श्री वासुपूज्यस्वामी जैन संघ मैलापुर के आराधना भवन में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि छह विकारों में मद अर्थात् अहंकार पतन का चौथा कारण द्वार है। यह मनुष्य का स्वयं अर्जित किया हुआ मनोरोग है। रोग का अर्थ होता है शरीर की प्रक्रिया को विकृत कर देना। जिस प्रकार भला-चंगा हाथी मदांध हो जाता है तो वह विवेक खो देता है और गलत आचरण करने लगता है उसी प्रकार मनुष्य जब मदांध हो जाता है तब उसका विवेक नष्ट हो जाता है। विवेक के बगैर मनुष्य पशु से भी बदतर हो जाता है। पशु का अर्थ होता है जो पाश में बंधा हो। पशु को इसलिए बांधा जाता हैं कि वह अविवेकी प्राणी है। कभी-कभी मदांध व्यक्ति को भी पाश में बांधा जाता है ताकि वह गलत आचरण न करे। ऐसा इसलिए, क्योंकि, पशुता केवल पशु का ही धर्म नहीं है, कुछ मनुष्य भी पशु तुल्य बन जाते हैं, जब उनका अपना सब कुछ नष्ट हो जाता है और वे गलत आवरण ओढ़ लेते ...
◆ एजुकेशन टुडे ने सीबीएसई बोर्ड में समग्र शिक्षा के अन्तर्गत किया सम्मानित ◆ बंगलुरू में आयोजित समारोह में प्राप्त हुआ पुरस्कार Sagevaani.com /Chennai : परम श्रद्धेय गुरुदेव आचार्य श्री महाश्रमणजी के वर्ष 2018 के चेन्नै चातुर्मास स्थल पर जैन तेरापंथ वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा संचालित आचार्य महाश्रमण तेरापंथ जैन पब्लिक स्कूल, माधावरम को शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित ‘एजुकेशन टुडे’ द्वारा किये गए एक सर्वे में सीबीएसई स्कूल पेरामीटर मापदंडों के आधार पर समग्र शिक्षा Holistic Education में सम्पूर्ण भारत में प्रथम स्थान के गौरवशाली सम्मान से सम्मानित किया गया। एजुकेशन टुडे द्वारा सर्वे में देश भर में सम्मिलित कुल 1860 विद्यालयों मे से अगले स्तर पर चयनित 400 विद्यालयों के अंतिम चरण में आचार्य महाश्रमण तेरापंथ जैन पब्लिक स्कूल को यह सम्मान प्राप्त हुआ है। बंगलुरू में सोमवार को पांच सितारा होटल ‘...
राजा, रंक किसी के लिए अहंकार फलदायी नहीं है। विनाश का प्रमुख कारण अहंकार ही हैं। धन, संपदा, यश, वैभव, कीर्ति, ताकत किसी भी चीज का घमंड मनुष्य में नहीं होना चाहिए और यदि ऐसा है तो एक समय यह सभी तत्व साथ छोड़ देते हैं। अहंकार हमें पतन की ओर ले जाता है। हमारे शास्त्रों में इसका स्पष्ट उल्लेख भी हैं। उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने मैलापुर के श्री वासुपूज्यस्वामी जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही, उन्होंने आगे कहा कि नम्रता, विनम्रता और सहिष्णुता व्यक्ति को सदैव शिखर पर ले जाती है। सहृदयी व्यक्ति का आदर और सम्मान हर जगह हैं। पद, प्रतिष्ठा गुरुदेवों की विशेष कृपा पर प्राप्त होती हैं। इसका सुख भोगने वाले अक्सर अहंकार में आ जाते हैं। उन्हें लगता है कि अब उनके मुकाबले कोई नहीं हैं। यही अहंकार उन्हें एक दिन घुटन में डाल देता है। व्यक्ति के जीवन के दुखों का कारण अहंकार ही होता है व्यक्त...
पू.आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया की शिष्य ने पुछा गुरुदेव श्रावक की – क्या पहचान हे? 1 पाप भीरुता – गुरु ने बताई पाप से डरते है श्रावक होते हैं। साधु या श्रावक पहली पहचान पाप से डरना चाहिए, पाप से डरते नही पर आप साधु या श्रावक नहीं है। श्रावक वह जिसके जीवन में पाप से डर है पापो का सीरमोर कौन है? *मोह* पापों का सिरमौर है दो मानव है संसार में *एक मोह को जीतने वाले साधक*, *दूसरे मोह में जीने वाले संसारी है।* जो मोह में जीते है वह संसारी जो मोह को जीतते हे वह साधक है। धर्म स्थान पर उपस्थित हुए इससे प्रमाणिक होता है कुछ अंशों में मोह को जीता है इसलिए आये है। गर्मागर्म चर्चाओ को छोडकर यहाँ प्रवचन सुनने के लिये आये हो • इससे साबित होता है थोड़ा थोड़ा मोह को जीता है। 1,,मोह में जीने वाले से घर, दुकान, माया का मोह नहीं छुतटा,,, office जाकर मोह की पूर्ति कर रहे है। नगर में संत जात...
आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी एवं मुनि श्री महापद्मसागरजी का सोमवार को मैलापुर के श्री वासुपूज्यस्वामी जैन संघ में पदार्पण हुआ, हर्षोल्लास के साथ आचार्य श्री का संघ जनों ने स्वागत किया, पश्चात धर्म सभा का आयोजन हुआ, आचार्य श्री ने कहा कि हमारे शास्त्रों में विभिन्न रसों के रूप में शृंगार, करूणा, हास्य, वीर, अद्भुत, रौद्र, भय, वीभत्स और शांत के रूप में किया गया है। जिस प्रकार रक्त का प्रवाह मनुष्य को जीवित रखता है, उसी प्रकार इन रसों का संचरण हमारे चित्त को प्रसन्न, सुखी या दुखमय बनाता है। हमारा जीवन जब तक अनेक रसों से सराबोर रहता है तब तक हमें उनका आनंद मिलता है। सबसे श्रेष्ठ कहे गए रस शृंगार में सुंदरता की झलक तन और मन को प्रफुल्लित बनाए रखती है लेकिन जब इसका अभिमान हो जाए तो नतीजा कुरुपता में भी निकल सकता है। जीवन में जब तक अपने और दूसरों के प्रति करूणा का भाव रहता है तब तक मन में सेवा ...
पू.आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया कि.., एक बार भजन करते, मुक्ति का जतन कर ले, कट जायेगी चौरासी, तु प्रभु का भजन कर ले ।। एक बार गुरु और शिष्य का संवाद चल रहा था शिस्य ने पुछा श्रावक की पहचान क्या है? पहचान से पता चलता है कौन कैसा होता है! श्रावक की क्या पहचान है? लोगों की भीड़ में कौन आपकी पहचान कर सके। पहचान के दो रुप है… 🔻एक पहचान पहनावे (वेशभुषा ) से होती है। बाह्य पहचान होती है। यह सही व गलत भी हो सकती है,, दो पहचान है श्रावक की- ① *श्रावक पाप भीरू होता है* पाप से डरता है वह श्रावक होता है। जन्म लेने मात्र से श्रावक नहीं बनता। वकील या डॉ के घर जन्म लेने से नही.. पुरुषार्थ से बनता है। पाप के पति डर नही वह श्रावक नहीं होता है,, आप पाप करते है तो डर पैदा होता है, संकोच होता है, में इस पाप की सजा नहीं भोग नहीं सकता, पाप की अनिच्छा है तो आप श्रावक है। श्रावक पाप कर रहे हे , भ...
पू.आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया कि.., एक बार भजन करते, मुक्ति का जतन कर ले, कट जायेगी चौरासी, तु प्रभु का भजन कर ले ।। एक बार गुरु और शिष्य का संवाद चल रहा था शिस्य ने पुछा श्रावक की पहचान क्या है? पहचान से पता चलता है कौन कैसा होता है! श्रावक की क्या पहचान है? लोगों की भीड़ में कौन आपकी पहचान कर सके। पहचान के दो रुप है… 🔻एक पहचान पहनावे (वेशभुषा ) से होती है। बाह्य पहचान होती है। यह सही व गलत भी हो सकती है,, दो पहचान है श्रावक की- ① *श्रावक पाप भीरू होता है* पाप से डरता है वह श्रावक होता है। जन्म लेने मात्र से श्रावक नहीं बनता। वकील या डॉ के घर जन्म लेने से नही.. पुरुषार्थ से बनता है। पाप के पति डर नही वह श्रावक नहीं होता है,, आप पाप करते है तो डर पैदा होता है, संकोच होता है, में इस पाप की सजा नहीं भोग नहीं सकता, पाप की अनिच्छा है तो आप श्रावक है। श्रावक पाप कर रहे हे , भगव...
श्री जैन महासंघ की त्रिवर्षीय टीम का हुआ मनोनयन Sagevaani.com /चेन्नई : श्री जैन महासंघ, चेन्नई की वार्षिक साधारण सभा का आयोजन तेरापंथ सभा भवन, साहुकारपेट में हुआ। नमस्कार महामंत्र सामुहिक स्मरण के बाद राजेन्द्र भण्डारी के मंगलाचरण के साथ कार्यवाही प्रारम्भ हुई। अध्यक्ष श्री राजकुमार बडजात्या ने स्वागत स्वर प्रस्तुत करते हुए, गत तीन वर्षों में पदाधिकारियों, समिति सदस्यों के साथ समस्त जैन समाज के मिले अतुलनीय सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। तेरापंथ सभा की और से सभाध्यक्ष उगमराज सांड ने स्वागत अभिनन्दन किया। महामंत्री सुरेश कागरेचा ने वर्ष भर के कार्यों की जानकारी सदन को दी। तत्पश्चात सदन में आगामी त्रिवर्षीय टीम के लिए श्री पन्नालाल सिंघवी ने सदन में चयन प्रक्रिया प्रारम्भ की। सर्वसम्मति से श्री प्यारेलाल पितलिया को आगामी कार्यकाल के लिए अध्यक्ष मनोनीत किया गया। उसके बाद अन्य पदाधिकारी में उपा...
