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अभुख्वाहणा -जो निरन्तर चलती रहे: जयतिलक मुनिजी

अभुख्वाहणा -जो निरन्तर चलती रहे: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि अभुख्वाहणा -जो निरन्तर चलती रहे। भगवान ने उत्तराध्ययन के रूप में सारी साधना का निचोड किया है आठवां अध्ययन में कापिलीय का वर्णन है उसने ऐसा क्या किया जो भगवान ने जन-जन को शिक्षा देने के लिए उत्तराध्ययन सूत्र में वर्णन किया।

हर बात का समाधान प्राप्त करने के लिए विधा चाहिये। व्यक्ति को महत्व इसलिए दिया जाता है कि उनके पास ज्ञान है जो ज्ञानी है उनको कोई रोक नहीं सकता। ज्ञानी का अर्थ है सीमित शब्दों में कुछ भी कहना। ज्ञानी से ही सन्देह, शंका का समाधान करते है । संसार का अटल सत्य है जो जन्मेगा वो मरण को प्राप्त करेगा। तीर्थकरों का शरीर भी शाश्वत नहीं है तीर्थकरों का शरीर विशिष्ट पुद्‌गलो से बना हुआ है 34 अतिशय से युक्त है लेकिन तीर्थकरों को भी शरीर छोडना पड़ता है। शरीर नहीं पूजा जाता है । मनुष्यता ही पूजी जाती है पात्र को देखकर ही ज्ञान देना । ज्ञानी को ज्ञान मिलता है तो अपनी कर्मों की निर्जरा कर सकता है।

ज्ञानचंद कोठारी ने संचालन करते हुए सूचना दी कि भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में 11, 12, 13 नवंबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों को तेले तप की‌ आराधना करना है।

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