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विष्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर पोधारोपण

राजस्थान पत्रिका और एक्ष्नोरा इंटरनेशनल के संयुक्त तत्वाधान में चलाए जा रहे हरित प्रदेश अभियान के तहत आज शुक्रवार को विष्व प्रकृति संरक्षण दिवस पर पोधारोपण कार्यक्रम टी नगर स्तिथ श्री आरकेएम शारदा विद्यालय मै आयोजित किया, स्कूल की प्रधान अध्यापिका गीता एवं अध्यापिकाओं ने भाग लिया। मुख्य अतिथि नैना शा ने सभी विद्यार्थियो को पर्यावरण के गुणों की जानकारी दी। इस मौके पर एक्ष्नोरा उतरी चेन्नई के सचिव फतेहराज जैन ने विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ साथ पर्यावरण के प्रति भी गंभीर रहने की सलाह दी, बच्चो को हरित प्रदेश और स्वस्थ पर्यावरण के गुणों की महानता बताते हुए कहा कि अपनी भावी पीढ़ी को शुद्ध पर्यावरण देने के लिए पौधारोपण बहुत जरूरी है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा पर्यावरण संरक्षण वृक्षारोपण पर ध्यान दें जिससे हमें शीतल छाया, ऑक्सीजन, शुद्ध हवा, शुद्ध पानी कई प्रकार के फल, फूल औषधियों के लिए जड़ी बूटि...

 संसार से नाता तोडो और धर्म से खुद को जोड़ो: जयतिलक मुनिजी

एस एस जैन संघ नार्थ टाउन में पुज्य गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने बताया कि आत्म बन्धुओं, भगवान ने बताया कि जो जीव एक बार मोह निद्रा से जागृत हो जाता है। तो छदमस्थ होते हुए भी बेमान नहीं होता वह अपने संसार को परिमित कर चरम लक्ष्य मोक्ष की अभिलाषा करता है। देव पर्याय व देवलोक का सुख भी शाश्वत नही है। मनुष्य गति मे मनुष्य की आज्ञा का पालन देव भी करते है। इसका मतलब मनुष्य गति देव गति से उत्तम है। आगम में कई उदाहरण मिलते कि देवता भी मनुष्य का संयम, रद्दी, लावण्य देखने को आते हैं। सुख वास्तव में सुख नहीं है सुख में भी सामायिक प्रतिक्रमण छूट जाता है। मोक्ष की अभिलाषा है तो पुरुषार्थ करना पड़ेगा प्रयत्न करना पड़ेगा। भगवान के समोवशरण में आते है। देवताओ को देव गति अच्छी नही लगती क्योंकि वे जानते है देव गति के भोग शाश्वत नही है वे भी आतुर रहते कि कब मनुष्य का जन्म लें और मोक्ष की अग्रसर हो जाऊ। जो मनुष्य जान...

कथा का लक्ष्य जीवन में बदलाव लाना इसलिए सब इसे मन मुताबिक सुनते हैं: प्रवीण ऋषि

टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में संत प्रवीण ऋषि के प्रवचन रायपुर. जीवन में बदलाव लाना, यही किसी कथा का लक्ष्य होता है। जिनके मन में जैसा बनने की तमन्ना होती है, वो वैसी कथा सुनते हैं। जिन्हें राजनीति करनी है, वे राजकथा सुनते हैं। खेल में रूचि रखने वाले खेल कथाएं सुनते हैं। जिन्हें महाभारत अच्छा लगता है, वे महाभारत सुनते हैं। जिन्हें जीवन में महावीर को उतारना है, वे महावीर की कथा सुनते हैं। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। उन्होंने कहा, मंजिल के आधार पर रास्ते खोजे जाते हैं। मंजिल ही क्लीयर न हो तो इंसान फालतू के रास्तों पर चलने लगता है। जीवन की ये विडंबना ये नहीं है कि हम रास्ते पर नहीं चलते या सही रास्ते पर नहीं चलते। जीवन की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि लोग बिना मंजिल चुने रास्ता चुनते हैं। गोशालिक और इंद्...

मनुष्य भव में ही होता चेतना का रुपान्तरण : आचार्य जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी 

★ विपरीत परिस्थितियों में भी प्रसन्न चित्त रहने की दी प्रेरणा  Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के तीसरे अध्याय की गाथा का विवेचन करते हुए कहा कि मन जब शरीर के साथ चलता है, तो शरीर मांगें करता है और जब मन शरीर से अलग हो जाता है तो वह मांग करे भी किससे? हमें धन्यवाद देना चाहिए हमारे मन को जिससे हम परमात्मा की उस अमृतमय देशना का रसपान कर रहे है, श्रवण कर रहे है। वर्तमान में इस आर्यावर्त में जो भी साधु संत देशना दे रहे है, वह हमारी नहीं, परमात्मा की वाणी है। परमात्मा की वाणी कानों के माध्यम से हमारे हृदय में बहती है। वही श्रवण क्रिया से कला और फिर योग बन कर हमारे जीवन को रुपान्तरित क...

