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साधक को दीर्घद्रष्टी वाला होना चाहिए: साध्वी आभा श्री जी. म.सा.

श्री वर्ध. स्था. जैन श्रावक संघ पनवेल कपड़ा बाजार में विराजित परम पूज्या गुरुणी मैय्या स्पष्टवक्ता साध्वी आभा श्री जी. म.सा. ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहाकि साधक को दीर्घद्रष्टी वाला होना चाहिए। यानि दूर का सोचने वाला, सम्यक द्रष्टि वाला संसार को पार कर सकता है। भूत,भविष्य,वर्तमान को जानने वाला दीर्घद्रष्टि वाला होता है। हनुमान जी विभिषण से पूछते हैं कि तुम धर्मवान होकर लंका में कैसे रहते हो। उन्होंने बोला कि ठीक वैसे ही रहता हूँ जैसे 32दांतो के बीच में जीभ रहती है। साध्वी डॉ. श्रेयांशी श्री जी म.सा ने कहा कैसे हम अपने क्रोध को अवायड कर सकते हैं- ‘हाउ टू अवायड योर एन्गर इशु How to avoid your Anger Issu? Apne एंगर इशु को अनदेखा (अवायड) करने के लिए – पेशंस , प्रेम, सम्मान, टोलरेन्स पावर को जीवन में लाना होगा। चाय को गर्म होने में जितना समय लगता है उतना समय ही Mind को गर्म होने म...

राजस्थानी एसोसिएशन तमिलनाडु कि महिला इकाई गणगौर द्वारा दुसरा कैंसर जांच शिविर

राजस्थानी एसोसिएशन तमिलनाडु कि महिला इकाई गणगौर द्वारा दुसरा कैंसर जांच शिविर का आयोजन विशेष तौर पर गणगौर की महिलाओं के लिए आयोजित किया, जिसमें कई प्रकार के आधुनिक उपकरणों द्वारा जांच की गई। Medi Alexa Cancer Camp के डॉ वेंकट, डॉ संतोष, डॉ राजरत्नम और डॉ संहिता ने इस जांच शिविर में अनुमोदनीय सेवा दी। इस शिविर में श्री सुभाष जी रांका, RYA Cosmo के अध्यक्ष रंजीत जी गादिया, मैनेजिंग ट्रस्टी अभय कुमार लौढा, गिरिराज जी मूंदड़ा, के के बाहिती, अजय जी नाहर, अरुण जी बोहरा, निर्मल जी रांका, सौरभ जी बाफना, विनोद जी छाजेड़, सुनीता जी बेताला, हरीश जी कांकरिया, रजत के अध्यक्ष श्री मोहनलाल जी बजाज, देवराज जी अच्छा ज्ञानचंद जी कोठारी और विनोद जी ओ जैन ने भी इस कार्य में अपनी सेवाएं प्रदान कर महिलाओं को प्रोत्साहित किया। गणगौर की अध्यक्ष कांता बिसानी ने सभी का स्वागत किया। संचलन अजय नाहर द्वारा किया गया। इ...

परिवार की कीमत परिवार बनाने वाले को पता रहती हैं: साध्वी आभाश्री जी मा. सा.

पनवेल जैन स्थानक मे विराजित साध्वी आभाश्री जी मा. सा. आदि ठाणा 3. ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि परिवार में मिठास कैसे लाई जाए, आज परिवार टूट रहे हैं। मटके की कीमत मटका बनाने वाले को ही पता होती है, वैसे ही परिवार की कीमत परिवार बनाने वाले को पता रहती हैं। वस्तुशास्त्र का दोष नहीं है, घर के झगडे में दोष तो अपनी अपनी भावना में है, सोच में होता हैं। सोच का दोष निकाले, कपड़ा फट जाता है तो उसे फेंका नही जाता है उसे सिल कर फिर ठीक कर लिया जाता है। पांचो अंगुलिया जब मिल जाती है मुठ्ठी बन जाती है और जब मुठ्ठी बन जाती है तो सबकी छुटी कर देती है। साहवी. डा. महिमाश्री जी मा. सा. ने कहां की इंसान संसार में बंधन तोड़ने आता है पर तोडता नही है उल्टा और कितने बंधन में बांध जाता है। मनुष्य के पास भव बेधन तोड़ने का अमूल्य अवसर है। इसलिए अपने मानव जन्म को सार्थक करे। साहवीडा. श्रेयांशी श्रीने मधुर गीतिका गा...

