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जो रिश्ते श्रद्धा से जुड़ते हैं, उन्हें मौत भी समाप्त नहीं कर सकती : प्रवीण ऋषि

साधु-संतों की शरण में हमें शांति का अनुभव होता है : बृजमोहन अग्रवाल Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि कुछ लोग दूसरों को ठोकर खाता देख सुधर जाते है, और कुछ लोग खुद ठोकर खाकर सुधरते हैं। क्या सोच होती है जिसके कारण से व्यक्ति सागर में डूबता नहीं है, तिर जाता है। यह सोच कोई किसी को खरीदकर नहीं दे सकता है। आप गुरु से बोध ले सकते हैं, लेकिन उस बोध को समझने की दृष्टि स्वयं के अंदर पैदा करनी पड़ती है। इस बोध को जगाने का प्रयास है महावीर के एक श्रावक की कथा। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के 12वें दिवस शनिवार को भाजपा विधायक व पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी लालगंगा पटवा भवन पहुंचे और प्रवीण ऋषि महाराज के दर्शन कर और उनका आशीर्वाद लिया। बृजमोहन अग्रवाल ने प्रवीण ऋषि महाराज का दर्शन कर प्रवचन लाभ लिया। उन्होंने कहा...

चार शरणागति स्वीकार करने से कर्म के फल हल्के होते हैं – आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीजी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में कहा कि अपने हित की बात सुनकर उसे स्वीकार कर लेनी चाहिए। इसके लिए कुछ बलिदान भी करना पड़े तो वह कर लेना चाहिए। आज की स्थिति यह है कि हम केवल सुख की बात स्वीकार करते हैं, हित की बात को नहीं। आप यदि सुनेंगे तभी स्वीकार करेंगे, स्वीकार करेंगे तभी आचरण में लाएंगे।‌ उन्होंने कहा कर्मोदय का असर हमारे ऊपर पड़ता है, तब हम दुःखी होते हैं। आत्म शरणागति और परमात्म शरणागति से कर्म के फल हल्के होते हैं।‌ उस समय अरिहंत, सिद्ध, साधु, धर्म, इन चार की त्रिकाल शरणागति लेनी चाहिए। इससे कर्मों के नए अनुबंध भी बंद हो जाते हैं। जब हमारे पास दुःख आता है तो यह समझना कि कर्मसत्ता ने छोटा दुःख दिया है, बड़े दुःख को रोक लिया है। ‌उन्होंने कहा प्रभु कभी दुःख देते नहीं हैं, वे दुःख का निवा...

कर्म जीवन का आधार है और आत्मा का श्रंगार है और कर्मो से ही होगा आत्मा का उध्दार: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com/Chennai। कर्म जीवन का आधार है और आत्मा का श्रंगार है और कर्मो से ही होगा आत्मा का उध्दार।शनिवार को साहुकारपेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि अपने विचारों पर नियंत्रण रखो, नहीं तो वे तुम्हारा कर्म बन जाएंगे और अपने कर्मो पर तुमने नियंत्रण नहींं रखा तो ये भाग्य बनकर तुम्हारी आत्मा को संसार मे अटका देगें । इस सृष्टि में कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किए नहीं रह सकता है। चाहें विचारों के माध्यम से हो या क्रिर्या के द्वारा जीव-जंतु हों या मनुष्य,कोई भी अकर्मण्य नहीं है और न ही कर्म किए बिना रह सकता। क्योंकि कर्म ही सब कुछ है। ये कर्म ही हमारे जीवन की दिशा और दशा तय करता है। जो मनुष्य कर्मयोग की कला को जानकर कर्म करता है वही व्यक्ति संसार से अपनी आत्मा को मुक्ति दिला पाएगा। साध्वी स्नेहप्रभा भगवान महावीर कि अंतिम दिव्य देशना श्रीम...

