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दीक्षा के लिए उम्र नहीं, अपितु अंतस की योग्यता जरूरी: आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म.

दीक्षा के लिए उम्र नहीं, अपितु अंतस की योग्यता जरूरी: आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म.

★ अन्य भाषाओं के साथ हिन्दी को अनिवार्यतः सिखने की बताई महत्ता

Sagevani.com @चेन्नई ; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने आचारांग सूत्र की गाथा का विश्लेषण करते हुए कहा कि जिज्ञासा से ही धर्म का प्रारंभ है, धर्म की पहली सिढ़ी है। संसार, पदार्थ के बारे में सवाल पैदा होना प्रश्न है और स्वयं के बारे में जानना, कि *मैं कौन हूँ, कहां से आया हूँ, कहां जाऊंगा, यह विचार जिज्ञासा हैं।* अपना बोध नहीं होने के कारण अपने नाम को अपना मान बैठा हूँ, अपने शरीर के स्वरूप को अपना मानता हूँ, इसी को अपनी दुनिया मानता हूँ।

मैं का अर्थ मेरा नाम, मेरा स्वरूप, मेरा बाह्य आचरण, उसी को अपना मान लिया है। जबकि परमात्मा कहते है कि सबसे पहले अपने अंतस से यह प्रश्न करों कि ‘मैं कौन हूँ?’ यह जानना है। दूसरा, तीसरा प्रश्न- मैं कहां से आया हूँ, कहां जाऊंगा, हमारी शाश्वतता को दिखाता है। इन प्रश्न से यह मालूम होता है कि मैं यहां का नहीं हूँ, कही और से आया हूँ एवं कही आऊंगा जरूर। जो मरने वाला है, वह मैं नहीं हूँ और मैं बदलने वाला भी नहीं हूँ, मैं स्वयं में शाश्वत हूँ। मैं तो वह हूँ जो कभी मरता नहीं, मिटता नहीं, बदलता नहीं, जो सदा-सदा रहने वाला हूँ, वह मेरा दिव्य स्वरूप है। शरीर तो हर समय, प्रति क्षण बदलता रहता है। *जो नहीं बदलता है, वह है मेरी आत्मा।*

◆ जड़ और चेतन की हो पहचान

गुरुवर ने आगे कहा कि संसार के प्रश्नों से मेरा कोई प्रश्न नहीं है, जबकि मैं स्वयं एक को जान लूंगा, तो मैं सबको जान लूंगा। दुनिया में दो तत्व ही है एक जड़ और एक चेतन। चेतन कभी जड़ नहीं हो सकता और जड़ कभी चेतन नहीं हो सकता है। हम प्रश्न के कारण बहुत भटके है, अब हम स्वयं के बारें में जानने की कोशिश करें। अपने आप को पहचानने की कोशिश करें, क्योंकि *अपने आप को मैं स्वयं ही जान सकता हूँ, दूसरा कोई नहीं जान सकता है।*

◆ माँ होती सत् संस्कार देने वाली

वर्तमान की ज्वलंत समस्या के बारे में विशेष प्रतिबोध देते हुए कहा कि हम हमारे संस्कारों से स्वयं तो दूर होते जा रहे है ही, हमारे बच्चों को भी दूर कर रहे है। हम अन्य भाषाएं सिखे कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन हमारी मूल भारतीय हिन्दी भाषा को जरुर सीखें, सिखायें। बिना हिन्दी के हम संतो से, सत् साहित्य से, आध्यात्मिक विषयो से दूर हो जाते हैं।

*माँ एक ऐसी होती है जो बच्चों को परमात्मा महावीर के मार्ग पर बढ़ने की ओर गतिशील होने, चारित्र मार्ग पर चलने की ओर प्रेरणा देती हैं।* और यही मार्ग सही मार्ग है, आनन्द का मार्ग है, आत्मिक सुख का मार्ग है, शाश्वत शांति का मार्ग है। बच्चें एकदम सरल होते है, सीधे, सादगी भरे होते है, मन की बात छिपाते नहीं।

बाल दीक्षा के बारे में बताते हुए कहा कि दीक्षा लेना के लिए उम्र नहीं, उसकी योग्यता, उसकी अन्तर की भावना होती है। जैन धर्म के सभी आचार्य, जिन्होंने जीन शासन की अत्यंत प्रभावना की है, वे लगभग सभी छोटी उम्र में दीक्षित हुए है।

◆ गर्भवती माताएं टीवी, मोबाइल से रहे दूर

गुरुवर ने कुठाराघात करते हुए कहा कि वर्तमान में गर्भवती माताएं जादातर समय टीवी और मोबाइल पर रहती है एवं उसी के परिणाम स्वरूप बच्चों में जन्म से ही विकृतियां पैदा हो रही है। अपने अध्यात्म के मूल संस्कारों से दूर होते जा रहे है।

◆ योग्य साधुओं के आधार पर चलेगा भगवान महावीर का शासन

आपने कहा कि दीक्षा हर कोई बच्चा लेता नहीं, लेता वहीं जो धर्म के निमित्त को कारण बना लेता है, वही दीक्षा ग्रहण करता है। योग्यता ही दीक्षा ग्रहण की पहचान होती है, उम्र नहीं। वर्तमान भगवान महावीर का शासन जो 21 हजार वर्ष तक चलने वाला है, वह योग्य साधुओं के आधार पर ही चलने वाला है।

गुरु भगवंत ने अंजनशलाका और प्राणप्रतिष्ठा के अन्तर को रेखांकित किया। आचार्य प्रवर ने कहा कि हमें जो बह्य इन्द्रियां, पैसा, भौतिक सुख सुविधाएं जो प्राप्त हुई है, वह धर्म से ही प्राप्त हुई है। हमें आगे की गति सुधारने के लिए धर्म का आचरण जरूरी है।

समाचार सम्प्रेषक : स्वरूप चन्द दाँती

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