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धर्म की फलश्रुति विशिष्ट ज्ञान (सत्य निर्णय) पर आधारित है: मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा.

श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. के प्रवचन ~जहां जहां आंखों से नहीं देख सके ऐसे मिट्टी के, पानी के, अग्नि के, पवन के, वनस्पति के जीवो की रक्षा करना है वहां वहां जिनशासन है ~धर्म की फलश्रुति विशिष्ट ज्ञान (सत्य निर्णय) पर आधारित है। ~ जैन दर्शन यानी जीवन के कोई भी सुख- दुख, रोगी -निरोगी, मान-अपमान सभी अवस्था में स्वयं की आत्मशक्ति से ही जुड़ना है ~ जैन कुल मिलना आसान है लेकिन जैन दर्शन मिलना आसान नहीं है ~ द्रव्य हिंसा से भी ज्यादा फल वाली और भयानक भावहिंसा है ~हमें धर्म की क्रिया करना पसंद है किंतु स्वभाव परिवर्तन करना पसंद नहीं। ~ सबसे बड़ा धर्म यह है कि हमारे स्वभाव, विचार और व्यवहार का परिवर्तन हो। ~ प्रभु महावीर स्वामी ने जगत के सभी जीवो को सुखी बनाने के लिए सर्वप्रथम स्वयं ने ही त्याग, तप ,ध्यान और साधना से आत्मा को निर्मल बनाने का सम्यक मार्ग अपनाया है और बताया है। ~ ...

आप में सुनने का पेंशेंस हैं तो सॉल्यूशन  है, वरना जीवन में प्रॉब्लर्म ही प्रॉब्लर्म है: प्रवीण ऋषि

चातुर्मासिक प्रवचन: टैगोर नगर में प्रवीण ऋषि ने कहा Sagevaani.com @रायपुर जीवन में पेशेंस होना जरूरी है। काेई अगर अपनी बात कह रहा है तो उसे चुपचाप सुनें। सुनने का पेशेंस आपके भीतर आ गया तो सॉल्यूशन मिल जाएगा। अगर आपके अंदर ये नहीं है तो जीवन में प्रॉब्लर्म ही प्रॉब्लर्म है। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। उन्होंने एक प्रसंग बताते हुए कहा, राजा ने महिसार को देश निकाला दे दिया था। महिसार वापस लौटा। पूरा संघ उसे लेकर राजा के पास जाता है। राजा उसे देख रहे हैं। सोचिए कि उन पर क्या बीती होगी कि जिस व्यक्ति जिसे देश निकाला दे दिया गया है, वह राजाज्ञा का उल्लंघन करते हुए उनके सामने खड़ा हो गया है। फिर भी राजा चुप रहे। संघ प्रमुख ने उनसे कहा, महिसार अब अकेला नहीं है। पूरा संघ उसके साथ खड़ा है। ये सुनते ही महिसार को लगा ...

आध्यात्मिकता को अपने विद्यार्थियों की जीवन शैली का हिस्सा बनाने में जुटीं साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

जैन साध्वियों का प्रवचन देने का आकर्षक ढंग जिससे हृदयंगम हो सके समझाइश Sagevaani.com @शिवपुरी। शिवपुरी में चातुर्मास कर रहीं प्रसिद्ध जैन साध्वी रमणीक कुंवर जी और उनकी सुशिष्याएं ओजस्वी प्रवचन प्रभाविका साध्वी नूतन प्रभाश्री जी, नेपाल प्रचारिका और घोर तपस्वी साध्वी पूनमश्री जी, मधुर गायिकाद्वय साध्वी जयश्री जी और साध्वी वंदनाश्री जी का प्रवचन देने का अनोखा अंदाज धर्मप्रेमियों के मन को मोहित कर रहा है। जैन सतियां आध्यात्मिकता का प्रवचन के माध्यम से व्यवहारिक ज्ञान देने की अपेक्षा प्रायोगिक ज्ञान देने में अधिक दिलचस्पी दिखा रही हैं। प्रवचन में वह आध्यात्मिकता की क्लास लेकर श्रोताओं को कनेक्ट करती हैं और इसी दौरान होमवर्क भी देती हैं और दूसरे दिन पूछती हैं कि उन्होंने अपना होमवर्क पूर्ण किया या नहीं। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी बताती हैं कि सिर्फ प्रवचन से श्रोताओं के साथ जुड़ाव नहीं हो पाता, ले...

