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आत्म साधना के मार्ग में आगे बढऩे के लिए प्रमाद सबसे बड़ा शत्रु है: रविन्द्र मुनि जी

आत्म साधना के मार्ग में आगे बढऩे के लिए प्रमाद सबसे बड़ा शत्रु है। ऐसा व्यक्ति जीवन में धर्म साधना नहीं कर सकता। प्रमाद में व्यक्ति अपना अमूल्य समय गंवा देता है। प्रमाद के पांच भेद हैं। इनमें मद्य, विषय, कषाय, निद्रा व विकया। यह बात दिवाकर भवन पर चातुर्मास हेतु विराजित मेवाड़ गोरव प्रखर वक्ता श्री रविन्द्र मुनि जी म.सा.ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि मद्य, शराब आदि का व्यसनी व्यक्ति अच्छी तरह से धर्म साधना नहीं कर सकता। शराब आदि का व्यसनी व्यक्ति भोजन बगैर रह सकता है लेकिन शराब के बिना नहीं रह सकता। नशे वाला व्यक्ति जिनवाणी नहीं सुन सकता। पांच इंद्रियों के विषय में शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श के प्रति जो आसक्त है वह धर्माराधना नहीं कर सकता। इंद्रीय विष की पराधीनता के कारण भंवरे, मछली, पतंगा, हिरण को मौत के घाट उतरना पड़ा। मनुष्य यदि पांच इंद्रियों का गुलाम होगा तो उसकी हालत सोची जा सक...

बच्चे धर्म से जुड़े रहेंगे तो अच्छे इन्सान बनेंगे: जयतिलक मुनिजी

यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्मबन्धुओ, बच्चों को, परिवार को धर्म से जोड़ना आवश्यक कार्य है जैसे आज टी वी सीरियल देखने में सुगमता लगती है तो क्या धर्म से बच्चो को जोड़ना क्या उससे भी गया बीता है। यदि धर्म स्थान में कार्यक्रम करते रहेगें हो बच्चों को धर्म स्थान में न आने में रुचि रहेगी बच्चे धर्म से जुड़े रहेंगे तो अच्छे इन्सान बनेंगे । जिससे जब स्वाध्यायी का प्रवचन सुन सकते हो तो क्या आप बच्चों द्वारा किये गये धार्मिक कार्यक्रम को नहीं देख सकते। बडो-2 का मन सामायिक में नही लगता फिर बच्चों को मात्र सामयिक, प्रतिक्रमण करने के लिए कहने से वे कैसे धर्म में जुड़ेंगे ? आपको बच्चो का पार्टी में जाना, पिक्चर में जाना अच्छा लगता है। नहीं ना, तो फिर ये आवश्यक है कि बच्चों को धार्मिक नाटिका नाटका करवाये। महिला मण्डल का कर्तव्य है कि व...

संसार वह होता है जो क्षण-2 में प्राप्त होता है: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में कहा कि आत्मबन्धुओं आज पर्युषण पर्व का छठा दिन है। जिनेश्वर भगवान ने फरमाया कि संसार वह होता है जो क्षण-2 में प्राप्त होता है। यहाँ द्रव्य, क्षेत्र, काल भाव की अपेक्षा से सभी द्रव्यों में परिवर्तन होता है जिन द्रव्यों की आप सुरक्षा, पहरेदारी करते हो सभी का चिन्तन मनन करते हो वे सभी जीव-अजीव एक दिन नष्ट हो जाते है। एक छोटा सा मकान बनाने पर आप इतना खुश होते हो सबको अपनी खुशी बांटने के लिए आमंत्रित करते हो और अपनी तारीफ भी कान लगा कर सुनते हो। यदि तारीफ ना करते  हो स्वयं पूछते हो कि मकान कैसा लगा। घर की एक एक वस्तु के बारे में बताते हो। घर आवश्यकता पूर्ति के लिए होता है पर इन्टीरियर कराते हो लाखो का। इस प्रकार, घर, गाड़ी इन्हें खरीद कर प्रसन्न होते हो, सार-संभाल करते हो। भगवान कहते है ये सब शाश्वत नहीं है। कवि कहता है कि जो भी इस दुनिया को दिख ...

