साहुकारपेट

लक्ष्मी भी न्यायवंत मानव के पास स्वत: चली आती है: संयमरत्न विजयज

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजयज ने कहा नदी का प्रवाह जिस तरह बिना किसी उपाय के नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी न्यायवंत मानव के पास स्वत: चली आती है। जिस प्रकार संबंधीजन प्रीति से, तालाब कमलों से, सेना वेगवान घोड़ों से, नृत्य सुरताल से, घोड़े वेग से, सभा विद्वानों से, मुनि शास्त्रों से, शिष्य विनय से और कुल पुत्रों से सुशोभित होता है, वैसे ही राजा न्याय से शोभायमान होता है। इंद्रधनुष के समान चपल कांति वाले प्राण भले चले जाएं, चंचल संपदाएं, पानी के बुलबुले की तरह पिता, पुत्र, मित्र, स्त्री आदि के संबंध भी हमसे दूर हो जाएं, नदी के वेग के समान चंचल शरीर की जवानी एवं गुण भी चले जाएं, लेकिन हमारी कीर्ति फैलाने वाले नीति-न्याय का संग कभी छूटना नहीं चाहिए। नीति कीर्ति रूपी स्त्री को रहने के लिए घर है, प्रसिद्धि पाने वाली है, पुण्य रूपी राजा की प्रिय रानी ह...

संसार के समस्त कार्यो को छोडक़र परमात्मा की भक्ति करना सौभाग्यशाली लोगों का काम: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने मंगलवार को कहा कि संसार के समस्त कार्यो को छोडक़र परमात्मा की भक्ति में लगने वाले लोग सौभाग्यशाली होते है। जैनों के लिए नवकार मंत्र 68 तीर्थ का लाभ देने के बराबर होता है। भक्ति के साथ अगर नवकार मंत्र का स्मरण किया जाए तो कहीं जाने की जरुरत नहीं है, बल्कि इससे ही 68 तीर्थ का लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं। उन्होंने कहा कि पंच परमेष्टि की भक्ति स्तुति और इसकी प्रार्थना जब भी करने का मौका मिले तो मन और दिल को उसी में जोडक़र परमात्मा की दिव्य भक्ति का लाभ जीवन में ले लेना चाहिए। ऐसी उत्तम अनन्य भक्ति कर जीवन को परमात्मा की वाणी से जोडऩे का अवसर भाग्यशाली आत्माओं को ही प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि भोजन करने से पहले घर से निकलने से पहले नवकार मंत्र का जाप करना चाहिए। इसका स्मरण किए बिना किसी भी कार्य की शुरुआत ही नहीं करनी चाहिए। यदी मनुष्य अ...

जीवन में जो घटनाएं घटती हैं वे मनुष्य का नसीब हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से पहले की कुछ घटनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कुछ महापुरुष ऐसे होते है जिनके नाम से तिथि चलती है उन्हीं महान लोगों में भगवान श्रीकृष्ण भी थे। इस जीवन में जो घटनाएं घटती हैं वे मनुष्य के स्वयं के नसीब से होती हैं। उसी प्रकार कृष्ण के जन्म के समय हुआ था। समय आने पर कृष्ण ने अत्यचारों का खात्मा कर उनका अवसान किया। उनके आदर्श जीवन में उतारना चाहिए। ऐसे महापुरुषों के जन्मदिन पर हमें उनके जीवन से सद्प्रेरणा लेनी चाहिए। धर्म शासन को पाकर जो परमात्मा की वाणी समझते हंै उनका जीवन सुधर जाता है। सागरमुनि ने कहा आचरण व्यक्ति को ऊंचाई पर ले जाता है। पाप करने से आत्मा नरक की ओर बढ़ती है। यह केवल लोभ की वजह से होता है। लोभ कर मनुष्य स्वयं ही नरक का मार्ग बनाता है लेकिन अच्छे कर्म कर अच्छा भव पा सकता है। धर्मसभ...

धर्म उमंग से होता है उम्र से नहीं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा धर्म ही मनुष्य को प्राण से प्यारा होना चाहिए, क्योंकि वही नैया पार लगाएगा। यह जीवन चार दिन का है इसके रहते ही आगामी जीवन सफल और सार्थक बना लेना चाहिए। जिनमें धर्म के प्रति लगाव होता है वे उम्र नहीं देखते क्योंकि धर्म उम्र से नहीं उमंग से होता है। उमंग नहीं है तो कम उम्र के लोग भी धर्म नहीं कर सकते। जब मनुष्य का प्रबल पुण्य होता है तो ही उसे ऐसे मौके मिलते हैं। बहुत  भाग्यशाली लोग ही परमात्मा की वाणी सुन पाते  हैं । ऐसे उत्तम धर्म को पाकर उसका लाभ उठा लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म के प्रकाश से जीवन को एक सुंदर मार्ग दिया जा सकता है। इस पर चल कर प्रत्येक मनुष्य अपनी मंजिल पाकर सफल हो सकते हैं। ऐसे जिन शासन में जन्म और गुरुओं का समागम मिलना पुण्य की बात है। उमंग होने पर वृद्ध व्यक्ति भी आराम से धर्म के मार्ग पर चल सकते हैं। मनुष्य अ...

