श्री राजेन्द्र भावन चेन्नई मे विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प. पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म. सा. के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास चल रहा है। ~ प्रभु महावीर स्वामी ने अहिंसा धर्म की पालना संसार के मान, पूजा, प्रतिष्ठा के लिए नहीं किंतु स्वयं के ज्ञान, दर्शन, गुणों को पाने के लिए की थी। ~ प्रभु को भी प्रभु बनने में आनंद नहीं, किंतु प्रभुता प्रकट करने में आनंद है। ~ जिस मानव का निर्णय स्पष्ट है उसके लिए प्रभुता प्रकट करना अत्यंत सरल है। ~ अज्ञानी मानव के लिए स्वयं के जीवन में परिवर्तन लाना कठिन है किंतु समझदार के लिए मूलभूत परिवर्तन संभव है। ~ जो मानव इस अमूल्य मानव भव का मूल्य समझ गया है वह हर पल गुणों को पाने के लिए ही प्रब...
★ कषायों से दूर होने की दी प्रेरणा Sagevaani.com@चेन्नई: श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के तीसरे अध्याय की गाथा का विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य भव को सुलभ बनाने के चार सूत्र है- दान रुचि, साधर्मिक भक्ति, अल्पकषाय और मध्यम गुण। दान रुचि यानि हमारे अन्दर में देने का भाव, जो है वो देने का भाव। कोई भी व्यक्ति खाली नहीं है, हो सकता है उसके पास में पैसे नहीं है, पर उसके पास में जीवन है, समय है, आँखें है, हाथ इत्यादि अवयव है, बुद्धि है, विवेक है। जो है मेरे पास उसे उन्हें अर्पण करने का भाव रखूं, जिन्हें इसकी जरूरत है। उससे मुझे आनन्द की प्राप्ति होती है। साधर्मिक व्यक्ति के प्रति दया करुणा के भाव रखना चाहिए...
अत्यंत हर्ष उल्लास एवं धार्मिक आयोजनों ओर जप तप की झडी के साथ चातुर्मास में जिनवाणी की पावन गंगा प्रवाहमान है । आज स्थानक परिसर में गुरुणी मैया बाल ब्रह्मचारी मालव मणि पूज्यनीय चांदकुंवरजी महाराज साहब के 38 वें निर्वाण वर्ष पर गुणानुवाद सभा एवं 108 एकासन तप का आयोजन परम विदूषी साध्वी जी श्री मृदुलाजी महाराज साहब, श्री निर्मलप्रभाजी महाराज साहब, श्री मंगलप्रभाजी महाराज साहब, के सानिध्य में अति उत्साह के साथ सम्पन्न हुवा । सामुहिक एकासना तप के लाभार्थी संघ के अध्यक्ष सुरेशचंद्रजी सकलेचा एवं सकलेचा परिवार रहा। सभी श्रावक-श्राविका भाई बहनों ने सामायिक जाप एवं एकासन तप में अति उत्साह से भाग लेकर पूज्यनीय मालव मणि गुरणीमैया चांदकुंवरजी महाराज साहब के प्रति अपनी श्रद्धा-भक्तिभाव के पुष्प अर्पित किये । श्रीसंघ सभी के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करता है । सभी को सादर जय जिनेन्द्र निवेदक एम आ...
भारत विकास परिषद के संस्कार शिविर में जैन साध्वियों ने बताया कि कैसे बचाए जा सकेंगे मानवीय मूल्य शिवपुरी। संस्कार रहित शिक्षा उस एटम बम के समान है जिसका रचनात्मक उपयोग की अपेक्षा विध्वंशात्मक उपयोग होने की संभावना अधिक है। शिक्षा को बढ़ावा मिले अच्छी बात है, लेकिन शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दिए जाने चाहिए। हमने शिक्षा को तो बढ़ावा दिया है, लेकिन संस्कृति को बचाना भूल गए हैं। उक्त उद्गार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय पोषद भवन में भारत विकास परिषद द्वारा आयोजित संस्कार शिविर में उद्बोधन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने पारिवारिक और मानवीय मूल्यों तथा बच्चों में संस्कार का बीज कैसे रोपें, इस पर ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया। प्रारंभ में भारत विकास परिषद के अध्यक्ष सतीश शर्मा और सचिव प्रगति खेमरिया ने अपने उद्बोधन में जैन साध्वियों का स्वागत करते हुए उनसे मार्गदर्शन मांगा। साध्वी...