चित् को दिव्य चेतना में रूपांतरित किया जा सकता है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे हमारे को नित्य कहते हैं कि जैसे भावों को शुद्ध शुद्ध करने के लिए जारी स्तोत्र है एक नेत्री दो प्रसंता तीन करुणा और चार कृतज्ञता सुख दुख का पुण्य पुण्य नगरी करुणा मुदिता पेक्षा भावना का ततचइत मित्रता करुणा प्रशस्ता कुर्ता प्रस्थान इनसे चित्त को सुभाषित किया जा सकता है। पहला भाव है मैत्री भाव एक ऐसी मंगल भावना जो सारे विश्व को एक सूत्र में बांधे मित्र यानी सब के प्रति प्रेम भाव किसी के प्रतिवेर विदृश नहीं मित्र ही तो वह आधार है जो एक और एक ही तरह सबको आपस में जोड़ती है बादल से बरसती बिखरती बुंदो को सागर में विराट तादेती है अगर मैत्री भाव नहीं है तो भक्ति भी नहीं है ऐसा कि कोई व्यक्ति का नहीं ...

तीन करण मन, वचन और काया से बांधता है: पूज्य श्री दर्शन मुनि जी महारासा

पूज्य श्री दर्शन मुनि जी महारासा का सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद में  जीव कीतने प्रकार से कर्म बांधता है? तीन योग से बांधता है और तीन योग से छोड़ता है। तीन करण मन, वचन और काया से बांधता है । *मन से कर्म ज्यादा बांधता है।* अशुभ योग में मन लगा हुआ है इस कारण वचन से कुछ भी बोल देता है और कर्म बांधता है । कर्म बांधना सरल है , भोगना कठिन है । *वचन* के पुद्गल मिले है ,इससे अच्छे वचन बोले, परमात्मा की आराधना करें। *काया* से भी कर्म बांधते है, काया को स्थिर नही रखते,इस कारण जीव की विराधना होती है , सारे काम देखकर यतना से करे तो जीव की विराधना नही होगी, मन से कर्म निकाचित होते है *पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी महारासा*- संसार के जीव भिन्न वृत्ति वाले लोग रहते है ,सबकी वृत्ति एक समान नही । *अढाई द्वीप में 196 अंक की गणना जितने मनुष्य रहते है* इनको चार विभाग में बाट दिया.. *1 ख...

जैन वही है जिसका आचार विचार श्रेष्ठ होता है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्मबन्धुओं भावी जनों के तिरने के तीर्थ का निरुपण किया है तीर्थ के चार घाट होते हैं वैसे ही जिनेश्वर भगवान नें तीर्थ के चार घाट साधु-साध्वी, श्रावक श्राविका का निरुपण किया है ‌। ये चारो तीर्थ में जाने वाले निश्चित रूप से तिरते है यदि तीर्थ में जाने पर भी आप भव सागर से नही तिरते तो कमी स्वयं आप में है। तीर्थकर की पहली देशना से चार तीर्थ की स्थापना करते है। सर्वज्ञ सर्वदर्शी केवल ज्ञानी होने पर ही तीर्थकर प्रथम देशना देते है। तीर्थकर द्वारा दिया गया ज्ञान उनकी जिनवाणी को साधु साध्वी, आचार्य, उपाध्याय गाँव गाँव में सेल्समैन की तरह सब तक पहुंचाते है। भगवान महावीर की प्रथम देशना रात्रि में हुई जिसमें चार जाति के देव चार जाति के देवियाँ तो थे पर चार जाति के मनुष्य व तिर्यंच वहाँ उपस्थित नहीं है। मनुष्य ही व्रत प्र...

प्रभु की भक्ति तीन प्रकार से हो सकती है: मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा.

 राजेंद्र भावन चेन्नई में विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. के भव्य वर्षावास के इस प्रवचन में परमात्मा नेमिनाथ का जन्म कल्याणक के बरे मे बताया।    ~ प्रभु की भक्ति तीन प्रकार से हो सकती हैं 1.काया से 2.मन से 3.आत्मा से। ~ प्रभु की अभिषेक की धारा हमारे मन में रहे दू:खो की धारा का नाश करने वाली हो तभी हमारा जीवन सार्थक होगा। ~हमारी भावनाओं में जो नया बल नई रोशनी नया जुनून पूरे वह है भक्ति। भक्त और भगवान यह दोनों का भेद मिटाकर भक्त स्वयं के भीतर में रहे हुए भगवान को अनुभव करें वह भक्ति। ~परमात्मा को पाने के लिए भक्त के हृदय में सर्वप्रथम भक्ति की जिज्ञासा होना अति आवश्यक है। ~परमात्मा जब हमारे में आते हैं...

धर्म जब जीवन में उतरता है तो संबंधों में मधुरता आती है: आगमश्रीजी म.सा.

