कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि शक्ति और ज्ञान प्रदर्शन से परमात्मा नहीं मिलता बल्कि आत्म समर्पण से मिलता है। फूल जैसी कोमलता से मिलता है। चार प्रकार के लोग होते है एक जो फूलो का गुलदस्ता लाकर घर की शोभा बढ़ाते है, दूसरे फूलों की माला पहनते हैं। तीसरे वे जो फूल बेचते है और चौथे वो होते है जो फूलो का इत्र निकालते हैं। जो गुलदस्ता लाते हैं वे मूढ़ हैं, जो माला पहनते हैं वे अज्ञानी हैं और जो फूल बेचते हैं वे अविवेकी हैं। जो इत्र निकाल रहे हैं वे ज्ञानी है, विवेकवान है और समझदार है।हमने अपने जीवन से सुगंध लेने की कोशिश नहीं की। इसका सदुपयोग नहीं किया। भले ही जुगनू के समान अल्प बुद्धि वाले है लेकिन हमारी आत्मा में सूर्य के समान दिव्य प्रकाश है। आत्मा पर कर्मों का आवरण है उस आवरण को हटाने के लिए बहुत बड़ा शास्त्र ज्ञानी बनना जरुरी नहीं। उसके लिए तो भरत ...
ईश्वर से इस बात की कभी शिकायत नहीं करनी चाहिए कि हमारी मुश्किलें बढ़ी हैं बल्कि हमें मुश्किलों से कहना चाहिए कि ईश्वर बढ़ा है। चेन्नई के कामराज अरैंगम में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए तपस्वी दादी जानकी ने कहा कि कुछ लोगों को दृष्टि से ही सोच और दोष का पता चल जाता है। हमें अपनी दृष्टि और सोच को बदलना चाहिए। हमें ईश्वर के प्रति हमेशा उन चीजों के लिए धन्यवाद करना चाहिए जो हमें मिला है। जो नहीं मिला उसके लिए शिकायत करने के बजाय उसे पाने के लिए परिश्रम करना चाहिए। दादीजी ने कहा कि हमें अपने अच्छे-बुरे कर्मों के बारे में हर रोज विचार करना चाहिए। यही कर्म आपको सदमार्ग पर ले जाएगा। क्योंकी हमे इन अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब यहीं देकर जाना है। ईश्वर लोगों को कठिन समय उन्हें मजबूत बनाने के लिए दिखाता है। इसलिए हमे इसके लिए भी उनका धन्यवाद करना चाहिए। हर व्यक्ति को ऊं शांती का हर रोज जाप करना चाह...
यहां शांति भवन में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा संसार के ज्यादातर प्राणी मोह-माया में फंसे हैं जो कि दुख का मूल कारण है। इस संसार में ऐसी कौन सी वस्तु है जो हमारी है। ये सभी ठाट-बाट की सामग्री यहीं रह जाएगी। जीव पास है तो सब अपने हैं चला गया तो कोई अपना नहीं। सारी मोह-माया भी उसी के साथ चली जाती है। जीव सब कुछ छोड़ अकेला ही चला जाता है पाप का बोझ लेकर। कहावत है कि जीते को रोटी नही मरने बाद रसोई करते हैं। आज के युग में सात पुत्र होने के बावजूद वृद्ध मां को अपने रोटी पकाकर खानी पड़ती है। सातों को अकेली पालने वाली माता को सातों मिलकर नहीं पाल सकते। ये कैसा कलियुग है। बेचारे वृद्ध मांं-बाप भार लगते हैं। जब उनके पास धन दौलत थी सब पूछते थे, धन समाप्त हुआ तो पूछ खत्म हो गई। जीवन में फलना हो तो माता-पिता का आशीर्वाद लें बद्दुआ नहीं। पहले के अनपढ़ भी अनुभवी होते थे, आजकल के पढ़े-लिखे अनपढ़ हैं।
यहां जैन स्थानक में विराजित साध्वी मयंकमणि ने कहा वाणी संयम, मौन एवं मित भाषण जीवन दर्शन का मौलिक सूत्र है। मौन सर्वोत्तम भाषण है यदि बोलना ही है तो कम बोलो। एक शब्द में काम चल जाए तो दो मत बोलो। असत्य का प्रयोग वाणी से होता है। मौन रहेंगे तो वाणी असत्य से दूषित नहीं होगी। भारत के बड़े-बड़े योगी, ऋषि, ज्ञानी एवं महात्मा मौन साधना में लीन रहते थे। मौन के मूल में संयम होना चाहिए। डर या अज्ञान के कारण मौन रहना मुनित्व नहीं हो सकता। एक विचारक ने कहा है कि मद से उत्पन्न मौन पशुता है और संयम से उत्पन्न साधुता। मुनि मौन रहे या बोले लेकिन उसका लक्ष्य होना चाहिए। कठोर भाषा भी बहुत से प्राणियों का नाश करने वाली होती है। अत: ऐसी भाषा सत्य हो तो भी साधु को नही बोलनी चाहिए क्योंकि इससे पाप कर्म का बंध होता है।
अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता व अन्य साध्वीवृन्द के सान्निध्य में सोमवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई गई। इस अवसर पर साध्वी कुमुदलता ने भगवान श्रीकृष्ण और महावीर स्वामी जीवन की समानताओं का विवेचन करते हुए कहा कि चंडकौशिक सांप ने महावीर स्वामी को डंक मारा तो महावीर ने अमृत धारा बरसाई, उसी प्रकार श्रीकृष्ण की भक्ति में मीरा ने विष का प्याला पिया तो वह अमृत बन गया। इस अवसर फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता के दौरान बच्चों ने राधा-कृष्ण की वेशभूषा में प्रस्तुति दी। च्चखाण हांडी के पच्चखाण लेकर गुरुभक्तों ने पर्युषण के पचाखाण लेकर धार्मिक जीवन जीने की शिक्षा ग्रहण की।
श्री एसएस जैन संघ एमकेबी नगर एवं साध्वी धर्मप्रभा व स्नेहप्रभा के सान्निध्य में मरुधर केशरी मिश्रीमल एवं वरिष्ठ प्रवर्तक रूपमुनि की जन्म जयंती मनाई गई। विशिष्ट अतिथि एसएस जैन संघ साहुकारपेट के अध्यक्ष आनंदमल दल्लाणी, महावीरचंद बोहरा, मोहनलाल चोरडिया, पदमचंद कांकरिया, वईसराज रांका, दीपचंद लूणिया, डा. उत्तमचंद गोठी व सज्जनराज मेहता थे। दर्शना महिला मंडल व त्रिशला बहू मंडल के स्वागत गीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। चातुर्मास समिति के चेयरमैन पारसमल लोढा ने स्वागत भाषण दिया। इस मौके पर साध्वी धर्मप्रभा ने कहा मरुधर केशरी का जीवन एक जलती हुई जो आज भी पूरे समाज एवं संघ का मार्गदर्शन करती है। वे दृढ़ संकल्पी, अटूट विश्वास के धनी, दीन-दुखियों के हितेषी, जीवदया के प्रबल प्रेरक, आत्मविश्वास से परिपूर्ण और श्रवण संघ की ढाल थे। उन्होंने श्रमण संघ को एकसूत्र में पिरोने के लिए सात बार राजस्थान में साधु स...
सोमवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस मौके पर उन्होंने कहा कि पदार्थ हटाओगे तो चाहत निष्फल हो जाएगी और चाहत हटाओगे तो पदार्थ निष्फल हो जाएगा। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि जो विषय है वही चक्र है और जो चक्र है वही विषय हैै। यदि चाहते हैं कि यह चक्र मन में न चले तो पदार्थ को न देखें। यदि पदार्थ सामने नहीं होगा तो विषय भी नहीं होगा। परमात्मा का कहना है कि यदि सहज उपलब्धता नहीं हो तो विकार उत्पन्न नहीं होता। उन्होंने ब्रह्मचर्य के नवाणं का पालन करने का मार्ग बताया। विकारों के रास्तों को बंद कर दें। जिस प्रकार यदि घास को चिंगारी का साथ न मिले तो वह चारा बनेगा और सकारात्मक काम में आएगा अन्यथा चिंगारी के संयोग से आग के साथ जलकर राख बन जाएगा। परमात्मा ने कहा है क...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से पहले की कुछ घटनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कुछ महापुरुष ऐसे होते है जिनके नाम से तिथि चलती है उन्हीं महान लोगों में भगवान श्रीकृष्ण भी थे। इस जीवन में जो घटनाएं घटती हैं वे मनुष्य के स्वयं के नसीब से होती हैं। उसी प्रकार कृष्ण के जन्म के समय हुआ था। समय आने पर कृष्ण ने अत्यचारों का खात्मा कर उनका अवसान किया। उनके आदर्श जीवन में उतारना चाहिए। ऐसे महापुरुषों के जन्मदिन पर हमें उनके जीवन से सद्प्रेरणा लेनी चाहिए। धर्म शासन को पाकर जो परमात्मा की वाणी समझते हंै उनका जीवन सुधर जाता है। सागरमुनि ने कहा आचरण व्यक्ति को ऊंचाई पर ले जाता है। पाप करने से आत्मा नरक की ओर बढ़ती है। यह केवल लोभ की वजह से होता है। लोभ कर मनुष्य स्वयं ही नरक का मार्ग बनाता है लेकिन अच्छे कर्म कर अच्छा भव पा सकता है। धर्मसभ...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आज कृष्ण जन्माष्टमी है, आज के दिन कर्म योगी मातृ भक्त श्री कृष्ण का जन्म होने से अष्टमी तिथि का नाम ही जन्माष्टमी हो गया श्री कृष्ण राज नीतिज्ञ थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सारी लीलाएं की और 360 युद्ध किये हर युद्ध में विजय प्राप्त की किसी देवी देवता राक्षस पशु पक्षी कालीद्रह में कालियां नाग से भी डरे नहीं और न हारे पूतना जैसी राक्षसनी को भी दूध मुंहे बच्चे थे तभी परलोक पहुंचा दिया था। ऐसे परम शक्तिशाली श्री कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ माता देवकी ने जन्म दिया पर पालन-पोषण यशोदा मैया ने किया कितने भाग्यशाली थे। जिससे दो दो माताओं का लाड़-प्यार मिला था कारागृह में जन्मे वह अंतिम स्वास् कानन जंगल में पृथ्वी पट शीला पर सोते हुवे प्...
