पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा परमात्मा कारण देखते हैं और यह संसार परिणाम को देखता है। जब कारण बदल जाएगा तो परिणाम अपने आप बदल जाएंगे। जो मूल कारण को खोजे वही ज्ञान कहलाता है। जो पदार्थ के अन्दर का कारण जानने का प्रयास करता है वह भौतिक विज्ञान है लेकिन धर्म जीव और आत्मा दोनों के भीतर का कारण देखता है। विश्व और जीवन का संचालन छह द्रव्यों के परस्पर संयोग और क्रियाओं से होता है। इनमें से एक तत्व जीव की प्रकृति के बारे में कहा जानना जीव का स्वभाव है। यदि जो जैसा है वैसा जाने तो ज्ञान है और जो नहीं है, उसे जान लेते हैं तो उसे अज्ञान या भ्रम कहते हैं। संसार का भ्रम भी ऐसा ही है। प्रत्यक्ष दृश्य में छिपे सत्य को देखना डिस्कवर या रिसर्च करना कहते हैं। किसी अहंकार, क्रोध और विलाप करने वाले के भावों में से हम यदि उसमें छिपा हुआ उसका दर्द, अपमान की भावना और प्रेम...
यहां शांति भवन में ज्ञानमुनि एवं लोकेश मुनि के सन्निध्य में कृष्ण जन्माष्टमी मनाई गई। अवसर पर ज्ञानमुनि ने कहा अगर श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे तो श्री कृष्ण कर्मयोगी थे। उनके कर्म व गुण के कारण ही भगवान श्री कृष्ण को शताब्दी बीतने के बाद भी लोग दिल से याद करते हैं। इसी लिए मानव को गुण का संग्रह करना चाहिए। आप वक्त या समय का संग्रह नहीं कर सकते लेकिन गुण का संग्रह कर सकते हैं। धर्म की राह दिखाने वाले श्री कृष्ण को जन्म लेते ही माता पिता का बिछोह सहना पड़ा था। ये सब कर्म का खेल है। कर्मो के खेल काफी निराले होते हैं, ऋषि मुनि भी इनसे हारे हैं। इन्होंने मित्र के लिए जूठी पत्तल भी उठाई एवं रथ का सारथी बनना मंजूर किया। सच्चा मित्र वही होता है जो कोई भी काम को छोटा न समझता हो। जहां भी जाए कोई भी कार्य करें। हमारा कर्तव्य ही शोभा है। कर्तव्य है तो हम शोभित हैं। कर्तव्य, गुण व कर्म को बड़ा समझने...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन विराजित मुनिगण संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय के सान्निध्य में मासखमण, सिद्धि तप, भक्तामर तप आदि तपश्चर्या के निमित्त त्रिदिवसीय महोत्सव के दौरान रविवार को भक्तामर महापूजन का आयोजन हुआ। मुनि ने इस मौके पर कहा भक्त को अमर बना देता है भक्तामर। धार (म.प्र.) के राजा भोज ने जिनशासन का प्रभाव जानने के लिए आचार्य मानतुंगसूरी को चौवालीस बेडिय़ों में जकड़ दिया था। आचार्य ने भक्तामर स्तोत्र का एक-एक श्लोक बोलते गये और बेडिय़ां टूटती गई। चौवालीस श्लोक पूरे होते ही सारी बेडिय़ां टूट गई। राजा भी आचार्य एवं जैन धर्म से प्रभावित हुआ। भक्तामर स्तोत्र का प्रभाव आज भी चारों ओर विद्यमान है। यह स्तोत्र सर्वरसों से पूर्ण व बंधनों का चूर्ण करने में परिपूर्ण है। यह श्वेताम्बर व दिगंबर दोनों परम्पराओं में सर्वमान्य व सर्वग्राह्य स्तोत्र है। भक्तामर के 41वें श्लोक के प्रभाव से दीक्षा लेन...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा व्यक्ति को चाहिए कि वह फूलों की तरह सुगंध बांटे एवं सदाचार का पालन करे। जानवर, जानवर की तरह ही पैदा होता है और जानवर की तरह ही मर जाता है लेकिन आदमी, आदमी की तरह ही पैदा होता है और बहक जाए तो पशु की तरह मर सकता है। यदि संभल जाए तो राम, महावीर की तरह भगवान भी बन कर आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। आदमी तो इतना भी गिर सकता है कि जानवर को भी शर्म आ जाए। व्यक्ति भले ही आचरण से ऊपर न उठ पाए लेकिन विचारों में उच्चता रखनी चाहिए। ऊर्जा दो प्रकार की होती है-सकारात्मक एवं नकारात्मक। इसी प्रकार विचार भी दो प्रकार के होते हैं-प्लस और माइनस। सकारात्मक विचार पशुपति एवं नर से नारायण बना देता है जबकि नकारात्मक विचार व्यक्ति को पशु से भी बदतर बना देता है। इन्सान से हैवान बना देता है। जब व्यक्ति धर्म विरोधी होता है तो निर्दयी हो जाता है और जब...