साहुकारपेट

गलतियों को सुधारने का मौका देता है पर्यूषण पर्व: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा कि जो नींद लेते हैं वे आत्मगुण खोते हैं लेकिन जो जागते हैं वे आगे जाते हैं। पर्यूषण पर्व मनुष्य को उसकी गलतियों को सुधारने का मौका देता है। ऐसे मौके का लाभ उठा कर जीवन को मंगलमय बना लेना चाहिए। जो गुरु के चरणों में आते हैं परमात्मा बन जाते हैं। इसके लिए सबसे पहले खुद के अंदर विनय और समर्पण की भावना आनी चाहिए क्योंकि विनय के बिना गुरु का मिलन संभव नहीं है। संसार में आकर मनुष्य पैसे और परिवार के पीछे तो भाग कर पतन पाया लेकिन अब परमात्मा की ओर बढ़ कर उत्थान करने का प्रयास करना चाहिए।  इससे पहले उपप्रवर्तक विनयमुनि ने अंतगढ़ सूत्र पढ़ा। इस मौके पर संघ के अध्यक्ष आंनदमल छल्लाणी व अन्य लोग उपस्थित थे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया। इसी बीच शुभचन्द्र , जिनका देवलोकगमन हो गया, को श्रद्धांजलि दी गई। पर्यूषण पर्व नींद से उठने और आगे ज...

मन की शुद्धि किए बिना धर्म करने वाला प्राणी भी मोक्ष नहीं जा सकता: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय के सान्निध्य में प्रभु महावीर का जन्मोत्सव मनाया गया। अपने हाथों में कांच पकड़ कर फिरता हुआ नेत्रहीन प्राणी जिस प्रकार अपना चेहरा नहीं देख सकता, वैसे ही मन की शुद्धि किए बिना धर्म करने वाला प्राणी भी मोक्ष नहीं जा सकता। मुक्ति रूपी स्त्री को वश में करने के लिए दूती के समान ऐसे मन की शुद्धि धारण करने की इच्छा यदि हमारे मन में हो तो कंचन-कामिनी (स्त्री) की ओर जाते हुए अपने मन-हृदय का रक्षण करना चाहिए, क्योंकि जिस तरह पत्थर की शिला पर कमल नहीं उगते वैसे ही लोभ व लाभ के चक्कर में पड़ेे जीव को आत्मधन की प्राप्ति नहीं होती। मन की शुद्धि होने पर ही जन-जन के मन में वर्धमान महावीर बसते हैं। यदि हमारी वाणी विकार रहित हो, नेत्र समता युक्त हो, पवित्र मुख पर उत्तम ध्यान की मुद्रा हो, गति मंद-मंद प्रचार वाली हो, क्रोध आदि का निरोध हो तथा वन म...

धर्म के मार्ग पर किसी को रुकावट नहीं बनना चाहिए: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन सोमवार को कहा धर्म के मार्ग पर किसी को रुकावट नहीं बनना चाहिए। भगवान कृष्ण ने धर्म के क्षेत्र में लोगों को संबल दिया था। वेे अपने माता पिता के चरणों को ही चारों तीर्थ मानते थे। माता पिता जिनके घर में है समझो चारों धाम उनके पास है। ऐसे में लोगों को तीर्थ धाम जाने की जरूरत ही नहीं है। श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता पिता की जिस भावना से सेवा की उसी भाव से सभी को अपने माता पिता की सेवा कर अध्यात्म की ओर बढऩा चाहिए। मां बाप की सुंदर सेवा करने वाले ही मोक्ष की मंजिल पाते हैं। अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलना चाहिए। परमात्मा का दिव्य जिनशासन संसार के प्रत्येक आत्मा को शांति और आनंद प्रदान करता है। पर्यूषण पर्व के दिवस का एक एक दिन निकल रहा है। इस दिन में अगर मनुष्य तप, ध्यान और धर्म कर ले तो दिन सार्थक बन सकता है। जीवन...