भगवान महावीर के जीव ने अनन्त भव किये हैं| आगमों में उनके 27 मुख्य भवों का वर्णन मिलता हैं| उनका जीव नीचे में सातवीं नरक तक गया, तो कभी चक्रवर्ती, वासुदेव भी बना| कई भवों में कठोर साधना का जीवन भी जीया, तो कभी देव गति में भी गया| यह सब तो कर्मवाद का सिद्धांत हैं| तीर्थकर बनने वाली आत्मा ने पाप कर्म किया है तो उन्हें स्वयं भोगना ही पड़ेगा, भुगतान करना ही होगा, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि कर्मवाद नीतिपूर्ण न्यायालय है, यह निष्पक्ष हैं| बड़े से बड़ा कोई भी जीव हो, जिसने पाप कर्म किये हैं, उसे इस न्यायालय में दया नहीं मिलती और निर्दोष को दंड नहीं मिलता| हमारे देश में उच्च न्यायालय है, सर्वोच्च न्यायालय हैं, पर यह सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर हैं, इससे कोई दोषी छूट नहीं सकता...
साहुकार पेठ स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित आचार्य संयमरत्न विजय कोंडीतोप में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर के क्रांतिकारी शिष्य तरुणसागर को श्रद्धांजलि- अर्पित करने पहुंचे। मुनि संयमरत्न ने कहा कि आज तक हमनें तरु पर पुष्प खिलते देखें है, लेकिन यहां पर तो स्वयं पुष्प (पुष्पदंतसागर) ने तरु (तरुणसागर जी) को प्रकट किया है। वे छोटी सी जिंदगी में बहुत बड़ा जीवन जीकर गए, कम समय में दम का कार्य कर गए। राष्ट्रसंत तरुणसागर ने अपने तपोबल,चिंतनबल से लाखों लोगों को ज्ञान का अमृत प्रदान किया है। शांति बाई के लाल होकर इन्होंने शांति के साथ नहीं,बल्कि क्रांति के साथ प्रवचन दिए। पवन नामक बालक ने अंत समय तक तरुण बनकर अपनी तरुणाई के साथ पवन की तरह निरंतर गतिशील रहकर सद्गति की ओर महाप्रयाण किया है। इनकी सहज-सरल भाषा जीवन की एक नयी परिभाषा बन गई। तरु की तरह अपने चिंतन रूपी फल-फूल व छाया जगत को दे गए। इस अवसर प...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि जिस पत्थर से पुल का निर्माण होता है उसी से दीवार भी बनती है। जो फूल भगवान को चढ़ते है उन्हें अर्र्र्र्र्थी पर भी चढ़ाया जाता है। यही नर्तन निर्वाण का कारण है और यही नर्तन नरक का भी कारण है। जिस अक्षर से राम बना है उसी से रावण बना है। तुम चाहे तो मुख से निकलने वाले शब्दों से जोडऩे का कार्य भी कर सकते है और तोडऩे का भी। भगवान को फूल अर्पण करना एक संकेत है, तुम एक फूल हो खुद में सुगंध पैदा करो। तुम पहले कमल बनो, विषय कषाय से ऊपर उठो। इस जगत में महावीर एक फूल है जो सुगंधित है और एक फूल आप है जो ज्ञान की सुगंध से रहित है। तुम एक फल हो जो अपनी सुगंध को खोज नहीं पाए। केवल ज्ञानी जहां बैठते है उस जगह को गंध कुटी कहते है। क्योंकि वहां केवल ज्ञान की सुगंध आती है। फूल सुबह खिलते है और शाम को मुरझा जाते है। ऐसे ही जीवन है। जीवन...