राजा, रंक किसी के लिए अहंकार फलदायी नहीं है। विनाश का प्रमुख कारण अहंकार ही हैं। धन, संपदा, यश, वैभव, कीर्ति, ताकत किसी भी चीज का घमंड मनुष्य में नहीं होना चाहिए और यदि ऐसा है तो एक समय यह सभी तत्व साथ छोड़ देते हैं।
अहंकार हमें पतन की ओर ले जाता है। हमारे शास्त्रों में इसका स्पष्ट उल्लेख भी हैं। उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने मैलापुर के श्री वासुपूज्यस्वामी जैन संघ में प्रवचन देते हुए कही, उन्होंने आगे कहा कि नम्रता, विनम्रता और सहिष्णुता व्यक्ति को सदैव शिखर पर ले जाती है। सहृदयी व्यक्ति का आदर और सम्मान हर जगह हैं। पद, प्रतिष्ठा गुरुदेवों की विशेष कृपा पर प्राप्त होती हैं। इसका सुख भोगने वाले अक्सर अहंकार में आ जाते हैं। उन्हें लगता है कि अब उनके मुकाबले कोई नहीं हैं। यही अहंकार उन्हें एक दिन घुटन में डाल देता है।
व्यक्ति के जीवन के दुखों का कारण अहंकार ही होता है व्यक्ति खुद को श्रेष्ठ समझता है और अहंकारवान बन जाता है पर जब सच्चाई सामने आती है तो वह परेशान होता है.अहंकार का शिकारी खुद के बारे में नहीं सोचता है.वह खुद को दूसरो से बेहतर समझता है. हमें अपने जीवन को सफल बनाने के लिए तथा अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए अहंकार कि इस बीमारी को दूर भगाना होगा। अपने जीवन में नम्रता को स्थान देना चाहिए किसी व्यक्ति को नीचा नहीं समझना चाहिए सभी के पास ज्ञान होता है. अहंकार से व्यक्ति की आंतरिक शक्तियां छीन होती है। अहंकार से मुक्ति के लिए हमें किसी व्यक्ति से तुलना नहीं करनी चाहिए। किसी भी परिस्थिति में खुद को श्रेष्ठ ना समझें अहंकार व्यक्ति के चरित्र को क्षति पहुंचाता है।