पूजा करने से उपसर्ग-कष्ट नष्ट हो जाते हैं: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहाबइष्ट की पूजा करने से उपसर्ग-कष्ट नष्ट हो जाते हैं, विघ्नों की बेल छिन्न-भिन्न हो जाती है और प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। प्रसन्न चित्त से की गई पूजा ही अखंड होती है। सूर्य जैसे प्रकाश पुंज को नहीं छोड़ता, वैसे ही स्नेह उसे नहीं छोड़ता, जो वीतराग परमात्मा की पूजा करता है। चांदनी जैसे चंद्रमा के संग रहती है, वैसे ही कल्याण रूपी लक्ष्मी उसके साथ रहती है, राजा के पीछे जैसे सेना वैसे ही सौभाग्य उसके समीप आता है और युवा पुरुष को जैसे स्त्री, वैसे ही स्वर्ग और मोक्ष रूपी लक्ष्मी उसे चाहती है। जिनेश्वर देव की पूजा करने वालों की पुण्यवान लोग स्तुति करते हैं। राजाओं के समूह उसके समक्ष हाथ जोड़ खड़े रहते है। अपार प्रसिद्धि वह प्राप्त करता है। साथ ही चित्त की पीड़ा को हरने वाली उसकी कीर्ति सर्वत्र फैलने लगती है, कुल की शोभा बढ़ाने ...

जो स्वयं भी पार होते हैं और दूसरों को भी पार उतारते हैं: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा जो स्वयं भी पार होते हैं और दूसरों को भी पार उतारते हैं। जिसकी परमात्मा को पाने एवं स्वर्ग व मोक्ष नगर के मार्ग की ओर जाने की इच्छा हो तथा पुण्य-पाप के अंतर को जानना हो तो समाधि के भंडार सद्गुरु की सेवा करना चाहिए। लोकमान्य संत, वरिष्ठ प्रवर्तक रूपचंद को भावांजलि देते हुए मुनिद्वय ने काव्य पाठ किया। दीपक के समान ज्ञान के प्रकाश से दे दीप्यमान तथा प्रकट प्रभावी गुरु को जो नहीं मानता, वह मानो पानी का मंथन करके मक्खन पाने की आशा रखता है, जो व्यर्थ है। जो विश्वास करने योग्य हो, मोक्षसुख देने में साक्षीभूत हो, नरक गति के मार्ग को रोकने में समर्थ हो तथा जो धर्म-अधर्म, हित-अहित ,सत्य-असत्य का भेद दिखाने वाले हों, ऐसे छिद्र रहित नाव के समान उत्तम गुरु की सदा सेवा करनी चाहिए।

जो दया करते हैं वे अपने जीवन को सुखी बना लेते हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा परमात्मा ने जीवन को सुखी करने के लिए ही दया का उपदेश दिया है और जो दया करते हैं वे अपने जीवन को सुखी बना लेते हैं। जीवों के प्रति दया भाव रखने वालों को बिना मांगे ही बहुत कुछ मिल जाता है। साधारण से किया गया दान भी जीवन को परम आनंदित कर सकता है। जब भी ऐसा मौका मिले तो आगे आकर दया भाव रखते हुए दान करना चाहिए। दान कभी भी नाम कमाने के उद्देश्य से नहीं करना चाहिए। दान देकर उसे भूल जाना चाहिए। नाम कमाने के लिए किया हुआ दान व्यर्थ हो जाता है। जो मनुष्य दानशील में अपना जीवन लगा देते हैं वे खुद को बदल लेते हैं। भविष्य का निर्माण वर्तमान में ही होता है। मनुष्य वर्तमान में दान कर अपने भविष्य को बेहतर कर सकता है। वर्तमान में दया भाव रखने वालों का निसंदेह भविष्य अच्छा होगा। समय आने पर अगर जीवन में अनुकूलता है तो दूसरों का भला जरुर करना चाहिए। वर...

जितना हो सके भलाई करो बुरा किसी का नहीं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने मंगलवार को कहा कि मनुष्य को जितना हो सके भलाई के कार्य करने चाहिए। अगर किसी की भलाई नहीं कर सकते तो बुराई भी नहीं करनी चाहिए। जीवन को सफल बनाने के लिए हमेशा अच्छाई के ही विचार रखने चाहिए। जितना संभव हो सके मनुष्य को भलाई और उपकार के कार्य करने चाहिए। उन्होंंने कहा यदि हम किसी का बुरा करते हैं तो अपनी आत्मा का बुरा भी हो जाता है। जब तक अच्छाई का गुण जीवन में नहीं आएगा तब तक हम धार्मिक नहीं बन सकते। जानते हुए भी अगर मनुष्य किसी की धरोहर लेने की कोशिश करता है तो यह पाप होता है। जीवन को धर्म के कार्यों से जोड़ते रहना चाहिए। सागरमुनि ने कहा मनुष्य को चारित्र और तप इसी भव में मिलता है, इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। ज्ञान की आराधना के साथ चारित्र की आराधना भी करनी चाहिए क्योंकि मनुष्य भव में ही चारित्र का आराधना करना संभव है। यह जीवन एक बार गया त...