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि धर्म शास्त्र और इतिहास साक्षी है कि जब जब भी महापुरुषो का जन्म हुआ है तब तब अर्धम, अनीति व् अत्याचारी भी पैदा हुआ है। परनतु अंत में विजय तो सत्य धर्म न्याय की ही हुई है। राम के साथ रावण, कृष्ण ,के समय कंश ,महावीर के लिए गोशालक ,और महात्मा गाँधी के विरोध में गोडसे हुए। कर्मो की नियति या भाग्य की विडंबना कहें की कर्म योगी करुणावतार कृष्ण वासुदेव का जन्म कंश के कैदखाने में हुआ। किन्तु संकटविमोचन बनकर जगत के बंधनो को तोड़ते हुए जगत के जीव को मुक्ति की राह बताई गयी। अत्याचार पर करुणा ,अधर्म पर धर्म , अन्याय पर न्याय को प्रतिठित किया। कृष्ण वासुदेव ने न केवल अपने शत्रु कंस ,दुरयोधन ,पूतना , कालिया आदि नाश नहीं किया अपने आंतरिक शत्रु क्रोधादि कषाय अदि पर भी विजय प्राप्त किया। चओवीसी में अभय नाम के तीर्थकर बनकर प्राणी मात्रा कल्याण करेंगें उन्...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आज आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभुजी स्वामी का मोक्ष कल्याणक है। चंद्रप्रभुजी को अपने पूर्व भव में धात की खंड के मंगलावती नगरी में पद्म राजा के भव में धर्म प्रेरणा का अच्छा योग मिला था। शहर में साधु संतों का आवागमन होता रहता था, जिससे धर्म की प्रभावना में बढ़ोतरी होती थी। संतों का चतुर्मास किस लिये कराते हैं और प्रवचन क्यों होते हैं। साधु साध्वियों के संतों के प्रवचन का चतुर्मास कराने का उद्देश्य यही होता है कि लोगों के दिल में धर्म की भावना बढे, और आत्मा निकालिस बने समाज में जागृति आये। कुव्यसन व कुरीतियां दूर होवे ऐसी भावना से संत भी भगवान की वाणी सुनाते हैं। राजा पद्म ने भी भगवान की वाणी सुन करके युगंधर मुनि के पास दीक्षा ली तीर्थंकर ग...
पुरूषार्थ एक ऐसा तत्व है, जो हमारे जीवन में बहुत महत्व रखता है| आदमी जीवन में ध्यान दें कि वह पुरूषार्थ क्या करता है, क्या नहीं करता है, ठीक कर रहा हैं या नहीं? एक बच्चा है, उसके माता पिता या अभिभावक ध्यान देते हैं कि मेरा बच्चा कैसे योग्य बने| अगर वे ध्यान नहीं देते हैं तो वे चाहे अनचाहे किसी भी रूप में शत्रुता का काम करते हैं| वे माता पिता शत्रु हैं, जो बालक को नहीं पढ़ाते एवं बालक को अच्छे संस्कारों से सुवासित नहीं करते|बाल्यकाल निर्माण का समय है, अध्ययन का समय है एवं कुछ अर्जन करने का समय हैं, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ज्ञानशाला दिवस पर श्रद्धालुओं को विशेष पाथेय प्रदान करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| तेरापंथ धर्मसंघ में ज्ञानशाला का सुन्दर उपक्रम आचार्य श्री ने आगे कहा कि बच्चों को विधालय में ज्ञान प्राप्ति के साथ अच्छे संस्कार भी मिल सक...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि सातवें व्रत में भगवान महावीर स्वामी फरमा रहे कि भोग- उपभोग में आते है। जैसे खाना पिना आदि इसे भोग कहते है और जो वस्तुएँ बार बार उपयोग में आती है जैसे कपड़े गहने वगेरा को उपभोग कहते है। इसी प्रकार श्रावक को 26 बोल की मर्यादा करनी चाहिये जो वस्तुएँ उपयोग में आने वाली है। उसका परिमाण करले कि इन चीज वस्तुओ का इतने परिमाण (नगके रूप मे संख्या) निर्धारित करले और 15 कर्मादान जो कि श्रावक को जानने के योग्य है परन्तु आदरने के योग्य नही है। 15 कर्मादान में पाप कर्म ज्यादा है और जीव हिंसा का भी योग ज्यादा बनता है इसलिये इनका त्याग करना चाहिये जिससे जीव हिंसा से बच सके। 7 वे व्रत में 20 अतिचार दोष होते है उनमें 15 कर्मादान के व 5 भोजन संबंधी होते...
माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में आचार्य श्री महाश्रमण ने तेरापंथ प्रोफेशनल फोरम के दो दिवसीय 11वें अधिवेशन “हम कितने सौभागी” के उद्घाटन सत्र में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जहाँ संस्था या संगठन हैं, वहा व्यवस्थाओं की अपेक्षा होती हैं| चाहे साधु समाज हो या श्रावक समाज, व्यवस्था की आवश्यकता होती हैं| संगठन में नेतृत्व न हो, तो वह विनाश की ओर जा सकता है| संगठन में नेतृत्व को कभी कभी कठोर निर्णय भी लेने पड़ सकते हैं, शल्य – क्रिया भी करनी पड़ सकती हैं, तो कभी कभी प्रोत्साहित भी किया जा सकता हैं| संगठन में मैन पावर हो, कार्यकर्ता शक्ति अच्छी हो, व्यक्तिगत स्वार्थ न हो| टी पी एफ बुद्धिजीवियों की संस्था हैं| बुद्धि के साथ शुद्धि रहे| बुद्धि पर अंकुश रखने के लिए शुद्धि चाहिए| विभिन्न क्षेत्रों की बुद्धियाँ इस मंच पर गुलदस्ते के रूप में केन्द्रित है...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि रागी से वीतरागी, जन से जिन और पाप से पुनीत बनाने की शक्ति केवल भगवान की वाणी में ही है। जिनवाणी से जीवन की तस्वीर को बदला जा सकता है। आध्यात्मिक जगत में त यानी तर जाओ, स यानी संसार से और वी यानी वीतराग में और र यानी रम जाओ होता है। इंसान जड़ तस्वीर को बदल सकता है। इस मानव जीवन में अगर कषायों का शमन, विषयों का वमन, इंद्रियों का दमन और मोह का त्याग किया जाए तो जीवन की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।
एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा इंद्रियों को वश में रखते हुए तप और संयम से आत्मा को पाप से बचाना चाहिए क्योंकि असुरक्षित आत्मा जन्म मरण के चक्कर में फंसी हुई संसार का परिभ्रमण करती है और सुरक्षित आत्मा सब दुखों से मुक्त हो जाती है। कछुआ जैसे सारे अंग समेट लेता है वैसे ही जब मनुष्य इंद्रियों को सब विषयों से समेट लेता है तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा जब तक आत्मा के ऊपर पाप कर्म का मैल लगा हुआ है तब तक आत्मा की शांति के सारे रास्ते बंद रहते हैं और यदि इस शांति को पाना है तो जन्मों से लगे कर्म मैल को निर्जरित करना होगा। यह सब तप, त्याग, व्रत, प्रत्याखान, यम-नियम, जप और साधना के बिना संभव नहीं है। जिस प्रकार वाहन के लिए ब्रेक जरूरी है उसी प्रकार मानव जीवन में व्रत और संयम जरूरी है। मरुधर केशरी जन्म जयंती महोत्सव का तीसरा दिन जाप दिवस के रूप ...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा जिस प्रकार चंद्रमा में उज्वलता, मोरपंख में सुंदरता, कमल में सौरभ, दूध में स्निग्धता, मिश्री में मधुरता, सूर्य में तेजस्विता और जल में निर्मलता सहज रूप से ही होती है, उसी तरह उत्तम कुल में उत्पन्न होने वाले पुरुष में भी विनय गुण स्वाभाविक रूप से ही रहता है। विनय गुण स्वाभाविक आभूषण है जो स्वर्णाभूषण से भी कीमती है। मनुष्य की जितनी शोभा विनय रूपी आभूषण को धारण करने से बढ़ती है उतनी शोभा तो स्वर्णाभूषण व दिव्य वस्त्र धारण करने से और हाथी पर बैठने से भी नहीं बढ़ती। एक मात्र विनय रूप आभूषण को ही यदि हमने अंगीकृत किया है, तो फिर अन्य गुण रूप आभूषणों की मनुष्य को कोई आवश्यकता नहीं रहती। विनय ही हमें विशिष्ट पद की ओर ले जाकर विजय दिलाता है। विनय से विद्या आती है तो अहं से चली जाती है। राजेन्द्र भवन में 1 सितंबर से मासखमण, सिद्धि ...