साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा धर्म शासन को पाकर जो परमात्मा की वाणी को समझते हैं उनका जीवन सुधर जाता है। प्रवचन में प्रत्येक व्यक्ति को आना चाहिए क्योंकि प्रवचन सुनते-सुनते कभी न क भी तो जीवन में बदलाव आएगा ही। इसलिए ऐसी वाणी सुनने का जब भी मौका मिले तो इसे गंवाने के बजाय संसार का प्रत्येक कार्य छोड़कर ऐसे मौकों का लाभ उठाना चाहिए। जीवन में बदलाव लाने के लिए अपना प्रयास कभी नहीं छोडऩा चाहिए। सीखे हुए ज्ञान को हमेशा दोहराते रहना चाहिए ताकि स्वाध्याय होता रहे। यदि सीखे हुए ज्ञान का स्वाध्याय नहीं किया गया तो वह भूला जा सकता है। उन्होंने कहा मनुष्य अगर सब कुछ जानता है तो भी उसे सुनने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि हो सकता है वह जो जानता है उससे कुछ नया सीखने को मिल जाए। बोलने से ज्यादा सुनने में भरोसा रखना चाहिए। जीवन में धर्म कथा सुनने से ज्ञान की वृद्धि होती है। यह ...
पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने बताया आचार्य मानतुंग परमात्मा प्रभु के ज्ञान और जिनशासन के सूर्य की महिमा और प्रभाव बताते हुए इस सूर्य का साक्षात्कार करने को कहते हैं कि परमात्मा के ज्ञान का सूर्य इतना शक्तिशाली है कि यह कभी अस्त नहीं होता। यह तीर्थंकर नामकर्म का सूर्य है जो अनन्त है व यह कभी अस्त नहीं होता। इस ज्ञान के प्रकाश में उदासीनता, हताशा, पछतावे का कोई स्थान है ही नहीं। परमात्मा की शरण में न अतीत का बोझ है और न ही भविष्य की चिंता। परमात्मा नारकी और स्वर्ग के सभी जीवों को एक साथ संभालते हैं। भौतिक सूर्य की भांति बादल, कोहरा या अन्य कोई भी बाधा इसके प्रकाश को कभी भी प्रभावित नहीं करती। जो चेतना प्रभु के साथ जुड़ती है उसे कभी अंधेरा का आभास नहीं होता। जिसके साथ जुड़ोगे, उसका प्रभाव और गुण आपमें आ जाते हैं। चन्द्रमा तो स्थिर और सौम्य है लेकिन तीर्थंकर...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा पाप का बोझ इतना बढ़ गया है कि शुभ और शुद्ध सपना ही बन गए हैं। अशुभ रोज दुगुना हो रहा है और शुभ घट रहा है। जीवन एक लालटेन की तरह है। आकंाक्षा, अधिकार और अहंकार की बाती बड़ी हो तो उसमें तमो और रजोगुण का धुआं निकलने लगता है और मन का कांच काला होने लगता है। संगीत अध्यात्म से जुड़ा है। पुराने जमाने में संगीत हृदय को भावविभोर कर देता था। वर्तमान में संगीत विकृत हो गया है। इस समय सतयुग नहीं कलियुग के समाचार छपते हैं जिनकी बहुलता है। इनमें पापों का फल देखने, सुनने और पढऩे को मिल रहा है। सोचता हूं लोगों की नींद फिर भी नहीं टूटती। सब भौतिकता की तरफ भाग रहे हैं। धन के पीछे भागने वाला धरती में धंसता है। धर्म के पीछे भागने वाला आकाश में ऊपर उठता है।
माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि भाद्रपद नक्षत्र के दो तारे हैं| आकाश अनंत हैं| आकाश के दो भाग होते हैं – लोकाकाश और अलोकाकाश| अलोकाकाश लोकाकाश से अनंत गुणा बडा हैं|जहां षट् द्रव्य हैं, वहां लोकाकाश हैं| अलोकाकाश में सिर्फ आकाश ही आकाश हैं| लोकाकाश में सिद्ध एवं चारों गति के जीव होते हैं| आचार्य श्री ने आगे कहा कि देवता चार प्रकार के बताए गए हैं| उसमें एक हैं ज्योतिष्क| ज्योतिष्क देवों के पांच प्रकार हैं – सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, ग्रह और तारे| इन पांचों से आकाश शोभित होता है| ज्योतिष्क देवों की विवेचना करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि सूर्य में उष्मा हैं, तेजस्वीता हैं और वह प्रकाशकर हैं| मनुष्य के जीवन में ये तीनों गुण पृष्ट होने चाहिए| *तेजस्विता से छोटी चीजें बड़ों को भी वश में कर ...