विघ्न बाधाओं का निवारक: पैसठिया यंत्र

◆ श्रीमती पिंकी बंब ने किया मासखमण का प्रत्याख्यान Sagevaani.com @ट्रिप्लीकेन, चेन्नई: युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या शासनश्री साध्वी शिवमालाजी ठाणा 4 के पावन सान्निध्य मे पैसठिया यंत्र अनुष्ठान का भव्य आयोजन तेरापंथ भवन ट्रिप्लीकेन, चेन्नई में सानंद सम्पन्न हुआ। साध्वीश्रीजी के मंगलाचरण से अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। साध्वी अमितरेखाजी ने कहा कि अनेक विघ्न  बाधाओं का निवारण करने वाला यह पैसठिया यंत्र हैं। लोगस्स का पाठ इसका सिध्द मंत्र हैं। इसमे 24 खाने 24 तीर्थंकरों की स्तुति के एवं 25वॉ सीमंधर स्वामी की स्तुति का हैं। इस यंत्र मे अंकित संख्याओं की ऊपर से नीचे, बाये से दाये एवं तिरछी जोड 65 आती हैं। यह जैन धर्म का प्रभावशाली मंत्र और यंत्र हैं। इस अनुष्ठान मे लगभग 250 श्रद्धालु श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता की। जप अनुष्ठान के साथ तप अनुष्ठान में तांबरम प्रवासी श्री जवरीलालज...

श्रेष्ठ आचरण से व्यक्ति का बहुमुखी विकास होता है: देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई. श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में बिराजमान आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म वाणी देते हुए कहा कि व्यक्ति के जीवन में आचरण का विशेष महत्व है। श्रेष्ठ आचरण से व्यक्ति का बहुमुखी विकास होता है। मानव योनि में जन्म मिलने के बाद इसे व्यर्थ नहीं गंवाएं। खाली हाथ मनुष्य इस संसार में आता है और रोता बिलखता, खाली हाथ ही चला भी जाता है। उसका सारा ताना-बाना यहीं रखा का रखा रह जाता है। पापों की गठरी इतनी भारी हो जाती है कि एक दिन जब काल सामने होता है तो उसके पास पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाता है। इसलिए समय रहते ही अपने आचरण को ठीक करने के लिए सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयास करें ताकि इस संसार से विदा होने के बाद भी लोग आपको याद करें। महावीर आज अपने सत्कर्मों की वजह से आज भी अमर हैं। इन्होंने सबसे पहले अपने अंदर सदाचरण का बीज बोया। अपने आचार-वि...

हमें संसार की क्षणभंगुरता को पहचानना चाहिए: आचार्य उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने कषायों के त्याग का निवारण करने के चार उपाय बताए। पहला उपाय है कषायों के नुकसान भुगतने वाले उदाहरण को याद रखो। दूसरा उपाय कषायों को दूर करने की आत्मा चिंता होनी चाहिए। तीसरा क्रोध करने में देरी करना यानी क्रोध भी शांति से करना। चौथा उपाय है जब कषाय किया, उसका प्रायश्चित गुरु भगवंत के पास से तुरंत ले लेना। उन्होंने कहा पाप का बंध करना हमारे हाथ में है परंतु पाप का उदय समय के हाथ में है। मम्मण सेठ जैसे दिखता त्यागी व्यक्ति का जीव भी लोभ कषाय के कारण सातवीं नरक में गया। ज्ञानी कहते हैं लोभ से सर्वनाश होता है। लोभ की दुनिया में जाने वाले माता-पिता, शरीर आदि को भी नहीं देखते। कर्मसत्ता हमें छोड़ती नहीं है परंतु साथ में धर्मसत्ता होने से अपना बचाव हो सकता है। हम निर्धार करें, कौनसा क...

धर्म क्षेत्र अखाड़ा नहीं, इसमें बल, बुद्धि और चालाकी का कोई स्थान नहीं : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

प्रवचन- संसार की बुराईयों से धर्म क्षेत्र को दूर रखें, धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं Sagevaani.com @शिवपुरी। हमने अपने धर्म को सिर्फ आराधना और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित कर दिया है। इसमें साधना का समावेश ना होने से धर्म क्षेत्र संसार की बुराईयों से मुक्त नहीं हो पाया है। जिससे संसार में जो लड़ाई, झगड़ा, प्रतिद्वंदता, अहंकार, कपट आदि कषायों का बोलबाला है। उसी से धर्म क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। हमें समझना चाहिए कि धर्म क्षेत्र मल्ल युद्ध स्थल नहीं है इसमें किसी को नीचा दिखाने की भावना नहीं है। संसार में भले ही बल, बुद्धि और चालाकी को अहमियत मिलती हो, लेकिन धर्म में जोडऩे का भाव है। एक दूसरे को प्रेम करने और गले मिलने का भाव है। धर्मसभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने उक्त भावनाएं व्यक्त करते हुए श्रोताओं के मन को झकझोरा और कहा कि संसार की बुराईयों से कृपया कर धर्म क्षेत्र को दूर रखें। धर्मसभा...

