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आलू का त्याग करना चाहिए: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। जिसे तो धरती पर कई जो जमती है उसे निगोद कहते हैं जैसे अपने किचन में आलू को देखा है।  एक आलू के अंदर एक सुई जितना लोग कितनी पतली होती है उससे भी अनंत जीव होते हैं।  आलू के अंदर कभी मन करता है कि आलू की सब्जी खाओ खाओ कि नहीं खाओ आलू के अंदर जीव से बचने के लिए आलू का त्याग करना चाहिए।  एक समुद्र में तो एक बार अगर पाव लगा दिया उनका भी इतना पाप लगता है ।  निर्जरा के बारे में बताएं एवं और कहा कि कोईभी समभाव से सहन करें तो निर्जरा कम होती हैं।  प्रवचन के माध्यम से हमें रोज में अपनी वाणी सुनाते हैं।  एवं करुणा का चोथा दिव्य भाव हृदय यानी जो हमारे काम आया उसके प्रति धन्यवाद से भरे रहना आज मनुष्य में कृतज्ञता क...

आध्यात्मिकता का किसी धर्म, संप्रदाय या मत से कोई संबंध नहीं है : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन के माध्यम से कहा कि लोग आध्यात्मिकता को जीवन-विरोधी या जीवन से पलायन मानते है। लोगों में भ्रामक धारणा है कि आध्यात्मिक जीवन में आनंद लेना वर्जित है और कष्ट झेलना जरूरी है। जबकि सच्चाई यह है कि आध्यात्मिक होने के लिए आपके बाहरी जीवन से कोई लेना-देना नहीं है।आध्यात्मिकता का किसी धर्म, संप्रदाय या मत से कोई संबंध नहीं है। आप अपने अंदर से कैसे हैं, आध्यात्मिकता इसके बारे में है। आध्यात्मिक होने का मतलब है, भौतिकता से परे जीवन का अनुभव कर पाना। अगर आप सृष्टि के सभी प्राणियों में भी उसी परम-सत्ता के अंश को देखते हैं, जो आपमें है, तो आप आध्यात्मिक हैं। अगर आपको बोध है कि आपके दुख, आपके क्रोध, आपके क्लेश के लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है, बल्कि आप खुद इनके निर्माता हैं, तो आप आध्यात्मिक म...

गुरू गोविन्द सिंह जी के पुत्रों ने दीवार में दफन होना स्वीकार किया, लेकिन नहीं बदला धर्म: साध्वी नूतन प्रभाश्री

-धर्मसभा में उन्होंने बताया कि जिनकी देव, गुरू और धर्म के प्रति श्रद्धा होती है वे नहीं करते धर्मान्तरण । जिनकी भी देव, गुरू और धर्म के प्रति अगाध श्रृद्धा होती है वे विचलित नहीं होते है तथा कभी भी अपना धर्म नहीं बदलते हैं। सिख धर्म के दसवे गुरू गोविन्द सिंह जी के मासूम पुत्रों ने दीवार में चिनना स्वीकार किया लेकिन अपना धर्म परिवर्तर्न नहीं किया। धर्मर् परिवर्तित कर वह अपनी जान बचा सकते थे, लेकिन उनकी देव गुरू और धर्म के प्रति श्रद्धा और आस्था नहीं डगमगाई। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी की सुशिष्या साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय पोषद भवन में आयोजित एक धर्म सभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी जयश्री ने बताया कि संसार में रहकर भी श्रावक धर्म के 12 व्रतों का पालन कर आप एक तरह से साधु जीवन जी सकते है। साध्वी वंदना श्री जी ने धर्मसभा में सुमधुर स्वर में भजन का गायन किया क...

बन्धन से बंधे हुए जीव इस जगत में दिखाई देते हैं: आगमश्रीजी म.सा.

 श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया बन्धन से बंधे हुए जीव इस जगत में दिखाई देते हैं। इस बंधनों से कैसे मुक्त होना है वे कौन-कौन से बंधन है। यह जानने से पता चलेगा। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने मनुष्य जन्म का सार बताते हुए चार प्रकार के मानवों का वर्णन किया। नौ उपवास सौ मनीषा सकलेचा तथा ग्यारह उपवास प्रीति कोठारी इनके प्रत्याख्यान हुए आगे तपस्या जारी है। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने तपस्वी का स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।

हमारे भीतर में रही चैतन्यता को पाने का मार्ग सजाग मन है:  आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.

     🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भावन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास चल रहा है। इस प्रवचन में विषय श्री अभीधान राजेंद्र कोष भाग 7 ~ जो मानव ने आत्मा की विराट शक्ति का बोध पा लिया है वह मानव बहुत ही कम भवों में मुक्ति को प्राप्त कर सकता ही है। ~ स्वयं के अंतःकरण को देखने का नजरिया वह ज्ञानियों की और ज्ञान पाने का मूल मार्ग है। ~ हमारे मन में रहे हुए गलत विचार गलत भावनाएं सबसे पहले हमें ही जलाते हैं, दुखी करते हैं, दर्द देते हैं। ~प्रभु महावीर स्वामी ने कहा है कि जयना धर्म केवल मनुष्य लोक तक ही नहीं किंतु देव लोक, नरक, तिर्ययंच् गती में भी जयना धर्म का पाल...

धर्म का रास्ता कान से आता है, उसी श्रवण से अध्यात्म का मार्ग प्रारम्भ होता है: आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म.

धर्म व्यापार में बने प्रॉफिट सम्पन्न : जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी श्रवण क्रिया से कला और श्रवण योग तक पहुंचाने की बताई महत्ता चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के तीसरे अध्याय की गाथा में मनुष्य भव को सुलभ बनाने के चार सूत्रों की विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य जन्म की दुर्लभता से भी दुर्लभ है श्रवण। भगवान महावीर की देशना को सुनना। शरीर के अंगों में दो अंगों का विशेष महत्व है- पाप का प्रारम्भ सबसे पहले आंखों से होता है फिर दूसरे अंगों का योग मिल सकता है। वहीं धर्म का रास्ता कान से आता है, उसी श्रवण से अध्यात्म का मार्ग प्रारम्भ होता है। तंदुल मत्च्छ की घटना से प्रेरणा देते हुए कहा कि हम निरर्थक विचारों स...

करुणा के आते ही भगवान बुद्ध की जीवन गाथा याद आ जाती है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे कि आज भगवान पार्श्वनाथ का निर्माण कल्याणक है, उसमें हमारे को बहुत ही सुचारू ढंग से प्रवचन के माध्यम से समझाया एवं बताया कि भगवान पार्श्वनाथ के सहायक देवियां कितनी है और बताया कि 216 प्लस 218 देवियां हैं एवं उनके बारे में बहुत सारी जानकारियां दी। आज दया भी कराई उसमें शो 100 भाइयों और बहनों ने दया व्रत क्या। अब देखिए की करुणा ह्रदय का तीसरा दिव्य भाव है करुणा प्रेम और मैत्री की सार्थक परिणति है।  करुणा प्रेम का विस्तार ही है करुणा के आते ही भगवान बुद्ध की जीवन गाथा याद आ जाती है। जिनके जीवन की नींव ही करुणा थी नेमिनाथ कि उस करुणा का स्मरण कीजिए जिस से प्रेरित होकर उन्होंने बालों में बंद जानव...

खुद को बदलकर, हर बदलाव की शुरुआत करो : देवेंद्रसागरसूरि

जीवन हमेशा एक-सा नहीं रहता। परिवर्तन को स्वीकार कर ही हम अपनी हताशा-निराशा से उबर सकते हैं और समय के साथ चलकर अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं, उपरोक्त बातें आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन जैन मूर्तिपूजक संघ में प्रवचन देते हुए कही , वे आगे बोले कि परिवर्तन को स्वीकारना ही हमें गतिशील बना सकता है। हम समय की ऐसी रेलगाड़ी के साथ-साथ चल रहे हैं, जिसमें रुकने का मतलब पिछड़ जाना होता है। जीवन के सफर का वास्तविक आनंद हम तभी उठा सकते हैं, जब हम समय के साथ चलें, उन्होंने यह भी कहा कि बदलाव की शुरुआत हमें खुद से करनी चाहिए, अगर हम खुद में बदलाव ला सकते है तभी हम इस दुनिया को बदल सकते है। एक कहावत के अनुसार “हर बदलाव की शुरुआत कर, तू खुद को बदलकर, जमाने को बदलना चाहता है, तो खुद से पहल कर। कोई इंसान परफेक्ट नहीं होता है, उसके अंदर कुछ खामियां अवश्य होती है। उसे अपनी कमियो...

ह्रदय का दूसरा भाव है प्रसन्नता: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसा कि हम सभी जानते हैं की ह्रदय का दूसरा भाव है प्रसन्नता। हर हाल में खुश रहना अभाव में भी और प्रभाव में भी खुद को लाफिंग बुद्धा बनाना ही सच्ची प्रसन्नता है अगर भावो में प्रमोद भावना आए तो मानवता दुखी होगा। आप बड़े जनों को देखकर नदी में परेशान हो हमेशा आधा गिलास भराही देखें अवगुणों कमियों पर गौर ना करें सकारात्मक सोच सकारात्मक नजरिया आपस में तनाव से बचने का अचूक मंत्र है। जीवन का मार्ग कुछ ऐसा है यहां पर कदम कदम पर दुख पीड़ा और कसक है माना कि दुनिया देखती है फिर भी आनंद रहने का अवसर जरूर बनाएं खुद को हमें चिंता की जनता में ना जलाए खुद को माचिस की तिल्ली ना बनाएं कि थोड़ा से संघर्ष लगते ही क्रो...