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने पांचवें व्रत की व्याख्या करते हुवे कहा कि परिग्रह का परिमाण करना चाहिये। आपको 12 व्रतों का पालन करने में कोई भी अड़चन नहीं आती है। क्योंकि आप जितना चाहो उतना व्रतों में छूट ( आगार ) रख सकते हो अगर हम व्रत ग्रहण करते हैं तो जितना आगार रखेंगे उतना ही आश्रव रहेगा। बाकी का आश्रव रुक जायेगा बांध ( डेम ) में से जितना चैनल से पानी छोड़ेंगे उतना ही बाहर होगा। वैसे ही हम पच्चखान करते हैं तो जितना छूट रखी है उतना ही कर्म बंधन होगा बाकी के कर्मों के बंधन से छुटकारा मिल जायेगा। अतः खेत मकान दुकान गोडाउन व सोना चांदी रुपया हीरे मोती जवाहरात आदि तथा सचित परिग्रह में पशु दास दासी हाथी घोड़ा गाय बैल भैंस आदि आप जितने चाहो उतने...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा क्रोध, मान, माया लोभ भयंकर रोग है। शारीरिक रोग को समाप्त करना आसान है पर आध्यात्मिक रोग को समाप्त करना बहुत मुश्किल है। इससे बचने के लिए असली वैद्य की जरूरत है। संसारी प्राणी को तीन रोग सता रहे हैं-जन्म, जरा और मृत्यु। शरीर को तीन तत्व वात, पित्त और कफ सता रहे हैं। अगर यदि इन तीनों का संतुलन बिगड़ जाए तो आदमी बीमार पड़ जाता है। रोग का कारण पता लग जाए तो बीमारी जाने में समय नहीं लगता। संसार भ्रमण के तीन कारण हैं- मिथ्या, अज्ञान और असंयम। इसे महावीर मिथ्याज्ञान, मिथ्यादर्शन और मिथ्याचरित्र कहते हैं। इनके गर्भ में मोह राग और द्वेष का जन्म होता है। इनके कारण परिवार की शांति भंग होती है और परिवार के संबंध बिगड़ते हैं। जिसने अपने जन्म,जरा, मरण के रोग मिटा लिए हों या उनको मिटाने की साधना में संलग्र हों वही असली वैद्य है। सच्च...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा धर्म ही मनुष्य को प्राण से प्यारा होना चाहिए, क्योंकि वही नैया पार लगाएगा। यह जीवन चार दिन का है इसके रहते ही आगामी जीवन सफल और सार्थक बना लेना चाहिए। जिनमें धर्म के प्रति लगाव होता है वे उम्र नहीं देखते क्योंकि धर्म उम्र से नहीं उमंग से होता है। उमंग नहीं है तो कम उम्र के लोग भी धर्म नहीं कर सकते। जब मनुष्य का प्रबल पुण्य होता है तो ही उसे ऐसे मौके मिलते हैं। बहुत भाग्यशाली लोग ही परमात्मा की वाणी सुन पाते हैं । ऐसे उत्तम धर्म को पाकर उसका लाभ उठा लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म के प्रकाश से जीवन को एक सुंदर मार्ग दिया जा सकता है। इस पर चल कर प्रत्येक मनुष्य अपनी मंजिल पाकर सफल हो सकते हैं। ऐसे जिन शासन में जन्म और गुरुओं का समागम मिलना पुण्य की बात है। उमंग होने पर वृद्ध व्यक्ति भी आराम से धर्म के मार्ग पर चल सकते हैं। मनुष्य अ...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहाबइष्ट की पूजा करने से उपसर्ग-कष्ट नष्ट हो जाते हैं, विघ्नों की बेल छिन्न-भिन्न हो जाती है और प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। प्रसन्न चित्त से की गई पूजा ही अखंड होती है। सूर्य जैसे प्रकाश पुंज को नहीं छोड़ता, वैसे ही स्नेह उसे नहीं छोड़ता, जो वीतराग परमात्मा की पूजा करता है। चांदनी जैसे चंद्रमा के संग रहती है, वैसे ही कल्याण रूपी लक्ष्मी उसके साथ रहती है, राजा के पीछे जैसे सेना वैसे ही सौभाग्य उसके समीप आता है और युवा पुरुष को जैसे स्त्री, वैसे ही स्वर्ग और मोक्ष रूपी लक्ष्मी उसे चाहती है। जिनेश्वर देव की पूजा करने वालों की पुण्यवान लोग स्तुति करते हैं। राजाओं के समूह उसके समक्ष हाथ जोड़ खड़े रहते है। अपार प्रसिद्धि वह प्राप्त करता है। साथ ही चित्त की पीड़ा को हरने वाली उसकी कीर्ति सर्वत्र फैलने लगती है, कुल की शोभा बढ़ाने ...