पुण्य वाणी घट जाय तो सांस लेना भी कठिन हो जाता है: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा

एस एस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा ने बताया कि पुण्य वाणी घट जाय तो सांस लेना भी कठिन हो जाता है श्वास के अन्दर भी पुण्यवाणीका संयोग है, इसलिए ज्ञानी जन कहते है अच्छे कर्म करन वाला उच्च गति को प्राप्त करता है सम्भल करके चलना सोच समझकर पद्धत्ति को जैन धर्म पाप कर्म का निषेध करोगे तो पाप से बच जाओगे और सम्यक प्रकार से पालन करोगे तो पाप से बच जाओगे। जीनवाणी कहती है एक पानी के जीव में असंख्यात जीव है तो बिना प्रयोजन के पानी में एक अंगुली भी नहीं डालें। नीमित पाकर कर्म भी उदय में आ जाते है। पानी को वेग ज्यादा होने पर सरकार निषेध करती है यह भगवान की वाणी ही है। कोई भी कही भी जबरदस्ती से बुलायेगा वहाँ चले जायेगे क्या। जहाँ मजा है वहाँ सजा है, प्रबल पुण्यवाणी का उदय होने पर पानी में फिसला हुआ आदमी भी नदी के किनारे पहुँचकर सुरक्षित हो जाता है। पहाड़ों पर फ...

मन से करते हुए पापों की संख्या अमर्यादित है: वैभवरत्नविजयजी म.सा.

🏰☔ *साक्षात्कार वर्षावास* ☔🏰           *ता :27/7/2023 गुरुवार*      श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म. सा. के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. का भव्य वर्षावास चल रहा है। ~ प्रभु महावीर स्वामी ने स्वयं के केवल ज्ञान में जीव की 84 लाख भिन्न-भिन्न स्थानों में जन्म, मरण, सुख-दुख की अवस्था देखी है। ~काया से करते हुए पापों की संख्या मर्यादित (limited) है किंतु मन से करते हुए पापों की संख्या अमर्यादित (unlimited) है । ~ हमारे जीवन में आंतरिक परिवर्तन हो, दोषों का नाश हो, गलतियां मिट जाए वह हमारे जीवन की सफलता है। ~ क्रिया से जीवन में परिवर्तन आएगा यह निश्चित नहीं किंतु ज्ञान से जीवन में परिवर्तन अवय...

रम जाना साधना का सूत्र है, इसे ज्ञान नहीं, वात्सल्य से साध सकते हैं: प्रवीण ऋषि जी

टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चातुर्मासिक प्रवचन Sagevaani.com @रायपुर. कभी-कभी लोग सिंगल पर फोकस हो जाते हैं। वो उसी में रम जाते हैं। जो जिसमें रमन करता है, वो भी वैसा बन जाता है। यही साधना का सूत्र है। ज्ञानियों के लिए ऐसा करना मुश्किल है। जिनमें वात्सल्य का बल है, उनके लिए यह बहुत सहज है। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में गुरुवार को उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि एक मां अपने बेटे के सिवाय किसी और को देखती तक नहीं है। मरुदेवी ने अपने पुत्र को निरंतर देखा। और किसी को देखा ही नहीं। किसी और में जिज्ञासा ली ही नहीं। न किसी से मिलने की तमन्ना थी। न किसी को जानने की। उतनी गहराई से जब हम किसी के साथ जुड़ते हैं तो उसकी शिखरता भी हमें सहज उपलब्ध हो जाती है। ये अनन्य भक्ति का सूत्र है। इस सूत्र को मरुदेवी ने पूरे जीवन किस तरह ...

परमात्म वाणी पर घनीभूत हो श्रद्धा : गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

अनुमोदनीय घटनाओं का बार बार स्मरण करने की दी प्रेरणा  Sagevaani.Com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने उत्तराध्यन सूत्र के तीसरे अध्याय की गाथा का विवेचन करते हुए कहा कि संसार के साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविकाओं की दृढ़ता, उनके चारित्र, उनकी क्रियाओं के बार बार दर्शन करके, जो हमारे भीतर में अनुमोदना के भाव प्रकट होते है, उनसे हो सकता है कितने जन्मों, कितने कर्मों के बंधन को काट सकता है। अतः अनुमोदनीय क्रियाओं के दर्शन, चिन्तन पुनः पुनः करने चाहिए। लेकिन उन घटनाओं या क्रियाओं का चिन्तन कभी मत करो जिससे कर्मों का बंधन होता है। हमारे जीवन में अनुमोदनीय और निन्दनीय दोनों घटनाएं सामने आती हैं। एक ही व्यक्ति जिसने पुर्व...

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