हर्षित होना या दुखी होना सारा दारोमदार मन पर है : देवेंद्रसागरसूरिजी

Sagevaani.com @चेन्नई. श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी धर्मोपदेश देते हुए कहा कि मनुष्य का सबसे प्रभावशाली अंग मन है। मनुष्य की जीवन-लीला मन से ही चलती है। सारे संकल्प-विकल्प, इच्छाएं-कामनाएं मन की ही उपज हैं। बुद्धि इनकी पूर्ति के लिए क्रियाशील रहती है। भौतिक शरीर में मन कोई अंग नहीं है। यह सूक्ष्म शरीर का अंग है। भौतिक शरीर का अंग तो बुद्धि भी नहीं है, पर बुद्धि को क्रिया करने के लिए तंत्र की आवश्यकता पड़ती है और यह तंत्र है हमारा मस्तिष्क।मन को किसी प्रकार के तंत्र की आवश्यकता नहीं होती, वह सदैव तंत्र के बगैर ही क्रियाशील रहता है। जब भौतिक शरीर होता है तब भी और जब सूक्ष्म शरीर होता है तब भी। निद्रावस्था में सपनों के लिए उत्तरदायी मन ही होता है। इसलिए जब मन उद्विग्न होता है, तब हमें बुरे अवसाद वाले स्वप्न दिखाई देते हैं। वहीं जब मन...

तारकऋषीजी म सा के सुशिष्य आगमज्ञाता परम पूज्य श्री सुयोगऋषीजी म सा

स्वंय के प्रयास के बिना परमात्मा के लाख कृपा के बावजूद बदलाब संभव नहीं: श्री सुयोगऋषीजी म सा जब तक आप खुद स्वंय नहीं बदल सकते खुद के मन से अपने स्वभाव मे व्यवहार मे बदलाव नहीं लाते तब तक दुनिया की कोई भी ताकद आपको नहीं बदल नहीं सकती। परमात्मा प्रभु महावीर अपने शिष्य गौशालक अपने जवाई बेटी को नही बदल सके इसलिए अपने आप में बदलाव लाए। सडके प्रिय बन सको ऐसा व्यवहार आचरण अपना बनाओ। ऐसा पावन संदेश नवकार साधक परम पूज्य श्री तारकऋषीजी म सा के सुशिष्य आगमज्ञाता परम पूज्य श्री सुयोगऋषीजी म सा ने आज आनंद गणेश दरबार में दिया। पूज्यश्रीजी ने आगे आज के सामाजिक परिस्थिती पर सटिकता पुर्वक चिंतन करते हुए कहा की आजकल धर्म के पाठ पर बैढकर साधु संत संघ समाज मे दिवारे खडी कर रहे है । समाज में अशांति तनाव संप्रदायवाद बढा कर समाज को विघटित कर रहे हैं ! आग जलाने से अधिक पाप आग लगाने मे है इसलिए समाज मे संतो का काम...

  हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य  साधना जगुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे समय के साथ चले समय आपका साथ देगा। समय के सही प्रबंध के लिए अपने नियमित देनिंदिनि समय सारणी बनाएं। बंधुओं दुनिया में ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन 25 घंटे हो पर कार्य को व्यवस्थित ढंग से संपादित करके 24 घंटे में 25 घंटे के काम किए जा सकते हैं। ऐसा नहीं कि जब चाहे तब अपने कार्य करें समय की सीमा होती है। समय से कार्य करने वाला एक दिन में सो कार्य को पूर्ण करने में सफल हो जाता है। सुबह जल्दी जगने की आदत डाले मैं सुना करता हूं कि लोग सुबह 8:09 बजे तक उठा करते हैं ऐसा ना करें सूर्योदय के पूर्व जब सुबह के घरों में जाता हूं। बच्चों के बारे में पूछता हूं तो जवाब मिलता है कि बच्चे सो रहे हैं स...

