नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि जिणवाणी स्वरूप गंगा मे भगवान महावीर ने संसार सागर से तिरने के लिए प्रवाहित की। भगवान महावीर ने दो प्रकार के धर्म बताये अणगार धर्म और आगार धर्म । जो अणगार धर्म को स्वीकार नही कर पाते वे गृहस्थ से दृढ़ता में रहते हुए भी श्रावक व्रत से जुड़ कर मर्यादा कर सकते है।
व्रत पालन से दृढ़ता आती है। सागर समान पापों को बिन्दु कें समान बना लेता है। पाप से बचने लिए सोच समझ कर आनावश्य द्रव्यों का त्याग करता है। उसमें भी लाचारी, रोग, शोक के कारण प्रयोग करना पडे तो उसका आगार रख लेता है। ऐस साधक को भगवान ने अल्प इच्छुक बताया है। इसलिए भगवान ने श्रावक धर्म को तीर्थ का अंग बताया है।
श्रावक स्वयं भी तिरता है और दूसरो को शिक्षा दे कर उन्हें भी धर्म से जोड़ता है जिससे उसका सम्यक्त्व मजबूत होता है स्वयं भी पतित नहीं होता और दूसरों को भी पतित होने से बचाता है
बारह व्रत धारण कर दूसरों को बारह व्रत धारण करने की प्रेरणा देनी चाहिए जिससे स्वयं आराधना करते -2 जीवन को मर्यादित और संयमित कर भव सागर से पार कर सकता है। धर्म पालन करने से चलता है यदि पालन न करे तो एक दिन धर्म लुप्त हो जाता है। पहले के जैनो का रहन-सहन, खान- पान सब ऊँचा था इसलिए हाथ जोड़ कर जैनो का सम्मान होता था पर आज भेद की रेखा मिटा दी गई जिससे सम्मान भी मिट गया। जितनी द्रव्यों की मर्यादा रहेंगी उतना व्रत पालन में सहजता रहेगी। जितनी व्रत पालन में मजबूती रहेगी उतनी ज्यादा कर्म निर्जरा होगी खान-पान से व्यक्ति की पहचान होती है। न कि ब्रांडेड कपड़े व 50 लाख की कार से।