यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्मबन्धुओ :- निरोगी काया अति पुण्यवाणी से मिलती है। पुण्य कर्म जीव के तन, मन, वाणी तीनो का सुख प्रदान करता है। जब तक पुण्योदय है काया में कोई रोग नही होता है।
पाप कर्म के उदय से सर्दी, खांसी, ज्वर आदि अन्य रोग होते है। संसार के समस्त रोग चाहे बड़ा हो या छोटा असाता वेदनीय के उदय से आते है जिससे जीव को वेदना भोगनी पड़ती है। जो पाप में रचे पचे होते है जिन्हें भगवान की वाणी पर श्रद्धा नहीं है उन्हे दुर्गति में जाना पड़ता है। डर से पाप छूटता नही अपितु डर से ज्यादा पाप करते है। जीते जी जीव का महत्व नहीं है। ये संसार मात्र दिखावटी है जैसे माता-पिता के देहान्त के बाद उनकी फोटो को माला चढ़ाते है। हाथ जोड़ते है परन्तु जीवित माता पिता की सेवा नही करते उनको साता नही पहुँचाते। ‘जैन कुल के जैन समाज लाखों करोड़ो रुपए गायो के देख रेख के लिए खर्च करते है। पुण्यवान जीव अपनी पुण्यवाणी की वृद्धि करता है वो पाप में लगने वाले धन को भी जीव दया में लगा देता है। अच्छे कार्य में धन लगाने के बाद मन में किंचित मात्र भी पश्चाताप नही करना चाहिए। अच्छे कार्यों में लगा पैसा आपके लिए जमा-पूंजी है क्योंकि पुण्य में खर्च किये पैसे का फल आपको किसी भी गति मे चले जाओ जरूर मिलेगा।
भीख मांगने वाला भिखारी, भी यह सीख देता है कि पूर्व भव में मैने धन आमोद प्रमोद में खर्च कर दिया अच्छे कार्य में खर्च नहीं किया इसलिए आज मुझ भिखारी को दर दर भटकना पड़ रहा है। जैसे मरुदेवी माता ने इतनी पूर्वभव पुण्यवाणी संचित की थी कि उन्हें मरुदेवी के भव में न स्वयं की काया का और न अन्य किसी जीव का दुख देखना पड़ा इसलिए ज्ञानी कहते है यदि आप दुख नही चाहते तो आप दूसरो को कभी दुःख मत दो सभी जीवों पर अनुकम्पा रखो। संसार में एक मात्र धर्म पाप से छुटकारा दिलाने में समर्थ है। और ऐसा सुख प्रदान करता है जो वापस कभी जाता नही अर्थात मोक्ष प्रदान करता है। संसार स्वार्थी है पुत्र दुःख उदय में आने पर पत्नी, परिजन सभी छोड़ चले जाते है। इसलिए व्यक्ति संसार में रहते हुए भी यदि श्रावक व्रत की आराधना भी शुद्ध रूप से कर लें तो परम कल्याणकारी हो जाता है। पाप का पैसा बेशर्मी से बिना सोचे समझे कमाया हुआ धन बेशर्म पौधे के सामान है जो तालाब को सुखा देता है।
नैतिकता से कमाया धन सरोवर में खिले कमल के समान है जो शोभित होता है कभी समाप्त नही होता ऐसा धन व्यक्ति को धर्म से जोड़े रखता है। चार्तुमास “काल में आयु बधं होता है इसलिए इस काल में धर्म ध्यान करो शुभ भाव में रमण करो जिससे अच्छी गति मिले। सांप डसता है तो एक जन्म नष्ट होता है परन्तु पाप तो अनन्त जन्म को नष्ट करता है इसलिए ज्ञानी जन कहते है कि डरना है तो पाप से डरो