श्री गुजराती जैन संघ गांधी नगर बंगलौर में चातुर्मास हेतु विराजमान दक्षिण सूरज ओजस्वी प्रवचनकार डॉ. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने प्रवचन करते हुए कहा कि दीन, दुखी और पीड़ित प्राणियों की अनदेखी करना साक्षात धर्म और परमात्मा का अपमान करने के समान है। हर एक आत्मा में परमात्मा का निवास माना गया है। उसकी सेवा में समर्पित होना चार धामों की यात्रा करने के बराबर है। हर एक धार्मिक स्थान सेवा का केंद्र बने। उन्होंने कहा कि अहिंसा, दया और तपस्या सभी धर्मों से श्रेष्ठ धर्म है, सेवा धर्म सबसे कठिन है। सभी धर्मों की उपासना पद्धति अलग-अलग हो सकती है, परंतु सेवा को सभी धर्मों ने पहला स्थान दिया है। उन्होंने बताया कि यदि कोई प्राणी तड़प रहा हो और हम मौन दर्शक बने रहें, तो यह मनुष्य को धार्मिकता का पात्र नहीं बनने देता। सेवा और सहयोग धर्म के दो स्तंभ हैं। इनके बिना धर्म अधूरा है। उन्होंने कहा कि धर्म कोई भी हो...
प्रवचन – 16.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) भगवंत महावीर स्वामींनी आपल्या मोक्षमार्गावर चालण्यासाठी 12 भावनांचे चिंतन सांगितले आहे. त्यातील दुसरी भावना आहे “अश्रय भावना”. ‘अश्रय’ म्हणजे आधार. आपण नेहमी कोणाचा तरी, कशाचा तरी आधार घेत जगत असतो – पैसा, मान-सन्मान, पद, सत्ता, नातेसंबंध, शरीर, सौंदर्य… पण विचार करा, हे सारे किती टिकणारे आहे? जैन धर्म सांगतो की, ज्याचा आधार बदलता, नश्वर, क्षणिक आहे, तो खरा आधार नाही. खरा आधार तोच, जो शाश्वत, अविनाशी आहे – आणि तो म्हणजे आत्मा व धर्म. उदाहरण १: समजा एखाद्याने आपले घर वाळूत बांधले, तर पहिल्या पावसात ते कोसळेल. पण जर मजबूत दगडावर पायाभरणी केली, तर कितीही वारा-पाऊस आला तरी घर टिकून राहील. तसेच, जर आपण नश्वर गोष्टींवर आधार ठेवला, तर दुःख येणारच. पण जर आपण धर्मावर, आत्मज्ञानावर आधार ठेवला, तर कोणत्याही परिस्थि...
जालना : माणसाने आपल्या मुळाला कधीच विसरले नाही पाहिेजे. कारण जो मनुष्य आपल्या मुळाला विसरतोे तो जैन आहे, वाटत नाही, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, काल राष्ट्रीय सण होता तर आज श्रीकृष्ण जन्माष्टी म्हणजे धार्मिक सण आहे. हमारे जैन परंपरांमें ये त्योहार मनाया जाता है, असे सांगून ते म्हणाले की, जेल और जंगल से जिनकी सुरुवात हुई है, उनका जीवन कैसा रहा होगा, जेलमध्ये जन्म तर शेवट हा जंगलात झाला. त्यांचं मधलं जीवन कसे असेल? हे तुम्ही आम्ही जाणलं पाहिजे. जिसके जन्म से पहिले ही मृत्यू का व...
जालना : भगवान महावीरांना खूप काही अपमान सहन करावा लागला. काठ्यांनी मारहाण त्यांना सहन करावी लागली, आपण तर त्यांच्यापुढे काहीच नाहीत, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, कोणत्या ना कोणत्या कारणाने सद्गुरुंशी जोडून रहा, यही प्रबोध बनता है। विरत्थुई का आनंद अद्भूत है। दुनियाभर में हर हस्थीयोंओं से मिले होगे। पर इस हस्तीओंसे एकबार मिलो, फीर देखो। ये क्या ऐसी वैसी हस्ती नही है । आज फीर ग्यारावी गाथा का उच्चारण उन्होंनें कीया। ते म्हणाले की, मुख्य दोन ग्रह आहेत. एक चंद्र आणि दुसरा सुर्य ! ...
आचार्य महाश्रमण के प्रबुद्ध सुशिष्य मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार जी , मुनि रमेश कुमार जी, मुनि पद्म कुमार जी एवं मुनि रत्न कुमार जी के पावन सान्निध्य में तेरापंथ धर्मस्थल में आयोजित आगम आधारित प्रवचनमाला में गुरुवार को मुनि डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने कहा कि सामायिक नौवां व्रत है, जबकि पौषध ग्यारहवां व्रत है, इसलिए पौषध में सामायिक नहीं पचखी जा सकती है। सामयिक कभी भी की जा सकती है। जबकि पौषध चार प्रहर अथवा अहोरात्र का होता है। पौषध सामायिक के पश्चात शुरू होगा। सामायिक की आलोयना अलग होती है और पौषध की आलोयना अलग होती है। पौषध का त्याग अलग है। पौषध अपने आप में स्वतंत्र है। पौषध बिना उपवास के नहीं किया जा सकता, जबकि रात्रि संवर की साधना खा-पीकर भी की जा सकती है। मुनि रमेश कुमार ने उपस्थित जनमेदिनी को फरमाया – भारत की दो प्राचीन संस्कृतियां रही हैं-वैदिक एवं श्रमण संस्कृति । वेदों में, ईश्वरवाद...