सज्जन पुरुषों का संग कीर्ति का मूल बोता है: मुनि संयमरत्न विजय

चैन्नई के साहुकारपेट स्थित श्री राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा  सज्जन पुरुषों का संग कीर्ति का मूल बोता है, पाप को नष्ट कर देता है, हर्ष उत्पन्न करता है, श्रम (थकान) को रोकता है, बुद्धि का वैभव उत्पन्न करता है, शत्रुओं का नाश करता है, कल्याण एकत्रित करता है, मनोहर बुद्धि देता है तथा भय को ढंकता है, इसी प्रकार सज्जनों की संगत कल्पवृक्ष की तरह हमेशा उत्तम फल देने वाली होती है।  पर्यूषण पर्व यानी आत्मशुद्धि का पर्व। पर्व हमें कुसंग से दूर रहकर हमेशा सत्संग करने की प्रेरणा देता है। जिस प्रकार राजा के ललाट पर लगा हुआ कीचड़ भी कस्तूरी के तरह प्रतिभाषित होता है, रानियों के आभूषणों में लगा हुआ कांच भी हीरे की उपमा को प्राप्त होता है और आम के वृक्ष पर बैठा हुआ कौआ भी कोयल की तरह दिखता है, तो इसके पीछे एक ही कारण है उत्तम स्थान संग। इसी तरह गुणहीन मानव भी उत्तम जीवों के संग से ग...

जीवन को अध्यात्म से जोडऩे पर आनंद का अनुभव होता है: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा जीवन को अध्यात्म से जोडऩे का लक्ष्य बनाने पर जो आनंद का अनुभव होता है। यह कहीं नहीं मिल सकता। समर्पण भावना से परमात्मा के चरणों में जाने वाला जीवन को ज्ञानी बना लेता है। जीवन को सफल बनाने के लिए परमात्मा के चरणों में समर्पित होना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा दया व्रत कर पर्यूषण पर्व का लाभ लेना चाहिए। परमात्मा की वाणी भाग्यशाली आत्मा को ही सुनने का मौका मिलता है। इसका लाभ लेने से पीछे कभी नहीं हटना चाहिए। अब तक दूसरों की बातें सुनी लेकिन अब परमात्मा की वाणी सुनकर जीवन को सजाने का अवसर आया है। प्रवचन सुनकर दूध में पड़ा हुआ बताशा जैसे घुल जाता है वैसे ही अपना जीवन बदल सकते हैं। सागरमुनि ने कहा आचरण आत्मा को परमात्मा बना देता है लेकिन सबसे पहले श्रमण कर ज्ञानप्रकाश प्राप्त करें। आचरण का लाभ तप के बाद ही मिल पाता है। बिना तपाराधना के कोई भी ...

त्योहार मनुष्य की इन्द्रियों, मन और शरीर को पुष्ट करते हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन कहा पर्यूषण आने से घर घर में आनंद छाता है। पर्व और त्योहार हमारे समाज के अंदर हमेशा से चलते आए हैं। त्योहार मनुष्य की इन्द्रियों, मन और शरीर को पुष्ट करते हैं जबकि पर्व मनुष्य के आत्मगुणों को। इससे आत्मा को बहुत बड़ा लाभ होता है। त्योहार पर लोग अच्छे कपड़ा पहनते हैं, लेकिन पर्व के दिनों में त्याग और तप करने की इच्छा होती है।  दिल को सद्गुणों से जोडऩे की इच्छा होती है। पर्यूषण पर्व पर लोगों को तप तपस्या कर अपना  जीवन सफल बनाने की ओर आगे बढऩा चाहिए। इस आठ दिन में अपनी आत्मा की निर्जरा कर लेनी चाहिए। इसका वास्तविक लाभ तब मिलेगा जब अपने द्वारा कोई भी भूल हुई हो तो उससे क्षमा याचना करलें। छोटा हो या बढ़ा, गलती के लिए क्षमा मांग लेनी चाहिए।   पर्यूषण में मनुष्य अपने आत्महित के लिए जो भी करना चाहे कर सकता है। सागरमुनि...