सप्तकुव्यसन का त्याग करो, जीवन में धर्म धारण करो: जयतिलक मुनिजी

सर्वप्रथम महिला मंडल की सदस्याओं ने महासती चंदनबाला के जीवन पर बहुत ही सुंदर नाटिका प्रस्तुत की। तत्पश्चात गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि हमारा यह महान पर्युषण पर्व के दिन घटते जा रहे है कहते है, जैसे-2 गाड़ी आगे बढ़ती है वैसे -2 वेग बढ़ता है। वैसे ही धर्म में आपको उत्कृष्टता आनी चाहिए ज्ञानी जन कहते है आपको कमर कस अपना लक्ष्य निर्धारित कर लेना चाहिए क्योंकी यह अवसर बीत गया तो सिर्फ पश्चाताप ही रहेगा। इन दिनों भी यदि आप धर्म ध्यान तपस्या नही करोगे तो ये पर्व कोरा – 2 चला जायेगा। आप लाभ से वंचित रह जाओगे । ज्ञानी जन कहते है कि हम मोक्ष जा पायें या न जा पाये पर मोक्ष के निकट तो जा ही सकते हैं। जब पुण्यवान बढ़ेगी तो अवश्य आप संसार छोड़ मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ जाओगे! संसार में लगी आत्मा में वैराग्य का रंग चढ़ने से एक दिन वह आत्मा धर्म मार्ग में बढ़ेगी। आज जमाना बदलाव का है रहन-सहन...

श्री गुरु आनंद – मिश्री- रूप ‘रजत’ – सुभद्र जन्म जयंती महोत्सव भव्यता पूर्वक सम्पन्न हुआ

आगम मर्मज्ञ प. पू. श्री कांति मुनि जी म. सा. एवं श्रमण संघीय उप प्रवर्तक प. पू. श्री पंकज मुनि जी म. सा. आदि ठाणा – 5 के पावन सान्निध्य में गुरु गणेश- मिश्री पावन स्मृति धाम, सुल्लूरपेठ के प्रांगण में गुरु आनंद- मिश्री -रूप ‘रजत’ -सुभद्र जन्म जयंती महोत्सव बहुत ही भव्यता के साथ संपन्न हुआ। सर्व प्रथम मधुर गायक श्री रूपेश मुनि जी म. सा. ने दादा गुरुदेव की आरती का गायन करवाया । तत्पश्चात् आए हुए सभी श्रध्दालु गुरु भक्तों ने बड़ी श्रद्धा के साथ गुरु वंदन किया । आगम मर्मज्ञ प. पू. श्री कांति मुनि जी म. सा. के मुखार्विंद से मंगलाचरण के द्वारा धर्म सभा का शुभारम्भ हुआ। विद्याभिलाषी श्री लोकेश मुनि जी म. सा. ने गुरु भक्ति गीत प्रस्तुत किया। दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ. श्री वरुण मुनि जी म. सा. ने चारों महापुरुषों के जीवन पर ओजस्वी शब्दों में प्रकाश डालते हुए फरमाया – ...

