ज्ञान वाणी

मन ही मित्र व सत्रु मन ही

चेन्नई, साहुकारपेट स्थित श्री जैन भवन में विराजित उपाध्याय प्रवर रविन्द्र मुनि ने कहा कि व्यक्ति का मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र और सत्रु होता है। मन में अगर नाकारात्मक भावना उत्पन्न होती है तो वह सत्रु है और साकारात्मक उत्पन्न होतो मित्र होता है। लेकिन जब तक मनुष्य स्वयं से कोशिश नहीं करेगा तो उसके सुखी, दुखी होने का कारण कोई और नहीं हो सकता है। जीवन में सत्रुता का भाव रखने वाले व्यक्ति अगर किसी को सहद भी देते है तो वह जहर का काम करता है। वहीं अच्छी सोच वाले अगर जहर भी दे तो वह अमृत बन जाता है। व्यक्ति का सब कुछ उसके मन पर ही निर्भर करता है। वह जैसा सोचता है वैसा ही उसके साथ होता है। दुनियां में दिखावा करना झूठ बोलना बहुत ही आसान है। जो सच्चाई के मार्ग पर चलते है उन्हें जीवन में कभी भी परेशानी नहीं आती है। आज के समय में व्यक्ति के आचरड़ को देख कर लगता है कि मनुष्य के चोले में इंसान नहीं बल्...

सहनशीलता और क्षमा संत का गहना

चेन्नई सईदापेट जैन स्थानक में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा कल्याण चाहते हैं तो नम्र बनकर रहना होगा। धर्म के अंदर जाने के चार गुर हैं-पहला क्षमा यानी सहनशील होना चाहिए। इसी से एकता रहती है। दूसरे को निभाया जा सकता है। यह व्यक्ति को मजबूत करती है। दूसरा है सहनशीलता। क्षमा और सहनशीलता संत का आ ाूषण है। तीसरा विनय-द्वार। विनय धर्म का मूल है। चौथा सरलता, यह धर्म का पात्र है। सरल पात्र में ही धर्म टिकता है। कौवा बाहर से ही नहीं अंदर से भी काला है जबकि बगुला बाहर से सफेद और अंदर काला है। वह बाहर से तो साधु दिखता है लेकिन उसके काला भरा है। बगुला जैसे धर्मी बाहर तो दिखते धार्मिक हैं लेकिन अंदर पाप से भरे होते हैं। मुनि ने संथारे पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संथारे से पहले आलोचना करना और अपने पूरे जीवन के पाप बोलना, फिर प्रतिक्रमण के बाद संथारा किया जाता है। तभी आत्मशांति मिलता है। जो सरल हैं वही संथारा...

भाव में रखे साधुता

चेन्नई, साहुकारपेट स्थित श्री जैन भवन में विराजित उपाध्याय प्रवर रवीन्द्र मुनि ने कहा व्यक्ति का सब कुछ ज्ञान और राग पर निर्भर करता है। जिन मिट्टी में मैत्री भाव का प्रभाव होने पर ज्ञान होता है वैसे ही राग के परिहार से साधुता आती है। जीवन में जैसे उजाले के समय में अंधेरा नहीं और अंधेरे के समय में उजाला नहीं होता है। इनको एक साथ करने की अगर व्यक्ति कोशिश करे तो कभी पूरी नहीं होती, क्योंकि दोनों को एक साथ रखना संभव नहीं। अगर व्यक्ति चाहे तो सफेद रंग में काले रंग को मिला सकता है लेकिन उनको कभी भी एक साथ नहीं कर सकता। उसी प्रकार यदि व्यक्ति के जीवन में ज्ञान का सद्भाव है तो राग का अभाव होगा। एक का सद्भाव दूसरे के अभाव का कारण बनता है। जीवन में राग का भाव है तो निश्चय ही उसके जीवन में ज्ञान का अभाव होगा। एक दम राग खत्म होना संभव नहीं होता। राग कोई चीज नहीं है जिसे जब चाहे तब बदल दें। संसार की क...

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