चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत आज आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव डॉ. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में कहा कि गुरु जीवन का वह आलोक स्तंभ है, जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर साधना के मार्ग को प्रकाशित करता है। उन्होंने कहा कि गुरु के मार्गदर्शन के बिना साधना अधूरी रह जाती है, क्योंकि गुरु ही वह सेतु है जो आत्मा को सत्य और शांति के तट तक पहुँचाता है।
मुनि श्री ने अपने प्रवचन में आगे कहा कि गुरु का सान्निध्य आत्मिक विकास की परम आवश्यकता है। गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, वे जीवन को अनुशासन, मर्यादा और उद्देश्य की दिशा भी प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति अपने जीवन में गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण रखता है, वही सच्चे अर्थों में आत्म–साधना की पूर्णता को प्राप्त करता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में जब भी भ्रम या द्वंद्व की स्थिति आए, तब गुरु के उपदेशों को स्मरण करना चाहिए, क्योंकि वही सत्य का मार्ग दिखाते हैं और भक्ति को स्थिरता प्रदान करते हैं।
सभा के अंत में सभी ने मुनि श्री के चरणों में वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
”कार्यक्रम के दौरान मधुर वक्ता रूपेश मुनि जी म.सा. ने अपने सुरम्य स्वर में भक्ति रस से ओतप्रोत भजनों की मनमोहक प्रस्तुति दी, जिनसे सम्पूर्ण वातावरण आध्यात्मिक आनंद और पवित्र भावनाओं से भर उठा। उनके भजनों की मधुर लहरियों ने श्रद्धालुओं के हृदयों में भक्ति, शांति और समर्पण की भावनाएँ जागृत कर दीं।
इसके उपरांत उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी म.सा. ने मंगल पाठ प्रदान कर सभी को आशीर्वाद स्वरूप शुभकामनाएँ दीं। उनके प्रेरक वचनों ने उपस्थित जनों को धर्ममार्ग पर अडिग रहने तथा जीवन में करुणा, संयम और सादगी को अपनाने की प्रेरणा दी।पूरे कार्यक्रम का सुसंगत और प्रभावी संचालन श्री राजेश मेहता द्वारा किया गया। उनके संतुलित संचालन ने आयोजन की गरिमा को और भी बढ़ा दिया।
अंत में मुनि श्री ने सभी को आत्मिक शांति, विवेक और सदाचार के मार्ग पर अग्रसर रहने का संदेश देते हुए कहा –“गुरु के सान्निध्य में बीता एक क्षण भी जीवन को धन्य बना देता है।