यात्रात्रिक यानी परमात्मा की भक्ति: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने पर्यूषण के दूसरे दिन वार्षिक 11 कर्तव्य समझाते हुए कहा जो कर्तव्य पथ पर चलता हुआ ठोकरें नहीं गिनता, वह एक दिन ठाकुर बन जाता है।  स्वरूप अ_ाई महोत्सव करना। नगर के समस्त जन धर्म से प्रभावित हो ऐसी रथयात्रा निकालना, आत्मशुद्धि के साथ सिद्धिकरण हो, स्नात्र महोत्सव यानी विधि-अर्थ-भावपूर्वक प्रभु की पूजा-भक्ति करना, देवद्रव्य वृद्धि अर्थात नीतिपूर्वक कमाई हुई लक्ष्मी का सदुपयोग प्रभु-भक्ति में करना। अष्ट कर्म के आवरण का अनावरण करने के लिए इस पर्व का आगमन होता है। ईहलोक व परलोक कल्याणकारक, कर्म के मर्म को समझाकर निर्मल आत्मधर्म की ओर ले जाने वाला यह पवित्र पर्व है। संघपूजा यानी संघ की पूजा तीर्थंकरों की पूजा के समान है। साधर्मिक भक्ति अर्थात श्री संभवनाथ परमात्मा ने पूर्व के तृतीय भव में साधर्मिक भक्ति करके तीर्थंकर पद को प्राप्त कर...

व्रत रूपी आभूषण से विभूषित होने का अवसर ही पर्यूषण: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में  मुनि संयमरत्न विजय ने व्रत रूपी आभूषण से विभूषित होने का अवसर ही पर्यूषण है। यह पर्व हमें अपने कर्तव्य पथ पर चलने का संदेश देता है। मानव भव ही एक ऐसा भव है, जिसमें मानव कुछ कर सकता है, बाकी नरक, तिर्यंच व देव गति में तो टाइम पास के अलावा कुछ नहीं। पर्यूषण पर्व के पहले दिन कहा जो हमारे आत्म प्रदूषण, कषाय दूषण व कर्मों की उष्णता दूर कर दे, वास्तव में वही पर्यूषण है। अध्यात्म के महल में चढऩे की प्रथम सीढ़ी है-‘अमारि प्रवर्तन’ अर्थात् अहिंसा का पालन करना और करवाना। नीचे देखकर चलने से जीव जंतुओं की रक्षा होती है, ठोकर नहीं लगती और पढ़ी वस्तु भी मिल जाती है। दया धर्म का पालन करने से हमारा हृदय कोमल होता है, परिणाम स्वरूप हृदय रूपी धरती पर हम साधार्मिक भक्ति, क्षमापना, त्याग, तपश्चर्या आदि के बीज बो सकते हैं। धर्म का मूल ही दया है और बिना मूल के तो ...

पर्यूषण पर्व जन जन को जाग्रत करने के लिए: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के पहले दिन कहा पर्यूषण पर्व जन जन को जाग्रत करने के लिए आता है। इसका लाभ लेकर जीवन को सफल बनाएं। इसका लाभ लेने से चूकना नहीं चाहिए। पर्यूषण के आठ दिनों में मनुष्य अपने आत्मा के हित के लिए जो भी करना चाहे वे कर सकता है। जीवन की खाली झोली को त्याग नियम से भर लेना चाहिए। सुज्ञान की ज्योति से मनुष्य को अपने अज्ञान के अंधेरे को दूर करना चाहिए। अपनी दिव्य धर्म भावनाओं के साथ पर्यूषण का लोगों को लाभ लेना चाहिए। जब भी ऐसा दिव्य प्रसंग भाग्यशाली आत्मा को प्राप्त होता है तो वह इसका लाभ लेकर जीवन को धन्य बना लेती है। परमात्मा के प्रति लोगों को भक्ति दिखानी चाहिए। जब तक संतों का प्रवचन चलता हो उठने के बजाय ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्रवचन में दिया हुआ समय जीवन को बदल सकता हैं। लेकिन उससे पहले उसे भाव पूर्वक जीवन में उतारने की जरूरत है...

