पर आयोजित धर्मसभा में श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि ज्ञान आत्मा का श्रंगार है और जीवन यापन का साधन है बिना ज्ञान के मनुष्य न धन कमा सकता है और नाहि संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है ज्ञान के बिना जीवन शून्य है। संसार में ज्ञान ही एक मात्र तरिका है जिससे मनुष्य धन प्राप्त कर सकता है और आत्मा को मुक्ति, इस संसार में सबसे पवित्र और मूल्यवान कौई वस्तू है तो वह ज्ञान जिसे कौई चुरा नहींं सकता है ज्ञान को जितना मनुष्य बांटेगा उतना ही उसका ज्ञान बढ़ेगा,घटने वाला नहीं है। अपनी आत्मा को जानना है तो ज्ञान से ही वो जान सकता है बिना ज्ञान के उसे न परमात्मा मिलने वाले...
शनिवार 18 नवम्बर 2023 को रत्नवंश के छठे पट्टधर जीवन निर्माण के शिल्पकार बालब्रह्मचारी आचार्य भगवन्त पूज्यश्री शोभाचंद्रजी म.सा का जन्म दिवस श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ,तमिलनाडु के तत्वावधान में ज्ञान दिवस के रुप मे स्वाध्याय भवन साहूकारपेट,चेन्नई में मनाया गया| विशेष रुप से ज्ञान पंचमी तिथि के पावन प्रसंग पर वरिष्ठ स्वाध्यायी आर.वीरेन्द्रजी कांकरिया ने मति श्रुत अवधि ज्ञान,मन पर्यय व केवल ज्ञान,मति श्रुत अज्ञान व विभंग ज्ञान का विस्तृत विवेचन किया | श्रावक संघ के कार्याध्यक्ष आर. नरेन्द्रजी कांकरिया ने जोधपुर में पिता भगवानदास छाजेड- माता पार्वती के यहां जन्म लेने वाले बालक शोभा के बाल्यकाल, दृढ़ वैराग्य आचार्यश्री कजोडीमलजी म.सा के पास बसन्त पंचमी के पर्व पर तेरह वर्ष की वय में दीक्षित होने से लेकर जीवन चरित्र के अनेक संस्मरणों का उल्लेख किया | माधवमुनिजी के संग ज्ञान चर्चाओं व उनके द्...
Sagevaani.com /चेन्नई. बिन्नी के श्री सुमतिवल्लभ नोर्थ टाउन जैन मंदिर के प्रांगण में पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने अपने प्रातःकालीन प्रवचन में कहा कि दीन-दुखियों को देखकर हमारे मन में करुणा और सेवा भाव उमड़े। ऐसा संवेदनशील हृदय जिसके पास है, वही भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। इसलिए समर्थ लोगों को दीन-हीनों और असहायों की बढ़-चढ़कर सेवा करनी चाहिए। इस प्रकार से मिला अवसर अपने हाथ से नहीं जाने दें। पूज्य आचार्य श्री आगे बोले कि प्रेम बंधन है, लेकिन लादा गया नहीं, स्वीकार किया हुआ। इसलिए वह बंधन प्यारा लगता है। प्रेम बांधता नहीं, बल्कि स्वयं बंधता है। व्रत इत्यादि, मन और इंद्रियों के संयम के लिए है। बिना संयम के अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना कठिन है। कुछ समय के बाद संयम सहज हो जाता है। सद्बुद्धि, मन की शुचिता और व्यवहार की शालीनता महान व्यक्ति की पहचान है। संतोष से शांति, शांति से सुख और...
नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि जिणवाणी स्वरूप गंगा मे भगवान महावीर ने संसार सागर से तिरने के लिए प्रवाहित की। भगवान महावीर ने दो प्रकार के धर्म बताये अणगार धर्म और आगार धर्म । जो अणगार धर्म को स्वीकार नही कर पाते वे गृहस्थ से दृढ़ता में रहते हुए भी श्रावक व्रत से जुड़ कर मर्यादा कर सकते है। व्रत पालन से दृढ़ता आती है। सागर समान पापों को बिन्दु कें समान बना लेता है। पाप से बचने लिए सोच समझ कर आनावश्य द्रव्यों का त्याग करता है। उसमें भी लाचारी, रोग, शोक के कारण प्रयोग करना पडे तो उसका आगार रख लेता है। ऐस साधक को भगवान ने अल्प इच्छुक बताया है। इसलिए भगवान ने श्रावक धर्म को तीर्थ का अंग बताया है। श्रावक स्वयं भी तिरता है और दूसरो को शिक्षा दे कर उन्हें भी धर्म से जोड़ता है जिससे उसका सम्यक्त्व मजबूत होता है स्वयं भी पतित नहीं होता और दूसरों को भी पतित होने से बचाता है बारह व्र...
लालगंगा पटवा भवन में जारी है पुच्छिंसुणं आराधना Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जंबूस्वामी ने जो भगवान महावीर को लेकर पूछा, उसका जवाब देते हुए सुधर्मा स्वामी ने कहा कि तुम्हे यदि परमात्मा के ज्ञान, दर्शन शील को जानना है तो पहले उनके धर्म को जानो। परमात्मा का धर्म कैसा है? कैसा जन्मा है? जिंदगी में जब भी कोई निर्णय करना हो तो उस समय भूतिप्रज्ञ बनकर निर्णय कीजिये। सुधर्मा स्वामी न तो विवेक की बात कर रहे हैं, न करुणा की। प्रायः हम जिंदगी में इसलिए पछताते हैं कि हमारी प्रज्ञा निर्णय करते समय भूतिप्रज्ञ नहीं होती। भूति मतलब ऐश्वर्य, विभूति। समृद्धि, कल्याण और सुरक्षा ये तीन आधार बनाकर निर्णय लोगे तो जिंदगी में कभी पछताने का मौका नहीं मिलेगा। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। शुक्रवार को पुच्छिंसुणं (वीर स्तुति) आराधना के तीसरे दिवस उपाध्याय प्रवर ने...
सुवर्ण इतिहास का अमर पुस्तक और जीवन को जीवंत (चैतन्यमय) निरिक्षण करनेवाले साध्वीजी को कोटिशः धन्यवाद… साधुवाद… अद्भूत चारित्रनायक, शासन के शूरवीर *पू.. आ. श्री यतीन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा* के हस्तो से दीक्षित एवं शिक्षित साध्वीजी भगवंत में शासन राग की विविधता – विशिष्टता एक साथ थी। साधना की विशेषता के प्रभाव से अंत समय भी जागृत अवस्था को त्याग के शिखर तक ले गए। देहत्याग के कुछ समय पूर्व भरतभाई लाडू दादा आदिनाथ के दर्शन करवाने ले गए। तृप्त मन से दादा का मिलन किया। दर्शन-ज्ञान-चारित्र में लीन साध्वीजी को उम्र या अवस्था अवरोधरूप नहीं बनी। भरतभाई अत्यंत उत्कृष्ट भाव से वैयावच्च कर रहे है। श्री सौधर्म बृहद तपोगच्छीय त्रिस्तुतिक जैन संघ की वैयावच्च-भक्ति सर्वदा उत्कृष्ट रहती है। दिनरात ट्रस्टीवर्य वाघजीभाई आदि, शशीभाई जैसे श्रावक सदा जागृत है। अनेक आत्माओ का योगक्षेम कल्याण करने...
गुरु गणेश मिश्री पावन धाम सुल्लूरपेठ के प्रांगण में परम पूज्य स्पष्ट वक्ता श्री कांति मुनि जी म. सा. एवं श्रमण संघीय उप प्रवर्तक परम पूज्य श्री पंकज मुनि जी म. स. के पावन सान्निध्य में 19 नवंबर को कर्नाटक गज केसरी घोर तपस्वी श्री गणेश लाल म.सा. की पावन जन्म जयंती गुणगान सभा एवं सामायिक दिवस के रूप मनाई जाएगी । उपरोक्त जानकारी देते हुए मुनि रत्न श्री रूपेश मुनि जी म. सा. ने फरमाया कि इस अवसर पर दक्षिण सूर्य पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री वरुण मुनि जी म. सा. आदि संत जन कर्नाटक गज केसरी जी महाराज के जीवन पर विशेष रूप से अपने श्रध्दापुष्प अर्पित करेंगे। विद्याभिलाषी लोकेश मुनि जी म ने बताया कि कर्नाटक गज केसरी घोर तपस्वी श्री गणेश लाल जी म.सा. का दक्षिण भारत पर विशेष उपकार रहा है, उनके तप त्यागमय जीवन पर सभी गुरू भक्तों की श्रध्दा जुडी हुई है। उनका नाम लेने मात्र से ही बिगडे हुए काम संवर जाते हैं, ऐसे...
