चेन्नई. गीता में श्री कृष्ण में फरमाते हैं- हे अर्जुन! अपने धर्म में मरना भी श्रेष्ठ है परंतु परधर्म को स्वीकार करना ठीक नहीं। यहां पर थोड़ा गहराई से चिंतन करें अपना धर्म यानि क्या ? हिंदू, जैन, बौद्ध, मुस्लिम धर्म ? अपने धर्म का अर्थ है- आत्मा का धर्म। यानि हमारा आत्म स्वभाव और परधर्म यानि विभाव।
यह विचार ओजस्वी प्रवचनकार डॉ. वरुण मुनि ने जैन भवन साहुकारपेट में चल रही चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा आज व्यक्ति का जैन कुल में जन्म हो जाए तो खुद को जैन मानने लग जाता है और यदि ईसाई घर में जन्म हुआ तो ईसाई कहलाने लग जाता है। परंतु यह सब तो शरीर की सीमाएं हैं, आत्मा तो सीमातीत अवस्था है।
ऐसे ही प्रभु महावीर फरमाते हैं एगा मनुस्सा जाई मनुष्य जाति एक है। ऐगे आया गुण दृष्टि से आत्मा भी एक है। बिंदु हो या सिंधु मात्रा का अंतर हो सकता है परंतु क्वालिटी तो एक ही है। प्रभु महावीर से जब प्रश्न किया- भंते! धर्म क्या है तो प्रभु महावीर ने फरमाया वत्थुं सुहाव धम्मो वस्तु का स्वभाव ही धर्म है। जैसे जल का स्वभाव- शीतलता, अग्नि का स्वभाव ऊषणता है, वैसे ही आत्मा का स्वभाव है- ज्ञान, दर्शन में रमण करना। सत-चित्त-आनंद मग्न रहना ।
गुरुदेव ने कहा धर्म लडऩा नहीं प्रेम करना सिखाता है। धर्म तोडऩा नहीं, जोडऩा सिखाता है। धर्म वो द्वार है जिसे भव (संसार) रूपी अटवी (जंगल) को पार किया जा सकता है। आचार्य हरिभद्र सूरी कहते हैं आप दिगंबर बनें या श्वेताम्बर बनें, तत्ववादी बनें या तर्क वादी परंतु मुक्ति तो तभी प्राप्त होगी जब आप कषायों से मुक्त होंगे। आचार्य शंकर भी यही बात कह रहे हैं मोक्ष तो तभी प्राप्त होगा जब आप अविद्या से मुक्त होंगे। तो बस हम प्रयास करें कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) एवं अविद्या (अज्ञान, मिथ्यात्व प्रमाद आदि) से मुक्त होने का फिर मोक्ष रूपी मंजिल दूर न रहेगी।