आत्मा में बसे अंतर गुणों की साधना है, आराधना है: साध्वी चन्दन बाला

राजा जी करेडा के जैन स्थानक मे जैन साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा जी ने कहा तपस्या करने वालो को अंतर हृदय से आशीर्वाद दिया है। रिया गन्ना एवं रामलाल जी सोनी की तपस्या पर कहां तपस्या अनंत कर्मो को क्षय कर, आत्मा में बसे अंतर गुणों की साधना है, आराधना है। तपस्या दुख की आ तापना लेकर आत्म सुखों की साधना है। तपस्या करने से न सिर्फ आत्म निर्मल होती है बल्कि कितने ही अनंत कर्मो का क्षय होता है। साध्वी चन्दन बाला ने कहा कीतपस्या अनंत कर्मो को क्षय कर, आत्मा में बसे अंतर गुणों की साधना है, आराधना है। तपस्या दुख की आ तापना लेकर आत्म सुखों की साधना है। तपस्या करने से न सिर्फ आत्म निर्मल होती है बल्कि कितने ही अनंत कर्मो का क्षय होता है। साध्वी आनन्द प्रभा ने कहा वो बहुत भाग्यशाली होते है जो तपस्या का अमृत का रसपान करते है और आत्म को निर्मल कर चंदन के भांति पावन हो जाते है। कहते है जिनकी आराधना सच्ची होती है ...

मनुष्य का जीवन शतरंज के खेल कि तरह है वही वही जीतता है जो धैर्य के साथ खेलता है: साध्वी धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नई। जीवन एक शतरंज है।गुरूवार साहूकार पेठ एस.एस.जैन भवन के मरूधर केसरी दरबार में साध्वी धर्मप्रभा ने श्रध्दालूओ को सम्बोधित करतें हुए कहा कि मनुष्य का जीवन भी शतरंज के खेल से कम नही है। जिस तरह मनुष्य शतरंज को खेलते समय धैर्य रखता है उसी तरह व्यक्ति जीवन में धैर्य सर्तकता और सुझ – बुझ के साथ चले तो संसार के सुखों को भोग सकता है।शतरंज के खेल मे उसकी कि एक गलत चाल जीती हुई बाजी को हरा देती है। परन्तु मनुष्य कब वह हारता है जब जीवन मे सुख ही सुख हो और दुःख आने पड़ इंसान को परिस्थितियों के अनुरूप अपने कदमों को पीछे भी लेना पड़ जाए तो वह हार जाता है। धेर्य साहस और धीरज के साथ चलेगा तो हारी बाजी को जीत मे बदल सकता है। समय को बदलतें देर नही लगती है। कौन अपना है,कौन पराया यह बात मनुष्य को समझ मे आनी चाहिए जो आज है वह कल नही रहने वाला है। सुई जो काम सकती है, वह तलवार नही कर पाए...

जिनवाणी श्रवण करने वाला साधक निश्चित रूप से अपना लक्ष्य निर्धारण करेगा: जयतिलक मुनिजी

गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बन्धुओं जिनवाणी का परम चरम लक्ष्य संसार में मोह में तल्लीन आत्मा को जाग्रत करना है जिनवाणी श्रवण करने वाली सभी आत्मा मोक्ष में गयी है और आगे भी जायेगी इसमें कोई संदेह नही है। जिनवाणी श्रवण करने वाला साधक निश्चित रूप से अपना लक्ष्य निर्धारण करेगा। यदि एक बार मोक्ष जाने की अभिलाषा उत्पन्न हो गयी तो वह अवश्य एक न एक दिन मोक्ष को अवश्य जायेगा।अनादिकाल से जन जन की प्रेरणादायक मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करने को सामर्थ्य केवल जिनवाणी में ही है। सुप्त आत्मा के मन में मोक्ष की अभिलाषा नही होती इसलिए जागृत अवस्था में श्रद्धा के साथ जिनवाणी का श्रवण करो। चरम चक्षुओं की जागृति तो अनादिकाल से कई बार हो गई। भगवान कहते है ये जागृति जागृति नहीं है। वास्तव में जागृति मोह निद्रा से जागरण है। जिनवाणी श्रवण करने की कला न आने से ज्ञान ऊपर से निकल जाता है। इसलिए धर...

जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है: प्रियदर्शना श्री जी

बेरछा नगर की धन्य धरा पर चर्तुमास के अन्तर्गत परम पुज्य साध्वी भगवन्त प्रियदर्शना श्री जी, कल्पदर्शना श्री जी एवं बाल साध्वी लब्धी दर्शना श्री जी की नि श्रा मे उपवास एकासना व आयंबिल की तपस्या निरंतर चल रही है तथा दैनिक प्रवचन चल रहे है । प्रवचन मे बड़ी संख्या मे जैन वअजैन समाज के लोग भाग ले रहे है। विगत दिनो महाराज साहेब ने प्रवचन मे बताया कि मानव जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है। इस जीवन मे धर्म संस्कार को प्राप्त करना बहुत ही जरूरी है । माता पिता बच्चो कई प्रकार की शिक्षा दिलाते है क ई प्रकार के आर्ट सिखाते है उनको होशियार बनाने के लिए पुरा प्रयत्न करते है लेकिन धर्म संस्कार नही दे पाते है बिना धर्म संस्कार के जीवन सुगंध रहित फूल के समान होता है जिसकी कोई किमत नही होती है ।अतः धर्म संस्कार डालना जरूरी है । पिछले दिनो जैन संत श्री काम कुमार नंदी की बर्बरता से की गई हत्याके विरोध मे कहा किसंत...

   धर्म क्षेत्र में शत्रुता का नाश होता है: आगमश्रीजी म.सा.

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया दो तरह के क्षेत्र है धर्म क्षेत्र, शत्रु क्षेत्र। धर्म क्षेत्र में शत्रुता का नाश होता है, युद्घ क्षेत्र में शत्रु का नाश करते हैं। धर्म करने में शूर अरिहंत के सिवा कोई नहीं है। रण में वासुदेव के समान अन्य कोई नहीं वे 360 युध्द करते हैं। क्रिया करो प्रतिक्रिया मत दो, एक्शन की रिएक्शन मत दो शत्रुओ के बीच रहकर भी उनसे डटकर सामना करो। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने श्रावक के गुणों का वर्णन किया, गीतिका पेश की। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने बताया कि श्राविका मंडल में गुप्त एकासन का आयोजन रहा।संचालन मंत्री हस्तीमल बाफना ने किया।

पानी बदलने से फल नहीं बदलता: प्रवीण ऋषि

चातुर्मासिक प्रवचन: सम्यक और मिथ्यात्व दृष्टि का अंतर बताते हुए प्रवीण ऋषि ने कहा-  Sagevaani.com @रायपुर। बीज जैसा होता है, वैसा ग्रहण करता है। करेला और गन्ना एक ही जमीन पर उगते हैं। जमीन से एक तरह के पोषक तत्व लेते हैं। पानी लेते हैं। सूरज से ऊर्जा भी उन्हें समान मिलती है। इसके बावजूद एक कड़वा होता है और एक मीठा होता है। सम्यक और मिथ्यात्व दृष्टि में अंतर है। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में गुरुवार को उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि पानी बदलने से फल नहीं बदलता। जमीन बदलने से फल नहीं बदलता। यह बीज का सामर्थ्य है कि उसे क्या बनना है। रोजमर्रा की जिंदगी में आप एक शब्द का इस्तेमाल अक्सर करते हैं। मुझे किसी ने नजर लगा दी। मेरे बच्चे को किसी ने नजर लगा दी। मेरे व्यापार पर किसी ने नजर लगा दी। इस तरह की बातें आने पर मेरे अंतर्मन में...

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