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“जी ले ज़रा“ कार्यक्रम का आयोजन किया

एफ टी एस महिला समिति चेन्नई ने 21 अगस्त को श्रीमती विमलाजी दम्मानी के निवास स्थान पर वर्ल्ड सीनियर सिटीज़न डे के उपलक्ष्यमें “जी ले ज़रा “कार्यक्रम का आयोजन किया । कहते हैं न ,ओल्ड इस गोल्ड वैसे ही हम सबको अनुभव हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत ओंकार मंत्र के साथ हुई। 45 सदस्य एवं 20 सीनियर सिटीज़न महिलाएँ हमारे कार्यक्रम में उपस्थित थी। हम सबने मंत्रोच्चार करके उनके ऊपर फूलों की वर्षा की।ऐसी ऐसी महिलाओं को हमने निमंत्रण दिया था जो अब कभी बाहर नहीं निकलती हैं पर अपने समय में भी वह बहुत एक्टिव थी। अभी भी कुछ महिलाएँ घर में ही रहकर बहुत से कार्य कर लेती है। दो तीन महिलाओं की उम्र 75-90 की थी पर अभी भी वह स्वेटर बना बनाकर बाँटती हैं कोई किताबें लिखती हैं कोई डे केयर होम चलाती हैं ।इन सबके सामने हमारा काम तो नगण्य हैं। अध्यक्ष वीणा झवर ने सबका स्वागत किया। हमारी प्रेरणा स्तोत्र राष्ट्रीय अध्यक्षा श्री...

पर्युषण महापर्व पर अष्ठ दिवसीय साधना- आराधना सम्पन्न    

स्वाध्याय भवन साहूकारपेट चेन्नई में पर्युषण महापर्व पर अष्ठ दिवसीय साधना- आराधना सम्पन्न अष्ठ दिवसीय साधना- आराधना के अंतर्गत श्राविका रत्न श्रीमती वी.शशिजी कांकरिया ने अंतगड सूत्र के मूल पाठ के संग स्वाध्याय के पांच भेद, मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद, कषाय व अशुभ योग के पांच प्रतिक्रमण, देवसी, रायसी, पक्खी, चौमासी व सांवत्सरिक पांच प्रकार के प्रतिक्रमण, विभिन्न चौभंगियों, दान, तप, दस मुण्डन के अंतर्गत पांच इन्द्रियों, चार कषायों व दसवें सिर के मुण्डन, दान, क्षमा आदि विभिन्न विषयों पर विस्तृत विवेचन किया| वरिष्ठ स्वाध्यायी बन्धुवर श्रावक रत्न श्री चम्पालालजी बोथरा ने अंतगड सूत्र के अर्थ का वांचन किया व ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, दान, शील, भावना आदि विषयों पर सुन्दर विवेचन करते हुए अपने भाव रखें| दोनों स्वाध्यायीयों के साथ वरिष्ठ स्वाध्यायी श्री नवरतनमलजी चोरडिया ने स्वाध्यायमय सेवाएं दी व संवत्...

समाधिमय हो मरण: जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

छोटे, महत्वपूर्ण जीवन को अध्यात्ममय बनाने की दी प्रेरणा Sagevaani.com @चेन्नई; श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी में शासनोत्कर्ष वर्षावास में उत्तराध्यन सूत्र के पाँचवे अध्ययन में धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म. ने कहा कि पहले अध्ययन से विनय में रहना सीखा, दूसरे में परिषह- आत्मा को आनंद देने वाले कष्ट चाहे तपस्या हो या अन्य कष्ट उसे सहन करना सीखा, तीसरे अध्ययन में जाना कि मेरे पास जो है, वह गौरवशाली है। स्व के कारण प्राप्त वह गौरव है, पर से प्राप्त अहंकार है। जीवन का कोई भरोसा नहीं अतः परमात्मा वाणी पर श्रद्धा से आचरण करें। चौथे अध्ययन से हमने सीखा कि लाल बत्ती की तरह रुक कर, चिन्तन पूर्वक आगे बढ़ना सीखा। संसार के कामों में दिन बहुत छोटा लगता है और वहीं धर्म में, सामायिक करते समय लम्...

दया धर्म का मूल है और पाप मूल अभिमान: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चेन्नई दया धर्म का मूल है और पाप मूल अभिमान बुधवार श्री एस.एस. जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि दया ही धर्म का मूल है और दया ही सुखों की खान है। दयावान प्राणी कभी किसी का अहित नहीं है और ना ही कभी पाप और अधर्म करता है। वह शुद्ध आत्मा होता है। वह सच्चे अर्थों में धर्मात्मा होता है। जो व्यक्ति दया के भाव विकसित करता है, वह सम्प्रर्ण सुख को प्राप्त करके अपनी इस आत्मा को संसार से मुक्ति दिलवा सकता है। जीवन मे अनुकम्पा और करूणा की भावना नहीं है वो प्रांणी न तो धर्म कर सकता है और नाही वो दया कर सकता है। ऐसा व्यक्ति पत्थर के समान है। दया मे एक सुख नहीं, हजारों सुख छुपे हुए होते है। दया और पुण्य करने वाला व्यक्ति कभी किसी पर एहसान नही जताता है और नाहि कभी रोब दिखाकर अपने एहसानो को गिनवाता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने उत्ताराध्ययन सूत्र का वांचन ...