दीपोत्सव पर विशेष राशन वितरण

  श्री जैन महासंघ, चेन्नई के तत्वावधान में पिछले 33 वर्षो से *दीपावली पर विशेष खाध्यान्न वितरण किया जाता है, इस वर्ष दिनांक 5-11-2023 रविवार को प्रातः 4-00 बजे से प.पू. आचार्य श्री जयन्तसेन सूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य रत्न श्रुत प्रभावक प पू मुनिराज श्री वैभवरत्नविजयजी म सा आदि ठाणा की निश्रा में गणमान्यगणों की गरिमामय उपस्थिति में विभिन्न संस्थाओं व पूण्यशालीयों के शुभ हस्ते वितरण किया जाएगा।* *साधर्मिक भक्ति स्वरूप दीपावली पर विशेष सहयोगी श्री बनासकांठा पालनपुर जैन एसोसिएशन, श्री सी पी जे एम मानव सेवा समिति, राजस्थान कॉस्मो कल्ब फाउन्डेशन, मारवाड़ी युवा मंच चेन्नई मेट्रो एवं वुमेन्स विंग, पीपल फ़ोर पीपल लाभार्थियों को जोड़ने में सहयोगी, संघवी पानीदेवी मोहनलालजी मुथा माण्डवला, श्रीमती सोहनकंवर मांगीलालजी तातेड चेरिटेबल ट्रस्ट, वेपेरी, सेठ श्री भवरलालजी अजितकुमारजी गोठी ब्यावर, मे. सराव...

अभुख्वाहणा -जो निरन्तर चलती रहे: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि अभुख्वाहणा -जो निरन्तर चलती रहे। भगवान ने उत्तराध्ययन के रूप में सारी साधना का निचोड किया है आठवां अध्ययन में कापिलीय का वर्णन है उसने ऐसा क्या किया जो भगवान ने जन-जन को शिक्षा देने के लिए उत्तराध्ययन सूत्र में वर्णन किया। हर बात का समाधान प्राप्त करने के लिए विधा चाहिये। व्यक्ति को महत्व इसलिए दिया जाता है कि उनके पास ज्ञान है जो ज्ञानी है उनको कोई रोक नहीं सकता। ज्ञानी का अर्थ है सीमित शब्दों में कुछ भी कहना। ज्ञानी से ही सन्देह, शंका का समाधान करते है । संसार का अटल सत्य है जो जन्मेगा वो मरण को प्राप्त करेगा। तीर्थकरों का शरीर भी शाश्वत नहीं है तीर्थकरों का शरीर विशिष्ट पुद्‌गलो से बना हुआ है 34 अतिशय से युक्त है लेकिन तीर्थकरों को भी शरीर छोडना पड़ता है। शरीर नहीं पूजा जाता है । मनुष्यता ही पूजी जाती है प...

जीवन का अर्थ समझिए: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि उत्साह भरा हो जीवन हर लम्हा जीवन का अर्थ समझिए जीवन को उसके अर्थ प्रदान कीजिएl रो रो कर जीवन जीना जीवन जाए चार दिन का हो या 40 वर्ष का हो जब तक जिए प्रत्येक क्षण को आनंद भाव से जी आनंद आत्मा का मौलिक स्वभाव हl अपने स्वभाव को उपलब्ध कीजिए हम किसी के क्रोध का सामना करते हो भी मस्त रहे हैं और प्रेम से भी यदि कोई हम वर्जित क्यों थे तब भी हम तो अपनी मस्ती में ही मस्त रहेंगेl कोई गुस्सा करें तब भी रोटी खाना आना छोड़ें यदि हमें गुस्सा आज भी जाए तो ऐसा ना करना कि किसी अलग कमरे में जाकर बैठ गएl जैसे कि पहले रानी आपको भवन में बैठ जाया करती थी तनाव नहीं गुस्सा नहीं चिंता नहीं हाल-चाल में मस्त रहे बहुत उत...

