*क्रमांक — 469* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹किन पुद्गलों का और कितने आत्मप्रदेशों से ग्रहण ?* *👉 भगवती सूत्र में लिखा है कि जीव उन्हीं पुद्गलों को ग्रहण करता है, जो उसके प्रदेशों में अवगाढ़ होते हैं। वह आकाश-प्रदेशों के अनन्तर और परम्पर प्रदेशों में अवगाढ़ कर्म-पुद्गलों को ग्रहण नहीं करता है। इसका अर्थ हुआ जीव जिस क्षेत्र में अवस्थित है, उससे संलग्न आकाश-प्रदेश में स्थित पुद्गल वर्गणा को ही ग्रहण करता है। यहाँ पर संलग्न का तात्पर्य मात्र एक आकाश-प्रदेश नहीं है। अपितु उसके पार्श्ववर्ती आकाश-प्रदेश भी एक-दूसरे से यदि संलग्न हैं, तो जीव उन पुद्गलों को ग्रहण करता है। लेकिन मध्यवर्ती आकाश-प्रदेश छोड़कर उससे आगे के आकाश- प्रदेशों पर स्थित पुद्गल वर्गणा को वह कभी ग्रहण नहीं कर सकता।* *भगवती सूत्र में वर्णित सव्वेणं सव्वं बंधइ सिद्धान्त से आत्मा के समस्त प्रदेशों के कर्मबंधन होता है। इसी...