ज्ञान वाणी

राजनीति के साथ धर्मनीति से होता उत्थान : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के दूसरे स्थान के 448वे सूत्र का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि दो चक्रवर्ती ऐसे हुए हैं जिन्होंने काम-भोगों का परित्याग नहीं किया और मृत्यु के बाद सातवें नरक लोक में अप्रतिष्ठित नैरयिक के रूप में उत्पन्न हुए| वर्तमान अवसर्पिणी काल में १२ चक्रवर्ती हुए| इनमें से दो चक्रवर्ती सुभूम और ब्रह्मदत जो की क्रमशः आठवें और बारहवें चक्रवर्ती थे! जो अंतिम समय में साधना नहीं करने के कारण मृत्यु के बाद सातवीं नरक में गये| आचार्य श्री ने आगे कहा कि चक्रवर्ती एक सत्ताधीश व्यक्ति होता है| दुनिया में चक्रवर्ती से बड़ा और कोई सत्ताधीश नहीं होता| चाहे वह प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी क्यों न हो| प्रभुत्व के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान, छः खण्ड के अधिपति होते हैं, चवदह रत्नों के स्वामी होते हैं| पहले भरत , आठवें सुभूम और बारहवें ब...

तरुणसागर के कड़वे वचनों से मिली जैन समाज को नई पहचान

श्री सकल जैन समाज और श्री खण्डेलवाल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में बुधवार को शहर में विराजित सर्व जैन सम्प्रदायों के आचार्यों, उपाध्याय प्रवर, प्रवर्तक, उपप्रर्वतक और साध्वियों की निश्रा में साहुकारपेट स्थित श्री प्रवीणभाई मफतलाल मेहता गुजराती जैनवाड़ी में राष्ट्रसंत तरुणसागर के देवलोकगमन के उपलक्ष्य में गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ। इससे पहले पुष्पदंतसागर की प्रेरणा से कोण्डितोप स्थित सुंदेशा मूथा जैन भवन से कलश रथयात्रा निकाली गई जो गुजराती जैनवाड़ी पहुंची। गुणानुवाद सभा में तरुणसागर के गुरु आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा दुनिया ने तो एक संत खोया है लेकिन मैंने तो अपना बेटा खो दिया। तरुणसागर दिल पर राज करना चाहते थे लोगों को जगाना चाहते थे यह उनका विचार था। वे हमेशा इसी के लिए जीए। उनका अभाव कोई भी पूरा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा उनकी यही प्रार्थना है कि तरुणसागर जैसा ही शिष्य सभी को मिले। ...

अपनी गलतियों का पश्चाताप करने वाला सम्यक : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

पर्युषण पर विशेष कार्यक्रम शुरू बुधवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन कार्यक्रम आयोजित हुआ। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि श्रद्धा करने में बुद्धिमत्ता का प्रयोग करना चाहिए लेकिन श्रद्धा करते हुए बुद्धि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। परमात्मा की आज्ञा को बिना अपनी तुच्छ बुद्धि उपयोग किए श्रद्धा के साथ स्वीकार करें और उन्होंने जो सत्य मार्ग दिखाया है उसका अनुसरण करना चाहिए। आचार्य मानतुंग ने अपनी बेडिय़ां तोडऩे के लिए किसी अन्य का आह्वान न कर अपनी श्रद्धा और सामथ्र्य को जगाया। आचारांग सूत्र में बताया कि सुरक्षा की चाह रखने वाले को नियम और आज्ञा का पालन करना जरूरी है। जो स्वयं परमात्मा की आज्ञा में नहीं रहता वह स्वयं परेशान होता है और दूसरों को भी दु:खी और परेशान करता है। गोशालक, रावण और...