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने फैमिली मैनेजमेंट के बारे में बताया कि ये रिश्ता क्या कहलाए, आज उसी रिश्ते का मजाक उड़ाया जा रहा है। सात जन्म का ऐसा पवित्र पति पत्नी का रिश्ता जो चंदन के समान होना चाहिए था, पर एक दूसरे की नासमझी के कारण ज्यादा से ज्यादा डिवोर्स हो रहे हैं। चेलना श्रेणीक के बारे में, पूर्णिया श्रावक के बारे में बताया गया। धर्म जब जीवन में उतरता है तो संबंधों में मधुरता आती है। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने श्रावक के गुणों के बारे में बताते हुए कहा उपकारी के उपकारों को कभी भी भूलाना नहीं है। कृतज्ञता व्यक्त करना है ना कि कृतज्ञ बनना है। बच्चों का शिविर लिया गया। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।

श्री राम व श्रीकृष्ण आदर्श पुरुष थे: मनीष जैन

 श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ, तमिलनाडु के तत्वावधान में स्वाध्याय भवन, साहूकारपेट, चेन्नई में रविवारीय सामूहिक सामायिक में युवा रत्न मनीषजी जैन द्वारा ” आदर्श पुरुषों का जीवन ” विषय पर विशेष उदबोधन |  स्वाध्याय भवन साहूकारपेट चेन्नई में श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ, तमिलनाडु के तत्वावधान में युवा रत्न श्री मनीषजी जैन ने रविवारीय सामूहिक सामायिक में उदबोधन देते हुए कहा कि श्री राम व श्रीकृष्ण आदर्श पुरुष थे, जिन्होंने प्रसन्नता व धैर्यता पूर्वक जीवन जीया | दोनों आदर्श पुरुषों का जीवन सरलता व सहजता पूर्ण था | राम ने अपने पिताश्री की आज्ञा पालन करने हेतु राजमहल का त्याग कर चौदह वर्षों के दीर्घ काल के लिए वनवास स्वीकार करते हुए एक आदर्शमय जीवन का इतिहास बनाया | श्रीकृष्ण, अर्जुन के मित्र रहें तो धर्मयुद्ध में सच्चे सारथी भी रहें व सत्य की राह पर चलने वाले मित्र को विजयी बनाय...

को न्याय प्रिय होना चाहिए: साध्वी आभाश्रीजी म.सा.

पनवेल महावीर भवन में विराजित साध्वी आभाश्रीजी म.सा. आदि ठाणा 3 ने सभा को संबोधित करते हुए कहा श्रावक को न्याय प्रिय होना चाहिए । न्याय से रामायण सर्जन होता है, अन्याय से महाभारत का। अन्याय अनिति से कमाया गया-धन सात पिढियां भोगती है। न्याय करना चाहिए घर का मुखिया न्याय वाला होगा तो सब प्रेम प्यार से रहेगा-सन्तरे के जैसा नही बनना है, जो बाहर से एक है और अन्दर से अलग खरबूजे के जैसे बनो जो बाहर से अलग है. पर अंदर से एक है साध्वी महिमाश्रीजी ने पाप के विषय में बोला पाप 18.है!  पुण्य 9 है . इस लिए पाप कम करने चाहिए कौन सा पाप करने से व्यक्ति किस नरक में जाता है। स्त्री 6 नरक में जाती है. पुरुष 7 वीनरक में। साध्वी श्रश्रेयांशीश्री जी मा.सा. ने मधुर गीतिका प्रस्तुत की! तपस्या की लड़ी चल रही है 3 मासखमण के पचखान चल रहे धर्म ध्यान का ठाठ लग रहा है !

 श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने तीन तरह के दोषों को बताया

 श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने तीन तरह के दोषों को बताया आधिदैवीक दोष, आधिभौतिक दोष, आध्यात्मिक दोष इन को उदाहरण के माध्यम से समझाया। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने विनय गुण के बारे में बताया। अगर विनय है तो हम आगे बढ़ते ही जायेगे। ऊर्जा को प्राप्त करेंगे। अक्षर ज्ञान से स्वास्थ्य लाभ का शिविर लिया गया। पच्चास जनों ने लाभ उठाया। दोड्डबल्लापुर संघ तथा आवडी चेन्नई से भक्तगण पधारे। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।

दीक्षा के लिए उम्र नहीं, अपितु अंतस की योग्यता जरूरी: आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म.

★ अन्य भाषाओं के साथ हिन्दी को अनिवार्यतः सिखने की बताई महत्ता Sagevani.com @चेन्नई ; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने आचारांग सूत्र की गाथा का विश्लेषण करते हुए कहा कि जिज्ञासा से ही धर्म का प्रारंभ है, धर्म की पहली सिढ़ी है। संसार, पदार्थ के बारे में सवाल पैदा होना प्रश्न है और स्वयं के बारे में जानना, कि *मैं कौन हूँ, कहां से आया हूँ, कहां जाऊंगा, यह विचार जिज्ञासा हैं।* अपना बोध नहीं होने के कारण अपने नाम को अपना मान बैठा हूँ, अपने शरीर के स्वरूप को अपना मानता हूँ, इसी को अपनी दुनिया मानता हूँ। मैं का अर्थ मेरा नाम, मेरा स्वरूप, मेरा बाह्य आचरण, उसी को अपना मान लिया है। जबकि परमात्मा कहते है कि सबसे पहले अपने अंतस से...

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