आत्मा को प्रतिष्ठित या अप्रतिष्ठित कुल में जन्म प्राप्त कराने वाला गोत्र कर्म है। ऊँच और नीच कुल का भेद कर्मकृत है, मनुष्यकृत नहीं है। किसी भी व्यक्ति की नीचता या उच्चता के मापदण्ड का आधार धन-सम्पत्ति या सत्ता नहीं है अपितु गोत्र कर्म ही है। इस कर्म की तुलना कुम्हार से की गई है। जैसे कुम्हार छोटे-बड़े अनेक घड़ों का निर्माण करता है वैसे ही आत्मा को ऊँच-नीच गोत्र में पैदा कराने वाला यह कर्म है। अनीति और अधर्म के कारण जिस कुल ने बदनामी प्राप्त की हो वह नीच कुल है तथा जिस कुल ने सत्य, न्याय, सेवा और त्याग से प्रतिष्ठा प्राप्त ही है वह उच्च कुल है। उच्च कुल में रक्त के संस्कार, खानदानी, सभ्यता – संस्कृति की महत्ता एवं भव्यता के संस्कार मिलते हैं, जबकि नीच कुल में कलह, पापाचरण, बेईमानी और स्वभाव की मलिनता के कुटिल संस्कार विरासत में मिलते हैं। गोत्र कर्म की इस उच्चता और नीचता का आधार निरहं...
प्रवचन – 15.08.2025 – प पू श्री मुकेश मुनीजी म सा – (बिबवेवाडी जैन स्थानक) बंधूंनो-भगिनींनो, आज आपण सर्व भारतवासीयांसाठी अत्यंत पवित्र दिवस – 15 ऑगस्ट – स्वातंत्र्य दिन साजरा करीत आहोत. 1947 मध्ये आपल्याला परकीय सत्तेतून मुक्ती मिळाली. हा दिवस आपल्याला केवळ देशाच्या स्वातंत्र्याचीच आठवण करून देत नाही, तर स्वातंत्र्य या संकल्पनेचा खोल अर्थही सांगतो. जैन धर्म आपल्याला शिकवतो की, दोन प्रकारचे स्वातंत्र्य असतात – बाह्य स्वातंत्र्य आणि अंतःकरणातील स्वातंत्र्य . 1. बाह्य स्वातंत्र्य • परकीय सत्तेच्या जुलूमातून मुक्त होणे, आपल्या इच्छेनुसार देशाचा कारभार चालविण्याचा अधिकार मिळणे, हा बाह्य स्वातंत्र्याचा भाग आहे. • या स्वातंत्र्यासाठी आपल्या स्वातंत्र्यसैनिकांनी बलिदान दिले, त्याग केला, तुरुंगवास सहन केला. • आपल्याला मिळालेल्या या स्वातंत्र्याची किंमत प्रचंड आहे. 2. अंतःकरणातील स्वातंत...
श्रमण संघीय उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी म सा, ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म सा, मधुर वक्ता श्री रुपेश मुनि जी म सा के पावन निश्रा में शुक्रवार को 79 वें स्वतंत्रता दिवस पर्व बड़े ही उत्साह और उमंग हर्षौल्लास के साथ श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर के तत्वावधान में मनाया गया। इस अवसर पर दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी ने अपने संबोधन की शुरुआत में सभी श्रद्धालुओं और देशवासियों को 79 वें स्वतंत्रता दिवस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं बधाई देते हुए कहा कि स्वतन्त्रता दिवस यह उन बहादुर स्वतन्त्रता सेनानियों की याद दिलाता है जिन्होंने अपने देश की आजादी के लिए अथाह तन मन धन से संघर्ष किया और अपने भारत देश को गुलामी की जंजीरो से आजाद कराते हुए अपने प्राणों का भी बलिदान कर दिया। उन्होंने कहा कि आज का यह पावन दिवस सभी भारतीयों में गर्व और देशभक्ति की गहरी भावना पैदा करता है। ...