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा श्रावक श्रवण में श्रद्धा रखें। व्रत आराधना विवेक सहित करें। अपने कर्म को समझें। जो श्रम करता है और श्रमणों की उपासना करता है वह श्रमोपासक कहलाता है। जिनवाणी को अपने हित के लिए सुनें जिससे मनुष्य कर्म बंधन से हटकर उच्च गति प्राप्त कर सकता है। साध्वी ने कहा सच्चे अर्थों में कथनी और करनी में समानता होनी चाहिए। आज तक किसी पशु ने आत्महत्या नहीं की, फिर मनुष्य क्यों बदतर होता जा रहा है। इसके लिए कुछ तो सहनशीलता का अभाव और भौतिक साधनों का प्रभाव जिम्मेदार है। यदि जिनवाणी को सुनकर व्रत का धारण मनोरथों का चिंतन करें तो आपके जीवन को सार्थक कर सकते हैं। सभा में पांच तीर्थंकर जाप का अनुष्ठान किया गया। धार्मिक संसार शिविर के चौथे दिन महिलाओं को काय का स्वरूप और काय की जानकारी दी गई है।
अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता के सान्निध्य में प्रभु पाश्र्वनाथ का अनुष्ठान हुआ। श्रद्धालुगण पाश्र्वनाथ की स्तुति में तन्मयता से लीन हो गए। प्रभु के अनुष्ठान में सहयोगी परिवार का सम्मान किया गया। मां पद्मावती का शुक्रवार को विधि-विधान से एकासन कराया जाएगा। 3 सितम्बर को जन्माष्टमी के अवसर पर पच्चखाण हंडी का आयोजन होगा।
पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा परमात्मा कहते हैं कि अपने ज्ञान, चारित्र रिश्तों की डिजाइन में बदलाव करें। जैसी आपकी मानसिकता होगी वैसा ही आपका जीवन हो जाएगा। यदि एक बार स्वयं की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव हो गया तो आप किसी हत्यारे की मानसिकता को भी बदलकर उसे सकारात्मक और अहिंसक बनाने में सक्षम हो जाएंगे। उन्होंने कहा, इस संसार का संचालन किसी एक सत्ता के हाथ में न होकर छह द्रव्यों- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल के हाथों में है। इन्हीं की परस्पर क्रिया, प्रतिक्रिया से ही संपूर्ण विश्व का संचालन होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में सफलता पाने के लिए परफेक्ट कार्य के साथ, ऑप्शन भी तैयार रखें। अपनी गलतियों से सीखें लें, उनकी पुनरावृत्ति कभी नहीं हो पाए और अपना चरित्र बदलें, यह प्रयत्न जीवन भर करें। यदि जीवन में इतना सुधार कर लिया तो आत्मा से परमात्मा ...
दक्षिण भारत के प्रथम चतुर्मास चेन्नई महानगर के माधावरम में सुसम्पन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता अहिंसा यात्रा प्रणेता शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण के श्रीमुख से निरंतर ज्ञानगंगा की अवरिल धारा प्रवाहित हो रही है। जो केवल चेन्नईवासियों को ही नहीं, अपितु पूरे मानव समाज को एक नई दिशा दिखा रही है। तभी तो इस ज्ञानगंगा में गोते लगाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों-हजारों श्रद्धालु नियमित रूप से पहुंच रहे हैं। आने वाले श्रद्धालु महातपस्वी संत के दर्शन के साथ-साथ मंगल प्रवचन रूपी ज्ञानगंगा में डुबकी लगाकर मानों निहाल हो जाते हैं। चेन्नईवासियों का तो मानों सौभाग्य ही जागृत हो गया है। जहां कहीं उन्हें अपने कार्यों से जैसे ही अवकाश मिलता है, आध्यात्मिक लाभ लेने के लिए अपने आराध्य के सान्निध्य में कभी सपरिवार तो कभी अपने सहयोगियों के साथ तो कभी अकेले ही उपस्थि...