चेन्नई. जगत की समस्त शक्तियां उसके पैरों में व समस्त ऋद्धि-सिद्धियां उसके हाथों में आ जाती है, जो संयम का पालन करता है। साहुकारपेट के राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि शील, ब्रह्मचर्य, सदाचार के पालन से ही मनुष्य को देवलोक की संपदाएं व यश कीर्ति प्राप्त होती है। जगत पर विजय प्राप्त करने वाला शील-संयम रूपी मंत्र को जो हृदय में धारण कर लेता है फिर उसे हाथी, सिंह, सर्प, समुद्र, रोग, चोर, बंधन, युद्ध व अग्नि का भय नहीं रहता। जो प्राणी शील रूपी आभूषण को स्व-अंगों पर धारण करता है, उसका यशगान देवांगनाएं अपने मुख से गाते नहीं थकती और उसकी चरणरज को देवता मुकुट की माला की तरह नहीं त्यागते तथा उसके नाम को योगी पुरुष सिद्ध के ध्यान की तरह हृदय में धारण करते हैं। सद्विचार से सदाचार स्थिर रहता है, कुविचार के परिणामस्वरूप मानव अनाचार की ओर बढ़ जाता...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा यह मानव जीवन धर्म, तप कर जीवन को सफल बनाने के लिए मिला है। तप की आराधना कर इस मौके का लाभ उठाने वाले मनुष्य का जीवन सार्थक बन जाएगा। सत्संग से मनुष्य का जीवन धर्म ज्ञान से जुड़ता है। सौभाग्यशाली मनुष्य ही अपना काम छोड़ कर प्रवचन सुनने के लिए आते हंै और जीवन में ज्ञान का आलोक उत्पन्न करते हैं। उन्होंने कहा गुरु भगवंतों की वाणी से जीवन में नई प्रेरणा मिलती है। गुरु के चरणों में जाने से मनुष्य के मन का अंधकार दूर हो जाता है। जीवन को सार्थक बनाना है तो धर्म के कार्य में ध्यान केंद्रित करें। अपने जीवन को ऐसा बनाएं कि लोग आपसे प्रेरणा लें। उन्होंने कहा संतों का सान्निध्य मिला है तो हमें उनके चरणों में खुद को समर्पित कर देना चाहिए। विकार से विकास की ओर यात्रा करने के लिए धर्म बहुत ही जरूरी होता है। सागरमुनि ने कहा बिना समझ के किया ...
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न ने ‘कस्तूरी प्रकरण’ के बारे में बताया कि पुत्र का जन्म होने, महादेवी द्वारा सिद्धि प्राप्त होने, राज्य पद मिलने, अखूट लक्ष्मी प्राप्त होने, स्वर्ण सिद्धि होने व अत्यंत निकटतम संबंधियों के मिलने पर जितनी खुशी मानव को होती है, उतनी ही खुशी दानवीर पुरुष को याचक द्वारा कहे गए ‘देही'(मुझे दो) शब्द के सुनने मात्र से हो जाती है। काव्यकुशल व्यक्ति कविता बनाने में खुश रहता है, गीतकार गीत गाने में, कथारसिक को कथा करने में, विचारवान प्राणी चिंतन करने में खुश रहता है लेकिन इन सबमें सर्वश्रेष्ठ दान है जो एक ही समय में तीनों जगत को खुश कर देता है। देने वाला नदी की तरह मीठा, लेने वाला सागर की तरह खारा व मात्र इक_ा करने वाला नाले की तरह गंदा हो जाता है, अत: नदी की तरह देते रहेंगे तो हमेशा मीठे बने रहेंगे। कर्ण ने स्वर्ण और ...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा मनुष्य जितनी सावधानी से प्रवचन सुनेगा उसे उतना ही लाभ मिलेगा। परमात्मा की दृष्टि वाणी सभी के जीवन में आलोक भर देती है। ध्यान केंद्रीय करके प्रवचन सुनने से धर्म और पाप के मार्गों का अंतर पता चलता है। दोनों के अंतर को समझने के बाद व्यक्ति पापों से मुक्त हो सकता है। ऐसा तभी संभव होगा जब लोग समय निकाल कर प्रवचन में आकर परमात्मा की वाणी सुनें। मनुष्य को प्रवचन सुनने से वंचित नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक शब्द भी जीवन में बदलाव कर सकता है। गटर के पानी का स्वच्छ होना बहुत ही कठित होता है लेकिन वहीं पानी अगर गंगाजल में मिल जाता है तो शुद्ध हो जाता है। उसी प्रकार जीवन को सफल बनाना है तो सज्जनों की संगति रखें। जैसी संगति होगी वैसा ही जीवन का विस्तार होता चला जाएगा। मनुष्य ने जीवन में दिखावा बहुत कर लिया अब भावित होकर धर्म, तप करना चाहिए...