जालना: श्रध्देला वाचवून ठेवावेच लागेल, त्याशिवाय आमच्याकडे दुसरा कोणताही पर्याय नाही, असे वाणीचे जादुगार श्रमण प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा. यांनी येथे बोलतांना सांगितले. ते गुरु गणेश सभा मंडपात चार्तुमासानिमित्त आयोजित विशेष प्रवचनात श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार प.पू. रमणीकमुनीजी म.सा.बोलत होते. यावेळी विचार पिठावर अन्य साध्वींची उपस्थिती होती. पुढे बोलतांना श्रमणसंघीय सलाहकार, वाणीचे जादुगार, प.पू.रमणीकमुनीजी म. सा. म्हणाले की, आपण कल्लू मनाली जाते हो! यहा- वहा जाते हो! जब हम सिध्दालय में जायेंगें तभी हम कोई ना कोई ना तो काम करगें। भगवान महावीर का समोरन कोई कम नही. यही तो है संपूर्ण! सब कुछ यही पर है! बोल रहे सुधर्मा स्वामी की हमारे लिए यही नंदनवन है। आदमी कहा झुकता है! जो उससे जादा हो! धन हो, दौलत हो! इनके पासही आदमी झुकता है! महावीर को अगर बाहर से देखो गे तो, उनमे सब अवगुणही दिखेगे!लेक...
शरीर और शरीर से सम्बन्धित अंग प्रत्यंग के कण-कण की रचना करने वाला नाम कर्म है। यश-अपयश, सुस्वर-दुस्वर और सौभाग्य-दुर्भाग्य भी नाम कर्म की देन है। आत्मा के अरुपी गुण को ढक कर रूपी (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श) शरीर और उससे सम्बन्धित अंग-उपांग प्रदान करना नाम कर्म का कार्य है। जैसे चित्रकार अच्छी-बुरी विविध आकृतियाँ बनाता है, उनमें विभिन्न रंग भरता है और उन्हें सुरूप-कुरूप व सुडौल-बेडौल रूप में चित्रित करता है। इसी भाँति नाम कर्म आत्मा के अच्छे-बुरे विभिन्न रूप बना देता है। इसी कर्म के कारण एक मनुष्य काला-कलूटा या बीभत्स है तो एक सुन्दर एवं चित्ताकर्षक है। नाम कर्म दो प्रकार का है, शुभ नाम कर्म और अशुभनाम कर्म। शुभ प्रकृतियाँ पुण्य रूप है तो अशुभ प्रकृतियाँ पाप रूप हैं। नाम कर्म का स्वरूप जानकर यह भी सिद्ध हो जाता है कि शरीर और शरीर से सम्बद्ध जो भी मिला है, वह परमात्मा द्वारा नहीं अपितु नाम कर्म ...
पावन सानिध्य- गुरुमॉं पु. चंद्रकलाश्रीजी, साध्वी स्नेहाश्री जी, श्रुतप्रज्ञाश्री जी! आज आकुर्डी- निगडी- प्राधिकरण जैन श्रावक संघ के प्रांगण में सामुहिक लोग्गस्स जाप का महामंगलकारी अणुष्ठान संप्पन्न हुआ! “शासनसुर्या” पु. स्नेहाश्रीजी ने यह जाप करवाया! जापके लाभार्थी परिवार थे संघ कोषाध्यक्ष नेनसुखजी मांडोत, जैन कॉन्फ़्रेंस पंचम झोन अध्यक्ष नितीनजी बेदमुथा, विजयजी ओस्तवाल, मनोज जी ओस्तवाल! बड़ी भारी संख्या मे धर्मअनुरागीयो ने इस अनुष्ठान में सहभाग लिया! उपस्थित मान्यवरों का संघाध्यक्ष सुभाषजी ललवाणी एवं उपाध्यक्षा शारदाजी चोरडीया ने स्वागत किया! कल 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर विशेष प्रवचन एवं विशेष देश भक्ति की पहचान विश्वस्त मंडल के विविध प्रस्तुति द्वारा होंगी! समारोह का आयोजन ॲक्टिव ग्रुप के माध्यम से सारिका ओस्तवाल एवं ऑंचल रांका, पल्लवी नहार, आदि के अथक प्रयास से संप्पन्न हो...
श्री गुजराती जैन संघ गांधीनगर में चातुर्मास विराजित दक्षिण सूर्य ओजस्वी प्रवचनकार डॉ श्री वरुण मुनि जी म.सा. ने गुरुवार को धर्म सभा में प्रथम तीर्थंकर परमात्मा श्री ऋषभदेव प्रभु की स्तुति रुप भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से कहा कि तीर्थंकर प्रभु स्वयं तीरते है और साधक भक्त आत्माओं को भी संसार रुपी सागर से तिराने वाले हैं। प्रभु की भक्ति स्तुति से जीवन में मिलने वाले अदभुत लाभों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जिनेश्वर भगवान की श्रद्धा पूर्वक भक्ति में करने से साधक आत्मा के पूर्व संचित कर्म अपने आप ही यों क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं जैसे कि मयूर की ध्वनि मात्र से ही चंदन वृक्षों के ओर लिपटे हुए सर्प अपने अपने बिलों में घुस जाते हैं। भक्ति में इतनी अपार शक्ति होती है। भक्ति एक अमर गुण है। इसलिए यह गुण आत्मा को भी अमर बना देता है। मुनि श्री ने वाणी के जादूगर, श्रुताचार्य उत्तर भारतीय प्रर्व...