नार्थ टाउन में सामुहिक क्षमापना दिवस मनाया गया

श्री यस यस जैन संघ नार्थ टाउन के तत्वावधान में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा की पावन निश्रा में सामुहिक क्षमापना दिवस मनाया गया। साथ ही सभी तपस्यार्थीयो को कम्युनिटी हॉल में सामुहिक पारणा करवाया गया। जिसमें करीब 250 तपस्यार्थीयो ने पारणा किया। पारणे के लाभार्थी श्रीमती प्रेमकंवरजी स्व.सेठ साहब पुखराज जी खींचा परिवार, नार्थ टाउन थे उनका सम्मान किया गया। महिला मण्डल सचिव ममता कोठारी ने क्षमापना के बारे में वर्णन किया। अध्यक्षा ललिता सबदडा ने क्षमा पर विचार व्यक्त किया। बंसीलाल डोसी ने पर्युषण पर्व में हुए कार्यक्रमों की जानकारी दी। महावीर लुणावत ने क्षमा पर स्तवन गाया । ज्ञानचंद कोठारी ने कहा कि ‘क्षमा देना और क्षमा लेना यही है पर्युषण पर्व का कहना’ । अनेक वक्ताओं ने क्षमा याचना के बारे में बताया। अध्यक्ष अशोक कोठारी ने कार्यक्रम का संचालन किया और सकल संघ से क्षमा याचना की। तत्पश्चा...

साध्वी चांद कुंवर जी महाराज की सुशिष्या होना मेरा गौरव और सौभाग्य है: साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

भावुक होकर कहा कि ना बचपन में माँ का और ना ही साध्वी जीवन में गुरू का सानिध्य अधिक समय तक नहीं मिला। देश की सुविख्यात जैन साध्वी और मालव मणि की उपाधि से अलंकृत साध्वी चांदकुंवर जी महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित गुणानुवाद सभा में अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए उनकी अंतिम सुशिष्या साध्वी नूतन प्रभाश्री जी की आंखें छलछला उठीं। भावुक होकर उन्होंने कहा कि बचपन में एक वर्ष से अधिक उन्हें अपनी माँ का सानिध्य नहीं मिला और संन्यासी जीवन में भी सिर्फ 14 माह में ही उनकी गुरुणी मैया चांदकुंवर जी महाराज का देवलोक गमन हो गया जिससे ना तो एक पुत्री के रुप में और ना ही एक शिष्या के रुप में मैं अपने दायित्व का निर्वहन कर पाई, लेकिन संतोष है कि गुरुणी मैया साध्वी चांद कुंवर जी महाराज की सुशिष्या होना मेरा गौरव और सौभाग्य है। गुणानुवाद सभा में अपनी दाद गुरुणी के उपकारों का स्मरण करती हुईं साध्वी रमणीक कु...

आजीविका का सबसे बड़ा शत्रु है तस्करी शास्त्रों का व्यापार: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि सम्यक आजीविका का सबसे बड़ा शत्रु है तस्करी शास्त्रों का व्यापार आज शायद हिंसा और आतंक को बढ़ाने में सबसे बड़ा हेतु बना रहा हैl यदि शास्त्रों को खुली छूटना हो इनकी बिक्री पर प्रतिबंध हो तो अपने आप ही आतंक कम होगाl जीवन से लि सातवां सूत्र है संस्कार आदमी संस्कारों के आधार पर जीवन जीता हैl जैसे संस्कार में अच्छा व्यवहार प्रारंभ से ही अच्छे संस्कार मिलते हैं तो जीवन अच्छा बनता हैl एक तोते को अच्छा संस्कार मिलता है इसलिए उसने राजा का स्वागत किया दूसरे तोते को बुरे संस्कार मिले थे इसलिए राजा को देखते ही बोल पड़ा आओ मारो काटोl राजा ने पहले तोते से पूछा दोनों की स्वभाव में इतनी फर्क का क्या कार...

क्रोध अहंकार द्वारा उत्पन्न एक उपद्रवी मनोरोग है: देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई. श्री सुमतिवल्लभ जैन संघ नोर्थटाउन बिन्नी में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि क्रोध अहंकार द्वारा उत्पन्न एक उपद्रवी मनोरोग है। यह हमेशा नुकसानदायक ही सिद्ध होता है। क्रोध का उद्देश्य सामने वाले को अपने रोष, विरोध या पराक्रम का परिचय देकर डराना होता है। भाव यह रहता है कि दबाव देकर उसे वह करने के लिए विवश किया जाए, जो चाहा गया है। किंतु देखा गया है कि यह उद्देश्य कदाचित ही कभी पूरा होता है। क्रोध के समय जिस पर अपना रौद्र रूप प्रकट किया जाता है या जिन असंस्कृत शब्दों का उपयोग किया जाता है, उससे सामने वाले के स्वाभिमान को चोट पहुंचती है। इससे एक नयी समस्या खड़ी होती है। सामने वाला क्षुब्ध होता है और प्रतिशोध लेने व उसे नीचा दिखाने की बात सोचने लगता है। क्रोध किस कारण किया गया, इसे कोई नहीं देखता। आक्रोश का उन्माद एक प्रकार का आक्रमण है, जिसके कार...