श्री कृष्ण तो मैत्री भाव के प्रतीक है: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैंl बंधुओं जैसे कि सखा हो तो कृष्ण सुदामा जैसा जिस प्रकार की सुनिए जीवन में आप मित्र बनना चाहते हैं तो अपने से बेहतर लोगों को ही मित्र बनाएंl अगर कॉलेज में पढ़ते हैं युवक यूवतिया को दोस्त बनाएं पर अपनी सीमाएं जरूर रखें दोस्ती के बीच अगर आप सीमाएं नहीं रखते हैं तो यह मर्यादा मित्रता मित्र और आपके अपने घर दोनों के लिए विनाश का कारण बन सकता हैl ढेर सारे मित्रों को एकत्र करने का कोई औचित्य नहीं है अगर वह आपके विकास में सहायक ना बन सकेl आपको पता है कि अर्जुन और श्री कृष्णा में अच्छी मित्रता थी यदि गुरु शिष्य का भाव था भगवान भक्त का भाव था इसकी अतिरिक्त तीसरा भाव थाl शखा भाई मित्रता का भाव जिसके कारण कृष्ण जैसे...

अपेक्षा की उपेक्षा करनी चाहिए : देवेंद्रसागरसूरि

Sahevaani.com /चेन्नई. श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि आज व्यक्ति का जीवन इतना जटिल हो गया है कि तनाव के कारण खुशी के दो पल भी अपने लिए निकालना कठिन हो चुका है। इसका एक कारण यह भी है कि हमने खुशी, सुरक्षा, आश्रय सबकी अपेक्षा दूसरों से या बाह्य जगत से कर रखी है। इसलिए अधिकतर लोगों के दर्द की मूल वजह अपेक्षा ही है। अपेक्षाओं के कई रूप होते हैं। फिर भी इंसान इनकी पूर्ति का प्रयास करता रहता है। खुश रहने के दो ही रास्ते हैं-अपनी सच्चाई पर विश्वास रखें और अपेक्षाओं में कटौती करें। अपेक्षा करें, लेकिन अपने आप से। अपेक्षाओं का निर्धारण अपनी सीमाओं में रहकर करें, दृढ़प्रतिज्ञ हो जाएं। दरअसल हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती एक व्यक्ति को उसके मूल स्वभाव और रूप में स्वीकार करने की ह...

आवश्यक क्रियाओं को जो छोड़ते हैं, वे धर्म से दूर होते जाते हैं – आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा.

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केसरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि आराधना को मोक्ष तक सक्रिय रखने के लिए छः आवश्यक निरंतर करना जरूरी है। उन्होंने कहा ज्ञान सुषुप्त होता है, उसको सक्रिय करने के लिए क्रिया आवश्यक है। आवश्यक क्रियाओं को छोड़ने वाले सांसारिक व्यक्ति से भी खराब कर्मी है। आवश्यक क्रिया परमात्मा का बताया हुआ मार्ग है। ज्ञानी कहते हैं आप धर्मी की निंदा करते हो तो आपका सम्यक्त्व संदेह के घेरे में है। कषायों को सक्रिय नहीं करना प्रसन्नता है। उन्होंने कहा जगत में अच्छे लोग ही सबको अच्छे लगते हैं। पाप की दुनिया में भी ईमानदार लोगों को ही पसंद किया जाता हैं। उन्होंने कहा सारी प्रवृत्तियों में कहीं न कहीं भौतिक सुख छुपा हुआ है। अध्यात्म सुख का आनंद समकिती ही लेता है परंतु भौतिक सुख का आनंद भी समकिती ही ले सकता है। ...

