दो दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर में 150 संभागी ले रहे लाभ
आज दुनिया प्रगति के अमाप्य सपने देख रही है, हर व्यक्ति विकास के अनछुए पहलुओं को छूना चाहता है। पर इस लक्ष्य प्राप्ति की भाग दौड़ ने उसके मानसिक, शारीरिक एवं भावनात्मक रूप को अत्यधिक प्रभावित किया है। उपरोक्त विचार एस एस जैन संघ, सिरकाली में तेरापंथ सभा द्वारा आयोजित दो दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर के उद्घाटन समारोह में मुनि अर्हत् कुमार ने कहें।
मुनिश्री ने आगे कहा कि आज विज्ञान ने कितनी क्रांति कर दिखाई है। अपने घर की चार दीवारों से निकल, आज का इंसान पांच महाद्वीपों की यात्रा करने लगा है। पत्थर के टुकड़ों से प्रहार करते-करते आज अणुबम जैसे भीषण अस्त्र-शस्त्र बना चुका है। जिस हिसाब से साइंस टेक्नोलॉजी बढ़ रही है, उससे लगता है संसार का बाह्य ढांचा काफी बदल जाएगा। आज विज्ञान ने अनेक सुविधाएं और संसाधनों का अविष्कार कर व्यक्ति को सुख देने का प्रयास किया है। पर इन सुविधाओं ने व्यक्ति से उसका स्वास्थ्य, उसकी शांति एवं उसका सुख उससे छीन लिया है। 50 साल पहले कितने लोगों के पास कारे, शानदार कपड़े, आलीशान कोठी या फ्लैट थे.? लेकिन उन्हें शांति, अमन, चैन था। एक संतोष सब्र का झरना उनके जीवन में बहता नज़र आता था। जबकि आज आपके पास सभी भौतिक सुविधाओं के होते हुए भी क्या है…? आपसी ईर्ष्याए है, प्रतिस्पर्धाए है, दुराव एवं टकराव है, आपाधापियां है, मारधाड़ है।
कैसी विचित्र विडंबना है, कि दुनियादारी के लिए 24 घंटे समय है। पर अपने लिए कितना है..? बारह महीने में एक महीना भी नहीं है.., एक महीने में सप्ताह भी नहीं.., एक सप्ताह में एक दिन भी नहीं.., एक दिन में भी एक घंटा भी नहीं..। कारण यह नहीं कि आपके पास समय नहीं है, कारण यह है कि आपकी इच्छा ही नहीं है। आज की युवा पीढ़ी विकास तो कर रही है, पर वह चिंता से ग्रस्त है.. उसके उमंग भरे चेहरे पर मानो चिंता का ग्रहण लग गया है और इसी कारण आज का युवावर्ग पस्त है। हर मानव जीवन में सुख प्राप्त करना चाहता है, पर वह बाहरी संसाधनों से सुख प्राप्त करने को उत्सुक है। वह नहीं जानता सुख स्त्रोत कहां है..? अगर हमें शांति, सुख को प्राप्त करना है, तो हमें स्वयं में झांकना होगा, अंतर को निहारना होगा। जिससे हम आत्मानंद को प्राप्त कर सके। हमे वर्तमान में जीना है। कल भी, कल की फिकर थी, आज भी कल की फिकर है, तो हम वर्तमान को कब जीएंगे..? वर्तमान में जीने वाला अनावश्यक तनाव से ग्रसित नहीं होता।
स्वयं में रमण करने के लिए अनेक प्रकार का आलंबन लिया जाता है, उसे एक सटीक एवं सचोट आलंबन है प्रेक्षाध्यान। समस्याओं से आवर्त इस संसार को समाधान की एक नई राह दिखाने के लिए परम पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने प्रेक्षाध्यान का आविष्कार किया। प्रेक्षाध्यान वह समरीन है, जो हमें अनंत सुखो की गहराई में ले जाता है। प्रेक्षाध्यान का अर्थ है स्वयं की प्रेक्षा, आत्मा का सूक्ष्म निरीक्षण। प्रेक्षाध्यान स्वयं को स्वयं से जोड़ने का एक सेतु है। हमें प्रेक्षाध्यान के आयामों से जुड़कर जीवन के निर्माण के साथ आत्मा का कल्याण करना चाहिए।
मुनि भरतकुमारजी ने कहा जो नियमित करता है प्रेक्षा ध्यान, आत्मा भिन्न शरीर भिन्न का होता है भान, उसकी आत्मा में जग जाता है ज्ञान, कर्म रूपी ईंधन को जला वह बन जाता हैं भगवान। प्रेक्षाध्यान के अनेकों प्रयोग व रोचक प्रतियोगिताएँ करवाई, जिससे साधकों में रुचि व उत्साह बढ़ गया। बाल संत जयदीप कुमारजी ने कहा ध्यान वह दूरबीन है, जो परमात्मा का दर्शन कराता है एवं आत्मा से आत्मा का स्पर्श कराता है। हमे ध्यान का नित्य प्रयोग करना चाहिए। कार्यक्रम की शुरुआत मुनिश्री द्वारा नवकार महामंत्र से हुई। तत्पश्चात महिला मंडल ने प्रेक्षाध्यान गीत का सुमधुर संगान किया।
युवक रत्न ज्ञानचन्द आंचलिया ने स्वागत भाषण में कहा- गुरुदेव की महती कृपा से हमे मुनिश्री का मंगल सान्निध्य प्राप्त हुआ। मुनिश्री की प्रेरणा से प्रेक्षाध्यान शिविर का आयोजन हुआ है। मुनिश्री प्रखर प्रवचनकार है एवं आपका जीवन श्रम प्रधान है। गुरुदेव के आशीर्वाद से मुनिश्री ने संथारा पछखाकर सिरकाली में नए इतिहास का सृजन किया है। हम मुनिश्री की कृपा से अभिभूत हैं। आभार ज्ञापन स्थानकवासी समाज के मंत्री धनराज चौधरी ने किया। प्रेक्षाध्यान शिवीर में तेरापंथ धर्म संघ, स्थानकवासी समाज एवं सर्वसमाज के लगभग 150 लोग लाभान्वित हो रहे हैं।
स्वरुप चन्द दाँती
प्रचार प्रसार प्रभारी
श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, चेन्नई
प्रचार प्रसार प्रभारी
श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, चेन्नई





