कनिष्ठा पर समाप्त होता है ! हृदय रेखा जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा के ऊपर हथेली के शीर्ष पर स्थित होती है ! इसका आरम्भ तीन महत्वपूर्ण स्थानों गुरु पर्वत के मध्य से, पहली और दूसरी उंगलियों के बीच और शनि पर्वत के मध्य से होता है ! यह जातक की विपरीत लिंग के मध्य आकर्षण, भावनात्मक स्थिरता और मनोवैज्ञानिक सहनशक्ति का विश्लेषण करने के काम आती है ! यदि एक हाथ की हृदय रेखा स्पष्ट नहीं है पर दूसरे हाथ में हृदय रेखा स्पष्ट है तो वह व्यक्ति प्रेम में असफल होता है ! – हृदय रेखा जितनी लम्बी हो और गुरु पर्वत पर जितने अंदर से प्रारम्भ होती हो तो वह व्यक्ति उतना ही प्रेम में निपुण होगा ! – यदि हृदय रेखा की कोई रेखा मस्तिष्क रेखा को काटती है तो परिवार में मानसिक क्लेश होता है ! – यदि हृदय रेखा से छोटी-छोटी रेखाएं आकर मस्तिष्क रेखा में मिलती हैं तो उस व्यक्ति तो सम्पूर्ण जीवन मानसिक परेशानियों से सामना करना प...
➡️ यदि विवाह रेखा बीच में टूटी हो तो इससे विवाह टूटने का खतरा बना रहता है ! ➡️विवाह रेखा पर त्रिशूल का निशान बनने पर पति-पत्नी के बीच काफी प्रेम होता है ! ऐसी रेखाओं वाले लोग होते हैं धनवान : आज के समय में जिसके पास पैसा है, उसी की वैल्यू है ! आज के समय हर कोई पैसा कमाने के लिए पढ़ाई-लिखाई से लेकर हर तरीके से कोशिश करता है जिससे वह ज्यादा से ज्यादा धनार्जन कर सके ! आज के समय समाज का दृषिकोण बदल गया है ! जिसके पास पैसा नहीं है तो समाज में भी उसका अस्तित्व नगण्य माना जाता है ! हस्तरेखा शास्त्र में हाथ की रेखाओं को व्यक्ति के भाग्य व धन से जोड़ कर देखा जाता है ! हम भी उत्सुक रहते है कि आखिर क्या कनेक्शन है इन हस्त रेखाओं का धन से ! हर किसी की हथेली में प्रमुख रूप से तीन रेखाएं होती हैं : 1. जीवन रेखा 2. मस्तिष्क रेखा 3. हृदय रेखा वैसे इन रेखाओं में मुख्य रूप से भाग्य रेखा को अधिक महत्त्वपूर्ण...
*क्रमांक — 468* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹कर्मबंध में अध्यवसायों की भूमिका* *👉 आचार्य महाप्रज्ञ लिखते हैं कि एक अध्यवसाय है और एक चित्त है- चित्त की यात्रा शरीर से सम्बद्ध यात्रा है और अध्यवसाय तक की यात्रा शरीर से परे की यात्रा है। जब हम अध्यवसाय तक पहुँचते हैं तब हमारा संबंध शरीर से छूट जाता है। शरीर एक किनारा है और अध्यवसाय दूसरा किनारा है। ये दोनों भिन्न हैं। सब जीवों में मन नहीं होता है किन्तु अध्यवसाय सब जीवों में होता है। एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक सभी जीवों में अध्यवसाय होते हैं। जिनके मन होता है उनके भी कर्म बंध होते हैं और जिनके मन नहीं है, उनके भी कर्म बंध होते हैं। सूत्रकृतांग में एक बहुत सुन्दर उदाहरण है कि एक मनुष्य जो रात में गाढ़ निद्रा में सोया हुआ है स्वप्न भी नहीं देख रहा है तथापि उसके भी कर्म बंध होता है। वे भी हिंसा के कर्म बंध हो रहे हैं। यदि मिथ्या...
*क्रमांक — 468* . *कर्म-दर्शन* 🚥🔹🚥🔹🚥🔹🚥 🔹🚥🔹🚥🔹🚥 *🔹कर्मबंध में अध्यवसायों की भूमिका* *👉 आचार्य महाप्रज्ञ लिखते हैं कि एक अध्यवसाय है और एक चित्त है- चित्त की यात्रा शरीर से सम्बद्ध यात्रा है और अध्यवसाय तक की यात्रा शरीर से परे की यात्रा है। जब हम अध्यवसाय तक पहुँचते हैं तब हमारा संबंध शरीर से छूट जाता है। शरीर एक किनारा है और अध्यवसाय दूसरा किनारा है। ये दोनों भिन्न हैं। सब जीवों में मन नहीं होता है किन्तु अध्यवसाय सब जीवों में होता है। एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक सभी जीवों में अध्यवसाय होते हैं। जिनके मन होता है उनके भी कर्म बंध होते हैं और जिनके मन नहीं है, उनके भी कर्म बंध होते हैं। सूत्रकृतांग में एक बहुत सुन्दर उदाहरण है कि एक मनुष्य जो रात में गाढ़ निद्रा में सोया हुआ है स्वप्न भी नहीं देख रहा है तथापि उसके भी कर्म बंध होता है। वे भी हिंसा के कर्म बंध हो रहे हैं। यदि मिथ्या...