बुद्धि की समृद्धि दूर कर देती है चुगली

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में  विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा यदि हम पापों को नष्ट व शत्रु को परास्त करना चाहते हैं, क्लेश को लेशमात्र भी रखना नहीं चाहते, सर्व अपराधों व अपकीर्ति से दूर होना चाहते हैं तथा अगले भव में लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते हैं तो अपने मन में चुगली को मत आने दो। जैसे अग्नि में कमल, सर्प की जिह्वा में अमृत, पश्चिम दिशा में सूर्य का उदय, आकाश में फसल, पवन में स्थिरता तथा मारवाड़ में कल्पवृक्ष नहीं होता, वैसे ही दुर्जनता में चंद्र जैसे उज्ज्वल यश की प्राप्ति नहीं होती। जो मानव चुगली करता हुआ सौभाग्य चाहता है, वह मानो बिना परिश्रम के संपदा, कलह करता हुआ कीर्ति, प्राणियों के प्राण लेकर पुण्य, लज्जा रखकर नृत्य करना, अभक्ष्य भोजन करके निरोगता व निद्रा लेता हुआ विद्या प्राप्त करना चाहता है जो असंभव है। चुगली करने वाला धर्म की गली को तोड़ देता है, बुद्धि की समृद्धि दूर क...

समय के साथ जीवन को सार्थक बनाने वाले सफल होते हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा समय के साथ जीवन को सार्थक बनाने वाले सफल हो जाते हैं। ऐसा नहीं करने वालों के हाथ में निराशा ही लगती हैं। जिनका भाग्य अच्छा होता है उनको गुरु का इशारा ही बदल देता है। देव गुरु की भक्ति जब भी पाने का मौका मिले तो दिल से स्वीकार कर आनंद पूर्वक करना चाहिए। दिव्य जिनशासन प्रत्येक आत्माओं को दिव्यता प्रदान करता है। देव गुरु का सानिध्य मिलने पर अनन्य भक्ति आस्था के साथ अपने अमुल्य जीवन को सार्थक बनाना चाहिए। उन्होंने कहा इस भव को बेहतर करने के लिए धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए। मन में जिज्ञासा होने पर मनुष्य दिल से धर्म को अपनाता है। यह कार्य मनुष्य के जीवन को बदल देता है। परमात्मा की वाणी का श्रवण सिर्फ भाग्यशाली ही कर पाते हैं। इसका लाभ उठाने वालों का जीवन बदल जाता है। सागरमुनि ने कहा हमारी संस्कृति में कुछ ही ऐसे पर्व है जिनका जैसा नाम होत...

तरुणसागर के कड़वे वचनों से मिली जैन समाज को नई पहचान

श्री सकल जैन समाज और श्री खण्डेलवाल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में बुधवार को शहर में विराजित सर्व जैन सम्प्रदायों के आचार्यों, उपाध्याय प्रवर, प्रवर्तक, उपप्रर्वतक और साध्वियों की निश्रा में साहुकारपेट स्थित श्री प्रवीणभाई मफतलाल मेहता गुजराती जैनवाड़ी में राष्ट्रसंत तरुणसागर के देवलोकगमन के उपलक्ष्य में गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ। इससे पहले पुष्पदंतसागर की प्रेरणा से कोण्डितोप स्थित सुंदेशा मूथा जैन भवन से कलश रथयात्रा निकाली गई जो गुजराती जैनवाड़ी पहुंची। गुणानुवाद सभा में तरुणसागर के गुरु आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा दुनिया ने तो एक संत खोया है लेकिन मैंने तो अपना बेटा खो दिया। तरुणसागर दिल पर राज करना चाहते थे लोगों को जगाना चाहते थे यह उनका विचार था। वे हमेशा इसी के लिए जीए। उनका अभाव कोई भी पूरा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा उनकी यही प्रार्थना है कि तरुणसागर जैसा ही शिष्य सभी को मिले। ...

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