नास्तिक से ज्यादा खतरनाक उन्मादी मानव: कमल मुनि

नास्तिक व्यक्ति से भी ज्यादा खतरनाक उन्मादी मानव होता है, क्योंकि नास्तिक तो अपना नुकसान करता है लेकिन उन्मादी स्वयं के साथ परिवार, समाज और देश का विश्व का ढांचा तहस-नहस कर दिशाहीन हो जाता है। राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ने महावीर सदन में मंगलवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए यह उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म के मार्ग पर चलने वाली पवित्र आत्मा मैं जब उन्माद सवार हो जाता है, तब उसके वशीभूत होकर धर्म के नाम पर धर्म की जाजम पर पाप और अधर्म का सेवन शुरू हो जाता है। विवेक रहित होकर पथ भ्रष्ट हो जाता है। उन्माद एक पागलपन है, जो मानव को शैतान और राक्षस बना देता है। मुनि ने कहा कि किसी भी निमित्त से हमारे में उन्माद आ जाता है, तो उससे विवेक का दीपक बुझ जाता है। नशीली वस्तु का उन्माद तो थोड़े समय बाद उतर जाता है, लेकिन धर्मांधता, लोभ, मोह और क्रोध उन्माद मरते दम तक पीछा नहीं छोड़ता। उन्होंन...

ज्ञान की गंभीरता, आचरणों की ऊँचाई सम्पन्न बने मनुष्य: आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सुत्र दूसरे अध्याय के 447वें श्लोक का विवेचन करते हुए कहा कि मनुष्य क्षेत्र के बीच में दो तरह के समुन्द्र है – लवण और कालोद| जैन भुगोल के आधार पर हम जहां रहते हैं, वह जम्बू द्वीप हैं| इसको चारों ओर वलयाकार में समुन्द्र है, उसका नाम है लवण समुंद्र| उसके बाद एक द्वीप आता है, उसका नाम है धातकी खण्ड| उसके चारों ओर एक समुद्र हैं कालोदधि (कलोद) समुन्द्र| उसके बाद पुष्कर द्वीप, फिर समुन्द्र, इस तरह असंख्य समुन्द्र और द्वप हैं|    आचार्य श्री ने आगे कहा कि हम मनुष्य अढ़ाई द्वीप (पन्द्रह कर्म भूमि) – पांच भरत, पांच ऐरावत, पांच महाविदेह, इन पन्द्रह कर्म भूमियों में मनुष्य होते हैं, उन्हीं में से फिर साधु होते हैं, तीर्थकर होते हैं|      आचार्य श्री ने आगे कहा कि *सिद्ध चन्द्रों से भी ज्यादा निर्मल है, सूर्यों से भी ज्यादा प्रकाशक...

पौषध करना यानी आत्मा का पोषण करना: साध्वी कुमुदलता

दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा पौषध करना यानी आत्मा का पोषण करना। आजकल सब शरीर का पोषण करते हैं। इन आठ दिनों में आत्मा का पोषण करें। सामायिक प्रतिक्रमण पौषध करें। जिस तरह हार्ट सर्जरी करते हैं,उसी तरह पौषध से आत्मा की सर्जरी होती है। इन आठ दिनों में इंद्रियों को ब्रेक दें। भगवान महावीर ने पर्यूषण की दो जरूरी बातें बताई है सामयिक और पौषध। स यानी साधना-समता की साधना करें, म यानी ममता को छोडं़े। य अर्थात यतना, जीवन में यतना से चलें। क यानी करुणा-सभी जीवों के प्रति दया रखें। दूसरा है पौषध- यह दो प्रकार की होती है-देशा बगासिक और प्रतिपूर्ण पौषध। जिस प्रकार पाटे के चार पायों में से एक पाया नहीं होने से पाटा डगमगाने लगता है इसी तरह डगमग जीवन को संतों के समागम से स्थिर बनाएं। हमारे जीवन से आदर्श और मर्यादा गुम हो गई है। यह हमें समझ नहीं आ रहा है कि हमारा जीवन बनावटी हो गया है। संसार ...