माता-पिता की भक्ति से बढ़ती है कीर्ति: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय, भुवनरत्न विजय ने कहा जो मानव माता-पिता के हितकारी चरणों की पूजा करता है, उसकी यश-कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगती है। उसे तीर्थों की यात्रा का फल मिल जाता है, वह सज्जनों के हृदय को आनंदित करता है, उससे पाप का विस्तार दूर हो जाता है, कल्याण की परंपरा को प्राप्त करके वह अपने कुल में धर्म-ध्वजा को लहराता है। पवित्रता व पुण्यता के पुंज समान माता-पिता की जहां भक्ति होती है,वहां पर जैसे समुद्र के प्रति नदियां स्वत: आकर्षित हो चली आती हैं, वैसे ही उसके पास लक्ष्मी स्वत: चली आती है। जैसे हरे-भरे वृक्ष की ओर पक्षी खुद चले आते हैं, वैसे ही सुख सुविधाएं स्वत: चली आती है और पानी में जैसे कमलों की श्रेणियां फैलने लगती है, वैसे ही पितृ-भक्त का मान-सन्मान बढऩे लगता है। माता-पिता के मनोहर चरणों की पूजा करने से जैसी शुद्धि हमारे भीतर होती है,...

नमन से होता जीवन का नवसृजन: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय के सान्निध्य में सोमवार को रैली निकाली गई। रैली मुनि संयमरत्न विजय के वर्धमान तप की 37वीं ओली  एवं नवकार आराधना, मासखमण सिद्धितप, भक्तामर तप आदि विभिन्न तपस्याओं की अनुमोदनार्थ निकाली गई जो राजेंद्र भवन आकर धर्मसभा में परिवर्तित हुई। इस मौके पर मुनि संयमरत्न विजय ने कहा नवकार में आया हुआ ‘क’ कहता है कि कषाय चार होते हैं जो इन चार कषायों में से एक कषाय को जान लेता है, वह समस्त कषायों को जानकर कषायमुक्त होने का प्रयास करता है। जो एक मंत्र की साधना कर लेता है, उसे सिद्धि शीघ्रता से मिल जाती है। जो एक को जान लेता है, वह सब को जान लेता है और जो सबको जानने में लगा रहता है, वह भटक जाता है। जीवन जीने की एक धारा हो तो लक्ष्य की प्राप्ति सरलता से हो जाती है। नवकार प्रत्येक प्राणी को अहं से अर्हं की ओर ले जाने में बहुत सहाय...

जो हमारा है वह कभी खोएगा नहीं और जो नहीं है वह रुकेगा नहीं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा परमात्मा ने मनुष्य को जीवन का स्वरूप समझाया है। ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि जो हमारा है वह कभी खोएगा नहीं और जो नहीं है वह रुकेगा नहीं। इस बात का मनुष्य को अगर अंतरात्मा से ज्ञान हो जाए तो तकलीफ नहीं होगी। इसके लिए गहन चिंतन कर आत्मा की निर्जरा करनी चाहिए क्योंकि सब कुछ मरेगा लेकिन आत्मा कभी नहीं मरेगी बल्कि शरीर बदल लेगी। हमारा शरीर अनित्य है और बाहरी सजावट से सुशोभित है लेकिन मनुष्य को यह ज्ञान होना बहुत ही जरूरी है कि शरीर में कुछ भी डालो रुकेगा नहीं, क्योंकि बाहर की वस्तुएं खुद की नहीं हो सकती।  उन्होंने कहा कि मनुष्य को बाहरी चिंता करने के बजाय आत्मा की चिंता करनी चाहिए। जिस कार्य के करने से आत्मा को पोषण मिले वहीं धर्म क्रिया करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य जो भी करे उसे लगन और भावना से करे क्योंकि भावना और लगन से किया हुआ ...

रक्षाबंधन प्रेम का प्रतीक : विनयमुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक विनयमुनि ने रक्षाबंधन के अवसर पर कहा रक्षाबंधन प्रेम का प्रतीक है, जिसका अपना अलग ही महत्व है। इस पर्व से भाई बहनों में एक उत्साह सी होती है। इस दिन खुद में बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से इस पर्व का महत्व और भी बढ़ जाएगा। छगनलाल की 130वीं जन्म जयंती पर मुनि ने कहा सदगुरुओं ने अपने ज्ञान से ही लोगों की अज्ञानता को दूर किया है। इस प्रकार से हम पर उन महापुरुषों का बहुत ही बड़ा उपकार है और उनके इस उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए। उनके द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण कर ज्ञान के महत्व को समझ कर अज्ञानता से दूर होना चाहिए। सागरमुनि ने कहा जगत के सभी जीवों की रक्षा के लिए रक्षाबंधन को बहन अपनी रक्षा के लिए भाई के कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है। इस सूत्र को हाथों तक नहीं बल्कि आत्मा में लाकर चारित्र करना चाहिए। मनुष्य के जीवन में पर्व उन्हें ऊचा ...

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