Sagevaani.com /चैन्नई। धर्म से ही आत्मा का अभ्युदय होता है और आत्मा को संसार से मुक्ति मिलती है। गुरूवार साहुकार पेट जैन भवन में महासाध्वी धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रध्दालूओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि धर्म-कर्म से ही आत्मा का कल्याण हो सकता है। मानव भव बार बार नहीं मिलता है अंनत पुण्यवानी करने पर प्राप्त होता था। मनुष्य जीवन मिलने के बाद उसने धर्म के मार्ग पर वो नहींं चलता है तो उसे जीवन में सुख नहीं मिल पाएगा और ना हि वह अपनी आत्मा को संसार से मुक्ति दिलवा सकता है आत्मा को मुक्ति तब मिल सकती है जब मनुष्य मोह का त्याग करे और वह पुरूषार्थ करता है तो वह अपने मानव भव को सार्थक बना सकता है और इस आत्मा को अनंता अनंत जीवा योनियों के दुखों में भटकने से बाहर निकालकर आत्मा को मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति करवा सकता है। साध्धी स्नेहप्रभा ने कहा कि क्रोध और तूफान एक जैसे होते हैं, दोनों के शा...
आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में दैनिक प्रवचन देते हुए कहा कि अगर जिंदगी में कुछ करना है तो एक जिंदगी में हजार जिंदगी के बराबर काम करना होगा तभी आप को सफलता मिल सकती हैं इसका मतलब यह है कि सफल इंसान बनने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी होगी। यह बात बिल्कुल सच है कोई भी आज तक बिना मेहनत किये बड़ा नहीं बना है जिंदगी में कामयाब होने के लिए आपको बहुत कठिन मेहनत करनी पड़ेगी। लाइफ में कामयाब होने के लिए सबसे पहली बात है अप टू डेट रहना। दुनिया के साथ साथ चलना और दुनिया में होने वाले बदलाव को कबूल करना। अगर आप पीछे रह गए तो बाद में आप नए कन्वर्शन को समझ नहीं पाओगे और आप दुनिया से बहुत पीछे रह जाओगे। दुनिया वाले आप से बहुत आगे निकल जाएंगे। नतीजन आप फेल हो जाओगे और आपकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। ईश्वर ने आपको जिंदगी दी है कुछ नया करने और दूसर...
Sagevaani.com /रायपुर। जंबूस्वामी की जिज्ञासा से एक अनूठे स्तोत्र का जन्म हुआ। सुधर्मा स्वामी ने उनकी जिज्ञासा को शांत करते हुए पुच्छिंसुणं की 108 पंक्तियों में प्रभु महावीर के साथ बिताये 30 वर्षों के अनुभव को सजाया है। पुच्छिंसुणं एक अनूठा स्तोत्र है जिसे प्रभु के जीवन को जीने वाले सुधर्मा स्वामी अपने शब्दों में सजाया है और बुधवार से इसकी आराधना लालगंगा पटवा भवन में शुरू हुई है। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि के मुखारविंद से श्रावक इस आराधना का लाभ ले रहे हैं। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। गुरुवार को उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सुधर्मा स्वामी ने सबसे पहले प्रभु की उस विशेषता का जिक्र किया कि जो हमारी नजर से ओझल होती है। हम शुरुआत करते हैं कि प्रभु करुणा के सागर है, परमा पराक्रमी है, लेकिन सुधर्मा स्वामी ने क्षेत्रेज्ञ से शुर...