लक्ष्मी भी न्यायवंत मानव के पास स्वत: चली आती है: संयमरत्न विजयज

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजयज ने कहा नदी का प्रवाह जिस तरह बिना किसी उपाय के नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी न्यायवंत मानव के पास स्वत: चली आती है। जिस प्रकार संबंधीजन प्रीति से, तालाब कमलों से, सेना वेगवान घोड़ों से, नृत्य सुरताल से, घोड़े वेग से, सभा विद्वानों से, मुनि शास्त्रों से, शिष्य विनय से और कुल पुत्रों से सुशोभित होता है, वैसे ही राजा न्याय से शोभायमान होता है। इंद्रधनुष के समान चपल कांति वाले प्राण भले चले जाएं, चंचल संपदाएं, पानी के बुलबुले की तरह पिता, पुत्र, मित्र, स्त्री आदि के संबंध भी हमसे दूर हो जाएं, नदी के वेग के समान चंचल शरीर की जवानी एवं गुण भी चले जाएं, लेकिन हमारी कीर्ति फैलाने वाले नीति-न्याय का संग कभी छूटना नहीं चाहिए। नीति कीर्ति रूपी स्त्री को रहने के लिए घर है, प्रसिद्धि पाने वाली है, पुण्य रूपी राजा की प्रिय रानी ह...

आठवें व्रत में भगवान ने अनर्थदण्ड के विषय में बताया है: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि आठवें व्रत में भगवान ने अनर्थदण्ड के विषय में बताया है।  बिना कारण जमीन खोदना, पानी गिराना, अग्नि जलाना, पंखा वगैरा तथा वनस्पति का छेदन भेदन करना। जानबूझकर दूसरों को खोटी ( गलत ) सलाह ( मशविरा ) देना दूसरों को अन्याय अत्याचार पर चलने के लिये उपदेश देना और विवाह आदि प्रसंगों पर आतिशबाजी पटाखे फोड़ना और दूसरों को प्रेरित करना फोड़ने के लिये दूसरों को खुश करने के लिये भांड कुचेष्टा करना और दूसरों की नकल करके हंसाना ये सब अनर्थदण्ड में आता है। बिना कारण बोल-बोल करना ऊखल मुसल तलवार आदि हथियार या औजार बनाने की फैक्ट्री खोलना और उपभोग और परिभोग में आने वाले खाने पीने पहनने-ओढ़ने आदि वस्तुओं का अधिक से अधिक संग्रह करना ये सब अनर्थदंड विरमणव्...

अहंकार छोड़ें, जिनशासन की आज्ञा पालन करें : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

मंगलवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज के प्रवचन कार्यक्रम आयोजित हुआ। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि सुरक्षा हर व्यक्ति चाहता है। परमात्मा कहते हैं कि जो स्वयं के जीवन को सुरक्षित करता है वही सुरक्षित है। परमात्मा की आज्ञा है- हृदय और विचारों से खुला होना चाहिए आचरण और चरित्र में नहीं। जिसका मन और काया, सुरक्षित है वही सुरक्षित है। आज्ञा के बाहर जाने वाले असुरक्षित हो जाते हैं और जो असुरक्षित है वही आज्ञा से बाहर है। आज्ञा देने वाला आज्ञा देने के बाद विश्राम नहीं करते वे स्वयं उसकी परख करते हैं। नेपोलियन का उदाहरण देकर इसे समझाया। गुरु कहते हैं कि यदि नेपोलियन की आज्ञा का उल्लंघन किया तो सैनिक ने अपना एक जीवन खो दिया, लेकिन परमात्मा की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले तो कितने ही जन्म खो देते है...

