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दूसरों के प्रति करूणा का भाव मन में सेवा का भाव उत्पन्न करता है : देवेंद्रसागरसूरि

दूसरों के प्रति करूणा का भाव मन में सेवा का भाव उत्पन्न करता है : देवेंद्रसागरसूरि

आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी एवं मुनि श्री महापद्मसागरजी का सोमवार को मैलापुर के श्री वासुपूज्यस्वामी जैन संघ में पदार्पण हुआ, हर्षोल्लास के साथ आचार्य श्री का संघ जनों ने स्वागत किया, पश्चात धर्म सभा का आयोजन हुआ, आचार्य श्री ने कहा कि हमारे शास्त्रों में विभिन्न रसों के रूप में शृंगार, करूणा, हास्य, वीर, अद्भुत, रौद्र, भय, वीभत्स और शांत के रूप में किया गया है।

जिस प्रकार रक्त का प्रवाह मनुष्य को जीवित रखता है, उसी प्रकार इन रसों का संचरण हमारे चित्त को प्रसन्न, सुखी या दुखमय बनाता है। हमारा जीवन जब तक अनेक रसों से सराबोर रहता है तब तक हमें उनका आनंद मिलता है। सबसे श्रेष्ठ कहे गए रस शृंगार में सुंदरता की झलक तन और मन को प्रफुल्लित बनाए रखती है लेकिन जब इसका अभिमान हो जाए तो नतीजा कुरुपता में भी निकल सकता है। जीवन में जब तक अपने और दूसरों के प्रति करूणा का भाव रहता है तब तक मन में सेवा का भाव बना रहता है लेकिन जैसे ही दया का भाव उसमें मिल जाता है, उससे उत्पन्न घमंड सभी किए कराए पर पानी फेर देता है।हास्य रस अर्थात स्वयं को हंसी खुशी रखने और दूसरों को अपनी उपस्थिति से आनंद का अनुभव कराने का नाम है।

लेकिन जब इसका स्वरूप किसी की पीड़ा पर मुस्कुराने और मजा लेने का हो जाए तो इसका असर दूसरों का अपने प्रति नफरत का हो जाता है। वीरता अपने आप में श्रेष्ठ और सम्मान योग्य है और कहा भी गया है कि वीर ही पृथ्वी के सभी सुखों का उपभोग करते हैं। लेकिन यही वीरता जब किसी कमजोर को दबाने में इस्तेमाल की जाती है तो इसका स्वरूप आततायी का हो जाता है। इसी प्रकार रौद्र रस है जो क्रोध में बदल जाए तो सब कुछ भस्म करने के लिए पर्याप्त है। भय का संचार जहां संसार में निर्भय होकर जीने का संकेत देता है, वहां इसका विकृत रूप आतंक का पर्याय बन जाता है।

सबसे अंत में शांत रस आता है जो अगर मिल जाए तो जीवन धन्य हो जाता है। मनुष्य को जीवन का अर्थ और इसका मूल्य समझ में आ जाता है। अपने से किसी का अहित न हो और कोई मेरा नुक्सान न कर सके, यह जब समझ में आने लगता है तब ही व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और संसार जीवंत हो पाता है, जीने लायक बन पाता है। हमारे जीवन में सभी रस तरह तरह के रंग भरते हैं और हम उनसे सराबोर होकर अपनी दिनचर्या तय करते हैं। जिंदगी जीने लायक बनती है और अकेले अपनी राह चलते हुए भी अकेलेपन का एहसास नहीं होता। लगता है कि आप भीड़ में अकेले नहीं हैं बल्कि सबके साथ चल रहे हैं।

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