साध्वी पूनम श्री के साथ 40 दिन की तपस्या करने वाले श्रावक श्राविकाओं का हुआ बहुमान

साध्वी जी ने इसके पूर्व 45 दिन का सिद्धी तप भी किया था, जैन समाज ने तपस्या की अनुमोदना की तपस्वी रत्ना की उपाधि से अलंकृत प्रसिद्ध जैन साध्वी पूनम श्री जी ने 40 दिन की तपस्या कर प्राचीन काल में परदेशी राजा द्वारा की गई तपस्या को दोहराया। उनकी तपस्या का अनुकरण कर युवा पीयूष कर्नावट ने भी 12-12 बेले (दो उपवास) की तपस्या की और अंतिम बार एक तेला कर तपस्या की पूर्णाहुति की। पीयूष कर्नावट के अलावा श्रावक अशोक गूगलिया और श्राविका बहिन श्रीमती पुष्पा गूगलिया, कु. मंजूलता गुगलिया, श्रीमती शशिकांता गूगलिया, श्रीमती सुधा कास्टया, श्रीमती रीता गुगलिया और श्रीमती वीणा दूधेरिया ने भी उपवास के स्थान पर 12-12 एकासनें और तीन लगातार एकासनें कर अपनी तपस्या पूर्ण की। तपस्या पूर्ण होने पर जैन श्वेताम्बर श्री संघ, चार्तुमास कमेटी, श्वेताम्बर मूर्ति पूजक संघ और ब्राह्मी बहूमण्डल ने तपस्वी श्रावक और श्राविकाओं का...

जो अपना अतीत जानता है वही अपना भविष्य तय कर सकता है: प्रवीण ऋषि

लालगंगा पटवा भवन में बह रही महावीर के अंतिम वचनों की अमृत गंगा आज के लाभार्थी परिवार : गौतमचंदजी नीलेश बोथरा परिवार, प्रकाशचंद महेंद्र कुमार गोलछा परिवार एवं श्रीमती प्रेमलता प्रकाशचंद सुराना परिवार Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा जो अपने अतीत को जनता है, वह अपने भविष्य का निर्णय कर सकता है। मृगापुत्र ने अपने अतीत को जाना, कि कैसे उसके अशुभ में से शुभ का जन्म होता था और शुभ में से अशुभ का। कैसे उसने पुण्य में जीते हुए नर्क के बीज बो दिए थे, और उसके शुभ में से नर्क का जन्म हो गया था। और कैसे उसने नर्क में रहते हुए शुभ के बीज बोये, जिसके कारण उसे संयम मिला। उसने शुभ-अशुभ का चक्र देखा था, और अपने अंतर मन में तय किया कि अब मेरे शुभ में से शुभ नहीं शुद्ध जन्मेगा। मेरे अशुभ में से न शुभ जन्मेगा न अशुभ जन्मेगा, बस सिद्ध जन्मेगा। और यही जीवन का सबसे गहरा रहस्य है। उक्ताशय क...

कर्मफल से स्वंय भगवान भी नहींं बच पाऐ और नाही कोई प्राणीं बच सकता है: महासती धर्मप्रभा

Sagevaani.com /चैन्नई। कर्म भगवान को भी नहींं छोड़ते है। शुक्रवार साहुकारपेट जैन भवन मे महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रध्दांलूओ को सम्बोधित करतें हुए कहा कि कर्मफल भोगने से स्वंय भगवान नहींं बच सके तो अन्य संसारिक जीवों की क्या बिसात है जो वह कर्मो से बच पाएंगे। संसार में कर्म ही प्रधानता है कर्मो का फल तो लोगों को भोगना ही पड़ता है,चाहे वह इस जन्म में भोगे या अगले जन्म में भोगें बिना संसार से छुटकारा नहीं मिल सकता है। दुनिया ऐसा को प्राणी नहीं हुआ है जिसने कर्म से बचकर संसार से मुक्ति पाई हो। बिना भुगतान किये कर्म पीछा नहीं छोड़ते है चाहे हंस भुगते या रोकर कर्म किसी को भी नहीं बख्शते है। मनुष्य कर्म बांधते वक्त यह सोचता है उसे कौई नही देख रहा है लेकिन कर्मो के एक नहीं असंख्य आंखे है लाख जतन करले मनुष्य पर कर्म छिपाऐ छिपने वाले नहीं है। साध्धी स्नेहप्रभा ने श्रीमद उत्तराध्ययन सूत्र...

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