ज्ञान मनुष्य को तृप्ति, संतोष, आनंद, शांति व निर्भयता का दान देता है : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमति वल्लभ नोर्थटाउन जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि अज्ञान आपका घातक शत्रु है, जबकि ज्ञान हितैषी मित्र। अज्ञान संशय का निर्माण कर जीवन को कटु, कलंकित व संकीर्ण बनाता है। जीवन जीने की उमंग समाप्त हो जाती है, मन कर्म से विमुख होकर तनावग्रस्त हो सकता है। दूसरी ओर ज्ञान जीवन के लिए आशा, उमंग, प्रेरणा, उत्साह व आनंद के इतने गवाक्ष खोल देता है कि जीवन का क्षण-क्षण अनमोल उपहार प्रतीत होता है। एक सृजनशील क्षण आपको प्रतिष्ठा के उत्तुंग शिखर पर प्रतिस्थापित कर सकता है, जबकि कुविचार की अवस्था में क्षण भर का का निर्णय आपको निकृष्टता की गर्त में धकेलकर जन्म-जन्मांतरों के लिए आपको लांछित व कलंकित करने के लिए पर्याप्त है। अज्ञान हमें निराशा और पतन की ओर ले जाता है, जबकि ज्ञान आत्मिक उन्नति का पर्याय बनकर जीवन समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नयन की...

क्रोध पर विजय पाना संयम से ही संभव है: देवेंद्रसागरसूरि

आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने बिन्नी नोर्थटाउन के श्री सुमतिवल्लभ जैन संघ में धर्म प्रवचन देते हुए कहा कि काम क्रोध मद लोभ मोह यह पाँच अवगुण व्यक्ति के व्यक्तित्व के शत्रु हैं। यह पाँचो ही व्यक्ति के स्वाभाविक एवं प्राकृतिक गुण नहीं हैं। इनमें से मद को अहंकार भी ही कहते हैं और अहंकार हमारे पतन का कारण होता है। यह मनुष्य द्वारा स्व अर्जित मनोरोग है । यह मनुष्य द्वारा स्वयं पाला गया रोग है। इसके प्रभाव से सज्जन भी अपना विवेक खो देता है और गलत व्यवहार करने लगता है अर्थात् इससे विवेक नष्ट हो जाता है और विवेक के नष्ट होते ही मनुष्य पशुवत आचरण करने लगता है। ऐसा इसलिए होता है कि जब मनुष्य भीतर से तो खाली होता है लेकिन संसार में वह अपने आपको कुछ अधिक प्रदर्शित करना चाहता है ,तब वह एक अनुचित आवरण अपने चारों तरफ सृजित कर लेता है और जो कुरचित आवरण उसने अपने चारों तरफ सृजित किया है , समाज से उसकी ...

नम्र या विनीत होना कमजोरी या कायरता की नहीं, महानता की निशानी है : देवेंद्रसागरसूरि

श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित किया । उन्होंने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी होती है उसका अहंकार। अहंकार प्रगति का सबसे बड़ा बाधक तत्व है। जो साधक विनम्र एवं ऋजु नहीं होता, उसके लिये सत्य के दरवाजे नहीं खुल सकते। अहंकार के वशीभूत हुआ व्यक्ति यह सोचता है कि यदि मैं झुक गया और सह लिया तो लोग मुझे छोटा एवं कमजोर समझकर मेरी उपेक्षा करेंगे परन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। वास्तव में देखा जाये तो नम्र या विनीत होना कमजोरी या कायरता की नहीं, महानता की निशानी है और इसमें से ही जीवन की सार्थकता उजागर होती है। भगवान महावीर की आर्षवाणी धम्मो शुद्धस्थ चिट्ठई जो ऋजुता और विनम्रता की गुणवत्ता को उजागर करती है। ऋजु व्यक्ति ही सत्य की साधना कर सकता है क्योंकि ऋजुता और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...

नेम प्रभु का प्रेम पाना कठिन है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी

     *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  विश्व पूजनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, श्रुत समुद्र,श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंशl    🪔 *विषय मेरा प्रेम प्रभु नेम* ~ प्रभु नेम का जन्म कल्याणक यानी जगत के सर्वजीवों को पवित्रता और अहिंसा वाले बनाने का परम पर्व। ~ नेमी प्रभु के ध्यान में जो भक्त लीन होता है उसे भी नेमी प्रभु का परम ऐश्वर्या का अनुभव होता है। ~जब तक हमारी दृष्टि शरीर, सुख, दुख, मान, अपमान तक है तब तक नेम प्रभु का प्रेम पाना कठिन है। ~ नेमी प्रभु का रागी जीव जगत के कोई भी पदार्थ, घटना, स्थिति में न राग, ना द्वेष, इन दोनों दशा से मुक्त परमसमता में ही रहता है। ~नेमिका ज्ञानी जीव सर्व मानवों में ज्ञान दशा के बल से परम ज्ञानमय अवस्था को ह...

