मुनि चंपालाल जी का मेवाड़ के अंदर रहना अपने आपके अंदर बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है ।आचार्य तुलसी के वहां से प्रस्थान करने के पश्चात एक बार मेवाड़ के अंदर खालीपन नजर आना प्रारंभ हो गया था।
पर मुनि चंपालाल जी के पुन: पधारने पर मेवाड़ के अंदर वह खालीपन अपने आप ही दूर होता चला जाता है। सभी लोगों के मन के अंदर और ज्यादा आस्था के भाव जागृत हो जाते हैं।
मुनि चंपालाल जी उदयपुर शहर में चातुर्मास के लिए प्रवेश करवाते हैं और वह चातुर्मास प्रवेश भी एक तरह से ऐतिहासिक बन गया था ।उस चातुर्मास गोगुंदा के श्रावकों के मन के अंदर आज भी उनके प्रति श्रद्धा भक्ति व समर्पण के भाव थे । उनको जब पता लगा मुनि प्रवर का उदयपुर चातुर्मास है, तब व्यापार के समय पुर जाने पर सेवा दर्शन व प्रवचन श्रवण करने का अवसर प्राप्त हो जाएगा चारों तरफ प्रसन्नता ही प्रसन्नता का वातावरण बनता जा रहा था।
वह चातुर्मास चार ही महीने मुनि प्रवर के लिए एक तरह से मंगलकारी चैत्र मास के रूपचंद्र पर संपन्न होता है। चातुर्मास संपन्न होने के पश्चात वहां से बिहार की तैयारियां होने प्रारंभ हो जाती है।