संसार के समस्त कार्यो को छोडक़र परमात्मा की भक्ति करना सौभाग्यशाली लोगों का काम: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने मंगलवार को कहा कि संसार के समस्त कार्यो को छोडक़र परमात्मा की भक्ति में लगने वाले लोग सौभाग्यशाली होते है। जैनों के लिए नवकार मंत्र 68 तीर्थ का लाभ देने के बराबर होता है। भक्ति के साथ अगर नवकार मंत्र का स्मरण किया जाए तो कहीं जाने की जरुरत नहीं है, बल्कि इससे ही 68 तीर्थ का लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं। उन्होंने कहा कि पंच परमेष्टि की भक्ति स्तुति और इसकी प्रार्थना जब भी करने का मौका मिले तो मन और दिल को उसी में जोडक़र परमात्मा की दिव्य भक्ति का लाभ जीवन में ले लेना चाहिए। ऐसी उत्तम अनन्य भक्ति कर जीवन को परमात्मा की वाणी से जोडऩे का अवसर भाग्यशाली आत्माओं को ही प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि भोजन करने से पहले घर से निकलने से पहले नवकार मंत्र का जाप करना चाहिए। इसका स्मरण किए बिना किसी भी कार्य की शुरुआत ही नहीं करनी चाहिए। यदी मनुष्य अ...

जैसी जिज्ञासा वैसे गुरु ज्ञान मिलेगा: साध्वी धर्मलता

एसएस जैन संघ ताम्बरम में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि जैसी जिज्ञासा होगी वैसे गुरु से ज्ञान मिलेगा। जिज्ञासु ग्रहक है और गुरु व्यापारी। जिज्ञासा और ज्ञान का गहरा नाता है। गुरु रूपी सागर में ज्ञान के अनेक मोती है। शिष्य रूपी गोताखोर को जिज्ञासा रूपी पनडुब्बी से ज्ञान के मोती प्राप्त कर सकता है। जिज्ञासा दो प्रकार की होती है स्व जिज्ञासा और पर जिज्ञासा। खुद को जानना स्व और जगत को जानना परजिज्ञासा है। जो स्व को जान लेता है वो सर्व को जान लेता है। स्व को नहीं जानता उसका ज्ञान अधूरा है। ज्ञान के महल में प्रवेश पाने के लिए जिज्ञासा पगडंडी है। महावीर भगवान के इंद्रभूमि के 11 गणधरों का परिचय जिज्ञासा से ही हुआ। जिज्ञासा ऐसी हो जो हमें मोक्षमार्ग के निकट पहुंचा दे। अपूर्वा आचार्य ने कहा कि इच्छा आकाश के समान अनंत है।धन परिमित है, इच्छा का पूर्ण होना असंभव है। लोभी पुरुष को धन धान्य से भरपूर सार...

ज्ञान का अस्त कभी नहीं होता: साध्वी धर्मप्रभा

एसएस जैन संघ एमकेबी नगर स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि इस लोक में ज्ञान के समान कोई वस्तु नहीं है। भगवान महावीर ने आत्म साधना के लिए ज्ञान को परम आवश्यक माना है। कैवल्य ज्ञान सूर्य प्रकाश से ज्यादा प्रकाश करता है। सूर्य तो मृत्यु लोक प्रकाश देता है पर कैवल्य ज्ञान तीनों लोको को प्रकाशित करता है। सूर्य को बादल ढक सकता है, राहू ग्रस्त कर सकता है और सूर्य अस्त होता है पर कैवल्य ज्ञान का अस्त कभी नहीं होता ज्ञान बिना किया गया कार्य अनैतिक है। ज्ञान श्रद्धावान को प्राप्त होता है। साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि मानव को सदैव उत्तम पुरुषो की संगति करना चाहिए। क्योंकि सज्जनों की संगत हमारे संताप व परिताप का हरण चित्त को शांति प्रदान करती है। आलसी,वैर विरोध रखने वाले और स्वेच्छाचारी का साथ छोड़ देना चाहिए। दुर्जनों का संग देने से सज्जन का भी महत्व गिर जाता है। जीवात्मा को पुण्यों से सज्...

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