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय ने कहा शुद्ध बुद्धि ही सिद्धि दिलाती है। साधनों में मस्त रहने वाला साधना से दूर हो जाता है। मोक्ष-सुख को प्राप्त करने के लिए प्राणी को दान आदि पुण्य के कार्य, कषायों पर विजय, माता-पिता, गुरु व परमात्मा की पूजा, विनय, न्याय, चुगली का त्याग, उत्तम पुरुषों की संगत, हृदय की शुद्धता, सप्त व्यसनों का त्याग, इंद्रियों का दमन, दया आदि धर्म, गुण, वैराग्य तथा चतुराई को धारण करना चाहिए। जो बुद्धिशाली मानव सुपात्रदान करता है, उसकी कीर्ति, पवित्रता, सुख व चतुरता में निरंतर अभिवृद्धि होती रहती है। शील-सदाचार का पालन करने वाले, कठिन तप करने वाले, शुभ भाव धारण करने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन प्रचुर मात्रा में दान देने वाले तो विरले ही होते हैं, जो यदा-कदा ही हमें दिखाई देते हैं। विवेकी मनुष्य अपने धन को परोपकार में लगाकर परलोक सुधारते हैं...
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा कि युवतियों के कटाक्ष रूपी बाणों से भेदे जाने वाले काम में आसक्त पुरुष व धन के लोभ में आकुल-व्याकुल हुए प्राणी तो हजारों देखने को मिलेंगे, लेकिन काम और धन की प्राप्ति में मूलभूत कारण धर्म ही है, ऐसा जानकर जो मानव हमेशा धर्म करता रहता है, ऐसे प्राणी तो जगत में विरले ही होते हैं। धूल के ढेर में जैसे मणि मिलना, भयंकर प्राणियों से भरे जंगल में जैसे नगर मिलना, वृक्ष रहित मारवाड़ प्रदेश में वृक्ष की घनी छाया मिलना और मूर्खता रूपी पुष्पों को उत्पन्न करने के लिए गांव रूपी बगीचे में जैसे विद्वानों की सभा मिलना दुर्लभ है, वैसे ही क्लेश के आवेश से भरे इस संसार में शुद्ध बुद्धि का मिलना बड़ा ही दुर्लभ है। हमारी जिस क्रिया से अन्य लोग भी प्रभावित हो, वही वास्तविक प्रभावना है। समान रूप से व सम्मानपूर्वक बैठकर दिया जाने वाला दान...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा मनुष्य को संतों का सानिध्य बहुत ही कठिनाई से प्राप्त होता है। ऐसा मौका अगर मिला है तो पूरे दिल से इसका लाभ उठाना चाहिए। गुरु भगवंतों की वाणी को अगर मनुष्य अपने आचरण में उतारता है तो उसका जीवन कल्याण की ओर बढ़ता है। जब भी यह अवसर मिले तो समय निकाल का इसका लाभ लेना ही चाहिए। जीव वाणी हमारे जीवन को प्रकाशित कर देता है। गुरु भगवंतों के सानिध्य में जाने वाला उत्तम पुरुष कहलाता है। परमात्मा की वाणी सुनने मात्र से जीवन को नया प्रकाश मिलता है। भाग्यशाली लोग ही गुरु भगवंतों के समीप जाकर प्रवचन का लाभ लेते हैं जो बेहतर बनाता है। परमात्मा की भक्ति के समय लोगों को मन में उल्लास रखनी चाहिए। ऐसा करने से जीवन में अनेक प्रकार की अनुभूति होती है। सागरमुनि ने कहा व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का लगातार प्रयास करते रहना चाहिए। प्रकाश ...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने सोमवार को कहा परमात्मा की भक्ति के समय लोगों को मन में उल्लास रखना चाहिए। ऐसा करने से जीवन में अनेक प्रकार की अनुभूति होती है। परमात्मा का प्रार्थना, स्तुति करते-करते लोगों को बहुत लाभ होता है इसलिए व्यक्ति को अपने अंतरात्मा की भावनाओं को परमात्मा के चरणों में लगाना चाहिए। भगवान की भक्ति करते समय जो अनुभूति होता है वह संसार के अन्य किसी कार्य में नहीं होता। प्रवचन सुनने का मौका ही मनुष्य के लिए बहुत बड़ी बात है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को कोई भी कार्य करते समय भाव अच्छे रखने चाहिए। जिस प्रकार दान में भाव नहीं हो तो दान करने का कोई मतलब नहीं निकलता, उसी प्रकार भक्ति करने में भी शुद्ध भाव होना चाहिए। मनुष्य को पापों की सजा कब मिल जाए पता नहीं होता, इसलिए धर्माचरण कर अपने पाप को खत्म करना चाहिए। धर्म से किया हुआ पुरुषार्थ जीवन में आ...
चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी को जीवन में लक्ष्य बना कर चलने को कहा। उन्होंने कहा जीवन को अच्छे मार्ग पर पहुंचाने के लिए रोज प्रवचन सुनने का लक्ष्य बनाना चाहिए। ऐसा करने पर मिला हुआ मानव जीवन सफल और सार्थक हो जाएगा। आगे बढऩे के लिए नियम बनाना बहुत ही जरूरी होता है। संतों का समागम हमें जीवन में बदलाव लाने का अवसर प्रदान करता है। इस लिए जीवन में बदलाव के लिए प्रतिदिन खुद प्रवचन में आने के साथ दूसरों को भी यही शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। ऐसा करने पर जीवन परिवर्तन संभव है। जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ करना बहुत ही जरुरी होता है, इससे मन हल्का होता है। जीवन के बोझ को हल्का करने वाला व्यक्ति ही ऊंचाई पर जा पाता है। साधना के मार्ग पर आकर व्यक्ति अपने मान, माया, क्रोध और लोभ को खत्म कर जीवन को सफल बना सकता है। सागरमुनि ने कहा गुरु पू...
चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित संयमरत्न विजय ने कहा ध्यान से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ध्यान का फूल खिलता है तो ज्ञान की महक फैलने लगती है। ध्यान का दीपक जलता है तो ज्ञान की उर्जा प्रसारित होती है। परमात्मा की ओर जाने वाले दो मार्ग है-एक ज्ञान का व दूसरा भक्ति का। जिस व्यक्ति को ज्ञान के आधार पर चलना है उसे ध्यान साधना पड़ता है। भक्ति का अर्थ है पूरी तरह डूबना, मदमस्त होना और ध्यान का अर्थ है-सतत जागरण, स्मरण का बना रहना। सभी ध्यान नहीं साध सकते, कुछ प्रेम से तो कुछ भक्ति से परमात्म तत्व को प्राप्त करते हैं। ज्ञान का रास्ता कठोर है, प्रेम का रास्ता हरा-भरा, रसनिमग्न है तो ध्यान के मार्ग पर संकल्प-बल ही हमारा संबल है लेकिन भक्ति के मार्ग पर समर्पण है, संकल्प नहीं। भक्ति के रास्ते पर परमात्मा के चरण व उनके हाथ उपलब्ध है। भक्ति के रास्ते पर संग है, साथ है। भक्ति के रास्ते...
विनयवान गुरु के हृदय में पाता है स्थान चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अभिमान आंखों पर ऐसी पट्टी लगा देता है कि अभिमानी को अपने अतिरिक्त और कोई व्यक्ति दिखाई नहीं देता। वह एक प्रकार से अंधा हो जाता है। अभिमानी कहता है- जगत मेरा सेवक है जबकि विनयवान कहता है-मैं जगत का सेवक हूं। जिस प्रकार फटी जेब में धन सुरक्षित नहीं रहता, उसी प्रकार अभिमानी के हृदय में ज्ञान सुरक्षित नहीं रहता। नित्य करने योग्य कार्य को जो शिष्य बिना किसी प्रेरणा के स्वयं कर लेता है, वह गुरु के हृदय में स्थान प्राप्त कर लेता है और जो शिष्य अविवेकी-अविनीत-अभिमानी होता है, उसे दैनिक कार्य करने का निर्देश करना पड़ता है। अपनी अज्ञानता-अभिमान के कारण ही ऐसे शिष्य अपने ही गुरु को अप्रसन्न कर देते हैं। हमें किसी भी कार्य को कल पर नहीं छोडऩा चाहिए। जो कल-कल करता ...