जोधपुर में चातुर्मास एक प्रवचन के दौरान ऋषि मुनि महाराज ने कहा कि यदि आपकी किसी क्रिया से व्यक्ति को चोट पहुंचता है तो वह अल्पकालीन होता है, लेकिन वही जवाब की वाणी की वजह से किसी को कोई चोट पहुंचता है तो वह दीर्घकालीन होता है। इसलिए हमें ऐसी कोशिश हमेशा रखनी चाहिए कि दूसरों को किसी प्रकार का कटु वचन बोलने से बचें।
लोगों को धर्म को अपने जीवन के अतिरिक्त कार्य के रूप में लेकर नहीं चलना चाहिए। धर्म जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिए तब जाकर धर्म आपके जीवन का बल बनता है। धार्मिक व्यक्ति अनजाने में भी किसी व्यक्ति को छूट नहीं पहुंचाता।
चातुर्मास प्रवचन की ज्ञान धारा बहाते हुए उपाध्याय प्रवर रविंद्र मुनि जी कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति पाप से दूर रहता है। धार्मिक व्यक्ति किसी का दिल नहीं दुखाता, ईर्ष्या नहीं करता, चोरी-बेईमानी नहीं करता, विनय भाव रखता है, अहंकार नहीं करता और अपने द्वारा किए गए धान का ढोल नहीं पीटता है। धर्म तत्व वाले लोग पाप कर्म से दूर रहते हैं और उन्हें मरणोपरांत सद्गति प्राप्त होती है।
अभिमान करना अज्ञानी का लक्षण है। जिस प्रकार अंधा पुरुष बाहर के प्रकाश होने के बावजूद भी कुछ नहीं देख पाता उसी प्रकार प्रज्ञा हीन व्यक्ति शास्त्र के समक्ष रहते हुए भी सत्य का दर्शन नहीं कर पाता। शास्त्रों को घर में सजाने मात्र से ज्ञान नहीं मिलता ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसे पढ़ना पड़ता है और उसके गुड़ रहस्य को समझना पड़ता है।
ज्ञान और कर्म से ही मोक्ष प्राप्त होता है। जीवन में ज्ञान और आचरण दोनों ही बहुत जरूरी है। इसलिए जीवन में ज्ञान और प्रिया का सुमेल होना जरूरी है। तभी जीवन का विकास संभव है। संतोषी साधक कभी कोई पाप नहीं करते। संतोष तभी होगा जब व्यक्ति लोभ का त्याग कर दे। लोभ का त्याग कर देने से व्यक्ति पाप नहीं करता है। संतोषी व्यक्ति अपने आप को कई प्रकार की हिंसा से बचा लेता है।
अभिमानी अपने अहंकार में चूर होकर दूसरों को हमेशा तुच्छ मानता। लेकिन ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। हमें दूसरों को सामान रूप से देखना चाहिए। जो अपनी प्रज्ञा के अहंकार में दूसरों की अवज्ञा करता है वह मूर्ख बुद्धि होता है। ऐसा अहंकार करने वाला व्यक्ति मूर्ख होता है और दूसरों का ही नहीं अपना भी कल्याण नहीं कर पाता।
वाणी की कटुता लंबे समय तक लोगों को पीड़ा देती है: ऋषि मुनि जी महाराज