मन को समझाकर साधना के पथ पर आगे ले जाये

मुनि *विरति* का उपदेश करे, विरति यानी *त्याग* का उपदेश करे , मन को समझाकर साधना के पथ पर आगे ले जाये वह साधक, मन के अनुसार चले वह विराधक यह बात बताते हुए *पूज्य श्री प्रवर्तक प्रकाश मुनि महारासा* ने अपनी मधुर वाणी में फरमाया कि.. भगवान की आज्ञा का पालन करने वाला आराधक, साधक है ,परमात्मा त्याग का उपदेश करते है भोग का नही । *अकडं करिष्यामि इति मंद माणे*- जो नही किया वह मुझे करना है, आज तक जिसने नही किया वो में करूँगा, रिकार्ड को तोडूंगा। यह शब्द समझाता है कि आपमे *अभिमान* है , अभिमान है मतलब *क्रोध* भी है । भोगी जीव मानता नही, त्यागी सोचता है कि त्याग कर लो कल किसने देखा !! हमारा शब्द *कषाय* से जुड़ा रहता है ,कषाय(क्रोध,मान, माया लोभ,राग द्वेष)भीतर से काम करती है जब चोट पड़ती है तो बाहर आती है। भोगी प्राणियों का विनाश करता है, छेदता है, लुटाता है , मानसिक दुख देता है । किसी शायर ने कहा है कि &...

मन चंगा कसोटी में गंगा

  *आश्रव*- आत्मा में कर्मो का आना, संसार मे हर स्थान पाप का है, जंहा पाप न होता हो । यह पाप, झूठ, चोरी कब तक करुंगा यह कब छूटेगा सोचने वाला आश्रव के स्थान पर *संवर* में है। महत्व है.. *विचारों का* इसलिए कहावत है *मन चंगा कसोटी में गंगा*। स्थान का प्रभाव होता है ,क्षेत्र का महत्व है। धर्म स्थान में रहा हुआ जीव कर्म बांधता है, और संसार में रहने वाला कर्म से छुट जाता है। बैठा यहाँ धर्म स्थान में है और मन वहाँ दुसरी जगह चल रहा है, आँख से देख रहा हे पर भाव से जुड़ा नहीं, देखना अलग, विचार करना अलग- अलग।   🔰नाटक, नाटक करते आये, नाटक देखते आये अनुमोदन करते आये, पैसा बर्बाद, समय बर्बाद तुमको रस आ रहा है। जहाँ जीव की विराधना हो वहाँ *आरम्भ*। करे, करावे, अनुमोदन करे वहाँ आरंभ है। कर्म प्रकृति, 25 क्रिया का थोकड़ा दो चीज सीखो। इससे आरंभ में जाने से कर्म बंध से रोकती है पश्च्याताप करने से कर्म ...

त यानि तत्काल प यानि पवित्र, जिसका सेवन करने से तत्काल आत्मा पवित्र बनती है: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बन्धुओ तप स्वरूप का निरुपण करते हुए बताया, त यानि तत्काल प यानि पवित्र, जिसका सेवन करने से तत्काल आत्मा पवित्र बनती है। नव तत्वों में संवर और निर्जरा दोनो बड़े महत्वपूर्व है जिसे मोक्ष जाना है। उसे सवंर, निर्जरी को धारणा होगा। उत्तराध्ययन में एक उदाहरण है कि तालाब में कई छिद्रों से पानी आ रहा है तालाब कि सफाई के लिए सभी छिंद्रो को बन्द करके पानी उलीछ कर बाहर निकालना होगा और फिर सूर्य के ताप से तालाब को सुखा कर साफ किया जा सकता है। वैसे ही आत्मा के आस्त्रव छिद्रो को बन्द कर सचित कर्मो की निर्जरा करनी होगी और तप द्वारा आत्मा को पवित्र करना होगा । चार्तुमास यानि वर्षाकाल तपस्या का काल है। भगवान कहते है साधु के समान गृहस्थ को भी गमनागमन न करके घर या उपासरे में रहते हुए ज्यादा से ज्यादा तपस्या करनी चाहिए। तपस्या करने वाले क...

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