एक क्षण का भी प्रमाद हमारी आराधना को खत्म करने में समर्थ है, इसलिए: आचार्य उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरीश्वरजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने अध्यात्म कल्पद्रुम ग्रंथ के धर्मशुद्धि अधिकार का विवेचन करते हुए कहा हमने ही धर्म को अज्ञानता और मूर्खता के कारण मलिन, दोषपूर्ण बना रखा है। कई दोषों को करके इसको कलुषित कर दिया है। परमात्मा का बताया हुआ धर्म तो शुद्ध ही है। धर्म को मलिन करने के नौ दोष बताए गए हैं शैथिल्य यानी शिथिलता, मात्सर्य यानी ईर्ष्या, कदाग्रह, क्रोध, अनुताप यानी उत्तम कार्य करने के बाद पश्चाताप करना, अविधि, अभिमान, कुगुरु यानी कुसंगति और आत्मप्रशंसा। शैथिल्य का अर्थ है आलस्य नाम का दोष। हम भौतिक कार्यों में परिपूर्ण है लेकिन धार्मिक कार्यों में आलसी हैं। अपने पास हर शक्ति है, इसका उपयोग हमें सही ढंग से करना चाहिए। इसके लिए हमें हमारी अंतरात्मा की गवाही लेनी चाहिए। हमने 60% जिं...

‘जिससे मोक्ष का सुख मिलता है उसका नाम है दीक्षा’: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

नेमिनाथ परमात्मा के दीक्षा कल्याणक पर आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी ने कहा किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्यश्री केशरसूरीश्वरजी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने नेमिनाथ परमात्मा के दीक्षा कल्याणक के अवसर पर परमात्मा के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मणि के प्रकाश से ज्यादा तेजस्वी रत्न की होता है। अरिष्टरत्न के सानिध्य में रहने से हर तरह की मलिनता, दूषण दूर होते हैं, ऐसा अरिष्टरत्न सिवदेवी माता ने नेमकुमार के गर्भ में आने पर देखा था। नेमिनाथ परमात्मा का नाम गुणवाची और रत्नवाची है। नेमिनाथ परमात्मा को चंद्रमा की उपमा दी गई। उन्होंने कहा तीर्थंकरों का नाम गुणों के आधार पर बनता है। गुण व पुण्य के आधार पर वे विश्व का कल्याण करते हैं। नेमिनाथ परमात्मा ने तीन सौ वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की। उनका कुल आयुष्य एक हजार वर्ष का...

नमस्कार महामंत्र शाश्वत मंत्र है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.

      *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई* विश्व पूजनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, युग दिवाकर श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔   ~ श्री नमस्कार महामंत्र अनादि काल से था, वर्तमान में है, और अनंत काल तक रहेगा भी इसीलिए यह मंत्र शाश्वत मंत्र है। ~ जिसने श्री नमस्कार महामंत्र को सम्यक् रूप से पहचाना, पकड़ा, समर्पित किया, बहुमन भाव किया तो वह साधक भी नवकारमय यानि परमात्मा जैसा होता ही है। ~ श्री महामंत्र की भाव धार मेरे भीतर की चैतन्यता को प्रकट करता ही है इसीलिए यह मंत्र चैतन्य रूप है। ~ श्री नमस्कार महामंत्र वह परम गुण राशि है जिसके प्रभाव से हमारे जीवन में दोषों का मूलभूत क्षय और गुणों की प्राप्ति होती ह...

तप के अंदर त्याग की भावना अंगूठी में हीरे के समान है: आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्यश्री केशरसूरीश्वरजी के समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने प्रवचन में कहा अपने भाव, विचार अपने मन से निकले हुए हैं। मन परमाणु पुद्गगल से बना हुआ ढांचा है। ज्ञानियों ने कहा है भावना का जो असर हो रहा है वह परमाणु पुद्गल से हो रहा है। यह हमारे मन के चिंतन का भी प्रभाव है। अपनी आत्मा अकेली कुछ नहीं कर सकती। शुभ भाव हमारी आत्मा में रहे हुए हैं। प्रभु को देखकर मोह की वासना दूर हो तो वह श्रेष्ठ भक्ति है। चारित्र ग्रहण करने के पुण्य में से माता-पिता को आठवां हिस्सा मिलता है। कोई वैरागी आत्मा अपने स्वजन को भूल भी जाए परन्तु उपकार तो स्मरण रखते ही है। वे चेहरे को भूल सकते हैं, उपकार को नहीं। उपकार तो महापुरुष कभी भूलते ही नहीं है। जिनशासन किए हुए उपकारों को भूलने की बात नहीं करता है। दुर्जन का समय, विवाद, व्यस...

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