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने केशीश्रमण गौतम स्वामी की चर्चा चल रही, उसके बारे में बताया हमारी शरीर रूपी गाड़ी का ड्राइवर अगर बराबर ना हो तो गाड़ी कैसे चलेगी। गाड़ी में महत्व किसका है? बैठने वाले का या ड्राइवर का? आत्मा ये ड्राइवर है अब कैसे उपयोग करना हमारे हाथों में है। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने श्रावक का गुण बताते हुए कहा वह परोपकार करने वाला होवे। सृष्टि देखो कितना देने का कार्य करती। पहले भी जगड़ुशा, देदाशा, भामाशाह हो गए उन्होंने कितना अच्छा कार्य किया दुखियों के आंसू पोंछे। सभी को हेल्प की तो हमें भी करना है। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने तपस्वी का स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।
चेन्नई . श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन मूर्तिपूजक जैन संघ में पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म वाणी का श्रवण कराते हुए कहा कि धर्म की स्थापना को एक साधारण मनुष्य केवल पूजा स्थलों की स्थापना से ही समझता है, जबकि इसके लिए धर्म शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मानव जीवन को सुचारु रूप से चलाने और सृष्टि के विकास के लिए हर संप्रदाय के महापुरुषों ने आचरण संहिता बनाई, जिसका मुख्य उद्देश्य था कि मनुष्य का मनुष्य के प्रति इस प्रकार का व्यवहार हो जिसके द्वारा दूसरे मानव को पीड़ा न हो और प्रकृति का संरक्षण हो। उस समय आज के समान कानून की किताबें नहीं थीं और इसी आचरण संहिता को धर्म नाम से पुकारा जाने लगा। हर प्रकार की चोरी, झूठ बोलना, भावनात्मक और शारीरिक हिंसा और स्त्रियों के प्रति अभद्र व्यवहार कानून के अनुसार भी गलत हैं और इसी प्रकार से धर्म की दृष्टि से भी अनुचित है। इसलिए धर्म स्थापना का वास्...
आध्यात्मिक क्लास में जैन साध्वियों ने धर्म के छिपे हुए रहस्यों को स्पष्ट किया शिवपुरी। प्रतिदिन सुबह उठकर परमात्मा का स्मरण और उन्हें धन्यवाद क्यों देना चाहिए। क्यों प्रतिदिन कोई ना कोई नियम अवश्य लेना चाहिए। ऐसे तमाम सवालों के उत्तर पोषद भवन में जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी और उनकी 5 सुशिष्याओं की धर्मसभा में जानने को मिल रहे हैं। सोमवार को धर्म सभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि भगवान महावीर ने धर्म को उत्कृष्ट मंगल बताया है, लेकिन धर्म क्या है? यह जानना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि धर्म करने का नहीं, बल्कि जीने का नाम है। धर्मसभा में साध्वी जयश्री जी ने श्रावक के 12 गुणों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय और नीति से जो धन कमाया जाता है वह अच्छे और पुण्य कार्यों में लगता है। धर्मसभा में सवाई माधौपुर राजस्थान से पधारे धर्मावलंबियों ने जैन सतियों के दर्शन और जिन वाणी श्रवण का लाभ ...
यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि जैन धर्म का आचरण करने वाला जीव मोक्ष की प्रधानता को श्रृत करता है। जिसके लिए जीव अजीव का ज्ञान आवश्यक है सम्यगदृष्टि तत्व ज्ञान को प्राप्त कर छह काय का प्रतिपाल बन सकता है। संसार से तिरने के लिए तत्व को जानना जरूरी है। वरना आस्त्रव को सवंर और बंध को ही मोक्ष मान लेगा यदि ऐसा कर लिया तो कर्मों की निर्जरा नही होगी। इसलिए भगवान कहते है जब तक संसार में जीने की कला नही आयेगी, तब तक वह कर्म निर्जरा नहीं होगी और कर्म बंध से नहीं बच पायेगा। भगवान कहते है कि संसार से तिरने के लिए आप संसार में रहो पर संसार अपने भीतर न रहे यदि जीव के भीतर संसार है तो वह संसार से तिर नही सकता। इसलिए भगवान ने संसार से तिरने के लिए स्त्रियों के लिए 64 कला और पुरुषों के लिए 72 कला बताई दोनों का मूल दो ही है एक तो आजीविका और एक धर्म की। संसार में रहते हुए आसक्त ...
