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सुखसाता पूछने का मतलब क्या?: परमपूज्य स्वर्णश्रीजी म.सा.

सुखसाता पूछने का मतलब क्या?: परमपूज्य स्वर्णश्रीजी म.सा.

 सुख आत्मा का और साता शरीर की|

इसीलिए श्री संघ का हर एक सदस्य सुखसाता में रहे यही मारसाब की भावना है| वह सदस्य सुख साता में रहेगा तो ही वह धर्म में रममान हो सकता है, यह व्यापक दृष्टिकोन रखकर 32 आगमोंमें से सुखविपाक सूत्र का धारावाहिक शुरू किया है|

 उसके पश्चात म.सा. ने पूछा आप लोग पुण्य चाहते हो या पैसा? सभीने जवाब दिया पुण्य चाहते तो पुण्य है पर दौडते तो पैसे के लिए है| मारसाब ने कहा मनुष्य जन्म मिला है वह हमारी पुन्यवानी है| और यह पुण्य घटाने नही देना है|

तो पुण्य कैसे नहीं घटेगा? तो अध्यात्म की राह में रहना ही होगा| धर्म ध्यान जरुरी है| परिवार के सभी सदस्य को गुरुदर्शन के लिए हर रोज स्थानक में आना ही आना है| इसी से अपना पुण्य बरकरार रहेगा और हमे हमेशा सुख साता भी रहेगी|

प.पू.सुमनप्रभाजी म. सा.

 व्याख्यान की शुरुआत में ही म.सा.ने कहा कि शास्त्र की एक एक गाथा अपने आप में प्रभावशाली है| उसका उदाहरण देते वक्त उन्होंने कहा *चईत्ता भारहं वासं*

*चक्कवट्टि” महिड्ढिओ*

संति-संति करे लोए पत्तो गई मणुत्तरं* यह गाथा बहुत प्रभावशाली है| 108 बार बोलनी ही चाहिये| वह अपने आप में स्वाध्याय भी हो जायेगा और परिवार में सुख शांती भी बनी रहेगी| शास्त्र की गाथाओं की व्यवस्थित, शुद्धतासे उच्चारण जाप करेंगे तो तंत्र मंत्र का भी सहारा नहीं लेना पडेगा| सभी पीडा का नाश अपने आप हो जायेगा|

सुख का विशेष पाक जिसमें है ऐसा सुखविपाक सूत्र| जिसमें सुधर्मास्वामी जंबूस्वामी से कहते है जैसे मैंने सुना वैसा बता रहा हुॅं| इस में भी उनकी नम्रता ही दिखाई देती है| इस सूत्र में 10 राजकुमारों का वर्णन चलता है, उसमें से सर्वप्रथम मारसाब ने आज अदिनशत्रू राजा और धारीणीदेवी इनकी कहानी की शुरुआत की|

 बहुपत्नी की परंपरा उस समय थी तो राजा को हजार राणियाॅं थी| लेकिन रानियों में भी धारिणिदेवी सबसे प्रमुख थी| प्रमुख बनना भी आसान नहीं होता (जो त्यागी सो आगे) तीर्थंकर भगवान ने सभी को एक सूत्र में पिरोया है| वे प्रमुख है| साधू साध्वी श्रावण श्राविका चार समान स्तंभ (चतुर्विध संघ) के माध्यम से खडे किये|

स्त्री पुरुष दोनों को अपना कर्तव्य मर्यादा समझनी ही चाहिये ऐसा मारसाब ने सविस्तर समझाया| आगे जाके एक बात और कही, पत्नियाॅं तीन प्रकार की होती है| भोगपत्नी जो सिर्फ पती के पैसोंपर ऐशोआराम करती है| कर्मपत्नी जो पती को दुष्कर्मों से दूर करती है और धर्मपत्नी जो पती को पुण्य बढाने हेतू धर्म से जोडती है| इसबारे में समझाते समय नारी की महिमा मारसाब ने बहुत सटिकता से बताई | दोनों कुलों की उद्धार करने वाली होती है नारी ऐसा भी कहा|

 अंत मे एक उदाहरण से समझाया कि जय सियाराम कहते है हम, तो क्यू? राम तो मर्यादापुरुषोत्तम है परंतु सीतामैया का त्याग, आचरण उच्चतम है | इतना सबकुछ सहन करने के बाद भी पति को अपशब्द नहीं निकाला| इस तरह से यहा पे आके मारसाब ने कल सुबाहु के बारे में भी सुनेंगे ऐसा कहकर अपने शब्दों को विराम दिया|

जैन श्रावक संघ, राजगुरुनगर

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