लालगंगा पटवा भवन में जारी है पुच्छिंसुणं आराधना
Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जंबूस्वामी ने जो भगवान महावीर को लेकर पूछा, उसका जवाब देते हुए सुधर्मा स्वामी ने कहा कि तुम्हे यदि परमात्मा के ज्ञान, दर्शन शील को जानना है तो पहले उनके धर्म को जानो। परमात्मा का धर्म कैसा है? कैसा जन्मा है? जिंदगी में जब भी कोई निर्णय करना हो तो उस समय भूतिप्रज्ञ बनकर निर्णय कीजिये। सुधर्मा स्वामी न तो विवेक की बात कर रहे हैं, न करुणा की। प्रायः हम जिंदगी में इसलिए पछताते हैं कि हमारी प्रज्ञा निर्णय करते समय भूतिप्रज्ञ नहीं होती। भूति मतलब ऐश्वर्य, विभूति। समृद्धि, कल्याण और सुरक्षा ये तीन आधार बनाकर निर्णय लोगे तो जिंदगी में कभी पछताने का मौका नहीं मिलेगा। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी।
शुक्रवार को पुच्छिंसुणं (वीर स्तुति) आराधना के तीसरे दिवस उपाध्याय प्रवर ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रभु महावीर का आचार स्ट्रक्चर में नहीं है और सिस्टम में केवल पशु जीते हैं। जानवर के बारे ने आप कह सकते हैं कि यह क्या करेगा, लेकिन मनुष्य के बारे में हम नहीं कह सकते। जानवर प्रेडिक्टेबल होते हैं और मनुष्य अनप्रेडिक्टेबल। तीर्थंकर तो एक्सट्रीम अनप्रेडिक्टेबल हैं।
तुम्हे पता रहता है कि कुत्ते को रोटी डालोगे तो वह दुम हिलायेगा, ये प्रेडिक्टेबल है। जानवर एक पैटर्न या नियम का अनुसरण करता है। मनुष्य नियम को तोड़कर उससे बाहर निकलता है। लेकिन उसका इरादा क्या है, इससे तय होता है कि नियम टूटना चाहिए कि नहीं। एक गुंडा भी नियम तोड़ता है, और तीर्थंकर भी नियम तोड़ते हैं, लेकिन उस नियम को तोड़ने का कारण क्या है? अगर कल्याण, समृद्धि उद्देश्य है तो नियम महत्वपूर्ण नहीं हैं। जिनके पास प्रज्ञा नहीं है उन्हें अपने कल्याण के लिए नियमों का पालन करना चाहिए। और जिनके पास कल्याण की प्रज्ञा है वे नियमों का पालन कर ही नहीं सकते है। किसी सर्प की बांबी पर खड़ा रहना कोई नियम है क्या? लेकिन परमात्मा उस नियम को तोड़ते हैं।
उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जीवन एक प्रवाह में चलता है। नींद आने पर हम सोते हैं, भूख लगने पर हम खाना खाते हैं। प्रवाह में चलने वाले को दूसरा आयाम नजर नहीं आता। नींद आने के बाद उसे केवल बिस्तर नजर आता है, इसके अलावा उसके पास कोई और विकल्प नहीं होता है। लेकिन परमात्मा इस प्रवाह को तोड़ते हैं।
जब झपकी आती थी तो परमात्मा घूमना शुरू कर देते थे। वे प्रवाह से बाहर चले जाते थे। अनन्तचक्षु बन जाते थे, कई रास्ते दिखाई देते थे। हम जीवन में एक ही रास्ता अपनाते हैं, इसलिए परिणाम भी एक सा मिलता है। परिणाम तभी बदलेंगे जब हम नया रास्ता चुनेंगे। अनन्तचक्षु पाना है तो प्रवाह को बदलो, उससे बाहर निकलो, तभी नए आयाम दिखेंगे।
सुधर्मा स्वामी कहते हैं कि परमात्मा सूर्य के समान हैं, वहीं अगली पंक्ति में कहते हैं कि वे अग्नि के समान हैं। ऐसा वे क्यों कहते हैं? सूरज अंधकार को समाप्त करता है, लेकिन जब दीपक जलाते हैं तो जहां तक उसकी रौशनी जाती है वहां तक दिखता है, और उसके आगे का अँधियारा भी दिखता है। सूरज अंधकार को समाप्त कर देता है और दीपक की लौ से उजाला और अँधेरा भी दिखता है। अँधेरा पाप है और पुण्य उजाला है, जो पुण्य और पाप को देख सकता है वही धर्म कर सकता है।
परमात्मा कहते है कि दोनों को जान। पाप और पुण्य को जानोगे तभी जीवन में आगे बढ़ पाओगे। केवल पुण्य या पाप को जानकर निर्णय नहीं कर सकते। यदि किसी ने जीवन में केवल अच्छा ही देखा है और उसके जीवन में कभी बुरा आ गया तो वह कभी उठ नहीं पायेगा। इसलिए अगर जब हमें अच्छे और बुरे पल पता चलेंगे तभी हम जीवन में आगे बढ़ पाएंगे। उपाध्याय प्रवर ने आगे पूछा कि पार्टी बढ़िया होती है कि उसका नेता उसे अच्छा बनता है? अगर नेता अच्छा होगा तो पार्टी भी अच्छी होगी। धर्म तभी श्रेष्ठ होता है जब उसका नेतृत्व करने वाला श्रेष्ठा हो। जब तक जिनशासन का नेतृत्व महावीर के हाथों में था, दुनिया के हर कोने में यह धर्म पहुंचा था। धर्म को पुनः उसी स्तर पर ले जाना है तो नेतृत्वकर्ता को महावीर बनाना पड़ेगा।