श्री राजेन्द्र भावन चेन्नई साक्षात्कार वर्षावास विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प. पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास के इस प्रवचन का विषय श्री अभीधान राजेंद्र कोष भाग 7 काया से अपराध करने को कर्म बंद कहते हैं लेकिन मन से हो रही हर पल हिंसा की क्रिया को अनुबंध कहते हैं बंद से भी बलवान है अनुबंध। ~ जिस मानव को हिंसा के बल रूप दुख, रोग ,भयंकर पीड़ा ,नर्क में जाने का ज्ञान है, वह कभी भी कोई भी पाप, हिंसा मन से नहीं ही करेगा। ~ जब तक हमें हमारे जीवन में हो रही गलतियां, दोषों का ज्ञान नहीं होगा तब तक हमें दोषों से, पापों से मुक्ति को पाना असंभव है। ~ जहां बोध है ज्ञान है वहां ही हम वास्तविक सुख, आनंद को पा ...
★ खतरगच्छ दिवस पर गौरवशाली इतिहास को किया उजागर Sagevaani.com @चेन्नई: श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में 1005वॉ खतरगच्छ दिवस गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. के सान्निध्य में मनाया गया। गच्छाधिपति ने कहा कि हमारा जीन शासन घना छायादार, विशाल वटवृक्ष है, जिस पर बड़ीबड़ी, छोटीछोटी डालियां है, हरे हरे पत्ते है। जितनी भी बड़ीबड़ी है डालियाँ मूल गच्छ है, उनमें निकली छोटीछोटी डालियाँ समुदाय है। हरे हरे पत्ते साधु-साध्वीयाँ, श्रावक-श्राविकाएं है। इस तरह चतुर्विध धर्मसंघ का वटवृक्ष है। यह वटवृक्ष सम्पूर्ण होता है तभी हमें छाया देता है। वटवृक्ष की जडें एक है, जमीन से पानी लेता है और डाली अंतिम पत्ते तक पानी पहुंचाती हैं। हाथ के अंगूठे, अंगुलियां अलग अलग होते हुए भी आपस में सहयोगी बन कर कार्य करती है,...
Sagevaani.com @चैन्नाई। वाणी में विवेक लुप्त होता है औंर जीवन अर्थ बन सकता है।सोमवार एस.एस. जैन भवन साहूकार पेठ में महासाध्वी धर्मप्रभा ने श्रध्दालूओ को सम्बोधित करते हूए कहा कि वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व का आईना है। जो बोलचाल बुद्धि, विवेक और मन की दशा को दर्शाती है । शब्द बुद्धि, विवेक, मन और आत्मिक संग्रहित पूंजी से निकलते हैं। मन-बुद्धि, विवेक की आंतरिक अवस्था जैसी होती है, हम वैसे ही शब्द बोलने लगने लग जाता है। मानव के मन में यानि भीतरी खोह में जब गुस्सा होता है, तो गुस्से वाले शब्द और जब प्यार होता है, तो प्यार वाले शब्द अपने आप निकलते हैं। दोष शब्दों में नहीं होता मनुष्य कि सोच में होता है । बिखरे हुए मन से बिखरे हुए शब्द निकलते हैं और सधे हुए मन से सधे, सटीक और सार्थक शब्द ही निकलते हैं। सारा खेल शब्दों यानि वाणी का ही है। शब्दों से ही हम किसी को अपना बना लेते हैं और शब्द ही हैं जो...
जैन दिवाकर महासती श्री कमला वती जी म. सा की सु शिष्या उप प्रवर्तीनी संथारा प्रेरक महासाध्वी गौरव श्री सत्य साधना जीमा. सा. आदी ठाना 7 का चातुर्मास अंबेश भवन में गतिमान है। बीच में 5 दिवसीय प्रोगाम होने से सुख के ऊपर प्रवचन माला स्थगित थी उसे पुनः आज गतिमान करते हुए महासती जी ने आज के प्रवचन में साध्वी जी मा.सा. ने सुख के प्रकार 6ठे सुख राज में मान के ऊपर प्रवचन जारी रखते हुए कहा कि राज में मान होने पर कार्य सरलता पूर्वक हो जाते हे। इसी तरह समाज में मान होने से समाज में अपने साथ समाज की भी प्रगति होती हैं। इस चातुर्मास में तपस्या की लडी लगी हुई हे। उपवास, बेले तेले की पचखान के साथ आठ नौ, आदी बड़ी तपस्या के भी पचखान हो रहे हे। बाहर से भक्त सु श्रावको का आना भी लगातार जारी हैं । मेहमानो की कड़ी में आज ब्यावर के चेन्नई प्रवासी श्रीमहावीर जी तालेड़ा, गोतमजी तालेड़ा, पुष्पा जी तालेड़ा, बनेडिया श...