साधक हर पल जागृत ही रहते हैं: डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा

     *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 विश्व पूजनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, संघ एकता शिल्पी श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7* ~ धर्म युवावस्था, बलवान अवस्था, और जागृत अवस्था में ही हो सकता है और यह ही श्रेष्ठ अवस्था है। ~ पूर्व की अनंत काल की हमारी चेतना पराधीन यानी जन्म, जरा, मृत्यु, रोग, कर्म की अवस्था( दशा )में ही पसार हुई थी। ~ मृत्यु कभी भी कोई भी पल आ ही सकती है इसीलिए साधक हर पल जागृत ही रहते हैं। ~ जो साधक गुणवान है, ज्ञानी है, साधना में रथ है और अज्ञान को नाश करके सम्यक् दर्शन पाने वाला है उसकी मृत्यु समाधि में ही होगी। ~ सम्यक् दर्शन का अनुभव यानी राग द्वेष को मूलभूत रूप से कमजोर करना, क्षय...

संबोधि साधना स्वयं को जानने देखने और पहचान की कला है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि संबोधि साधना स्वयं को जानने देखने और पहचान की कला हैl दुनिया में आदमी एक ही काम करता है दूसरों को पहचानने का व्यक्ति जिंदगी के जितने पाल दूसरों को जानने के लगता हैl उसका चौथा हिस्सा भी अपने को जानने के लगा दे तो शायद इस जीवन में सब कुछ उपलब्ध हो जाएl उसके जीवन का सपना होता है आदमी चंद्रलोक तक गया वापसी में मिट्टी के डेली लेकर आयाl सबसे पहला इंसान जो चंद्रलोक तक गया कहते हैं उसके जाने में दो अरब डालर खर्च हुए चंद्रलोक से लाया क्या मिट्टी के डेली व्यक्ति अगर अंतर लोग में उतर जाए तो एक कोड़ी भी खर्चा नहीं होगा और आते समय पता नहीं यह कितने हीरे लेकर आएगाl  संबोधि साधना हमें जो बेहतरीन तरीके...

सम्यक दर्शन है तो निर्वाण निश्चित है: दर्शन मुनि जी म.सा

सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद पुज्य की दर्शन मुनि जी म.सा,–ठाणांग सूत्र में 4 प्रकार के जीव बताये है 1 पेट भी भरता है पेटी भी भरता है ..संसारी जीव 2) पेट भरता है पेटी नहीं भरता है….साधु संत 3) -पेट नही भरता पेटी भरता है …मम्मन सेठ ४) पेट भी नहीं भरता वह पेटी भी नहीं भरता है.. सिद्ध भगवन  पुण्यवानी से लक्ष्मी मिली, जिसकी जितनी पुण्यवानी होगी उतनी दुकान चलेगी। पुण्यवाणी का खेल है। पुण्य से मिले धन का दुरुपयोग मत कर ।। *पुज्य प्रवर्त‌क की प्रकाश मुनि जी मासा*-→ यो मुक्त पंथम…. विद्वद्वर्या डॉ. श्री ललित प्रभाजी म.सा. गुरुदेव के लिये कहते है…  *यो मुक्ति – पन्थ – गमने करुणार्द्र सार्थम् ।* *संसार मार्ग विमुखम् प्रविमुक्त स्वार्थम् ।* *आनन्द रूप मखिलम् परिपूर्ण सत्त्वम् ।* *सौभाग्य सद्गुरुवरं शिवदं स्मरामि ॥३॥*  श्री सोभग्यमल जी महारास...

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