Sagevaani.com /Chennai: शांतिवल्लभ लुम्बिनी जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि असफलता किसी भी योद्धा का एक पंख होती है। गिरने के अनुभव के बिना उड़ने वाला व्यक्ति स्वयं को उड़ने वाला नहीं कह सकता। हममें से हर कोई पहले से ही किसी न किसी चीज़ में विफल रहा है, चाहे वह स्कूल के संगीत नाटक के दौरान एक उच्च नोट हिट करने में विफलता के रूप में सरल हो, या किसी व्यावसायिक सौदे को पूरा करने में विफल होने और पदोन्नति हासिल करने में विफलता के रूप में निराशाजनक हो, हम में से हर किसी ने अपने स्वयं असफलता के स्वाद का अनुभव किया है। असफलता एक सीढ़ी है। वास्तव में, जीवन के निम्न बहुत शक्तिशाली सबक हैं जिन्हें असफलता हमें सिखाने और विकसित करने में मदद करती है। जब हम किसी चीज़ से गुजरते हैं और प्रत्यक्ष अनुभव के साथ आगे बढ़ सकते हैं, तो इससे हमें जीवन के प्रति गहरी समझ विकसित ...
भावुक माहौल में जैन साध्वियों ने शिवपुरी से ली विदा, पद बिहार कर पहुंचेंगी इंदौर Sagevaani.com /शिवपुरी। शिवपुरी में सफल और सार्थक चार्तुमास संपन्न करने के बाद प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी ठाणा पंाच सतियों ने आज भावुक माहौल में शिवपुरी से विदाई ली। इस अवसर पर वहां मौजूद बहुत से स्त्री पुरूषों की आंखों में विदाई बेला के अवसर पर आंसु आ गए। साध्वी रमणीक कुंवर जी ने कहा कि हम शिवपुरी में मिले अपनत्व और प्रेम को कभी भूल नहीं पाऐंगे। इस नगरी ने हम पर बहुत प्यार लुटाया है और यहां के लोग धर्मप्रेमी है। देव, गुरू और धर्म के प्रति उनमें अगाध श्रृद्धा है। इसके बाद साध्वी रमणीक कुंवर जी ने वहां सैकड़ों की संख्या में उपस्थित भक्तजनों को मांगलिक का लाभ दिया और शिवपुरी से अगले पड़ाव की ओर रवानगी डाली। पहले दिन जैन साध्वी शिवपुरी से 10 कि.मी. पद बिहार कर राजकुमार जैन जड़ी बूटी बालों के फार्म हाउस पर पह...
शिवपुरी चार्तुमास के अंतिम उपदेश में जैन साध्वियों ने किया भावविभोर, मांगी अपनी गुरू दक्षिणा Sagevaani.com /शिवपुरी ब्यूरो। पांच माह तक चार्तुमास में शिवपुरी में धर्म की गंगा प्रवाहित करने वाली प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी ठाणा पांच सतियों ने आज अपने अंतिम धर्मोपदेश में धर्म प्रेमियों को भावविभोर कर दिया। आदर्श नगर में यशवंत सांड के निवास स्थान पर आयोजित धर्मसभा में साध्वी रमणीक कुंवर जी ने कहा कि जीवन में धर्म और धन दोनों जरूरी है, लेकिन लगता है कि हम उन दोनों का सही उपयोग भूल गए हैं। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कहा कि इस बार शिवपुरी को चार्तुमास पांच माह का मिला है। पांच माह हमने आपको जिनवाणी सुनाई है। अब परीक्षा का समय है, देखना है कि इस जिनवाणी का आप कैसे उपयोग करते हैं और कैसे अपने जीवन में उतार कर उसे सार्थक करते हैं। इस संबंध में उन्होंने एक प्रेरक कथा भी सुनाई और कहा कि कल हम...
आचार्य श्री वर्धमानसागरसूरिजी एवं आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी महाराज शुक्रवार को बिन्नी नोर्थटाउन से विहार करते हुए टीविएच लुम्बिनी पधारे, लुम्बिनी जैन संघ में प्रवचन देते हुए आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि भविष्य के लिए संग्रह ही दुख का कारण है। अगर पशु-पक्षी की तरह मनुष्य भी वर्तमान में जीने लगे तो वह भी दुखी नहीं होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि दुख कल की चिंता में है, कल के लिए जो संग्रह हो रहा है, उसमें दुख है। वही दुख मन में असंतोष पैदा करता है, जिस कारण आज प्रत्येक व्यक्ति अपने सिर पर भविष्य की चिंता की गठरी लिए भागे जा रहा है। पक्षी अपने जीवन के एक-एक क्षण को भोग लेता है और मनुष्य को पूरे जीवन में एक क्षण भी जीने का सौभाग्य नहीं मिलता। कोयल आधी रात में वृक्ष की डाली पर गाती रहती है और मनुष्य उस समय चिंता की अग्नि में जलता रहता है, क्योंकि उसे और चाहिए। उसे जो भी प्राप्त हो जात...