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जो रिश्ते श्रद्धा से जुड़ते हैं, उन्हें मौत भी समाप्त नहीं कर सकती : प्रवीण ऋषि

जो रिश्ते श्रद्धा से जुड़ते हैं, उन्हें मौत भी समाप्त नहीं कर सकती : प्रवीण ऋषि

साधु-संतों की शरण में हमें शांति का अनुभव होता है : बृजमोहन अग्रवाल

Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि कुछ लोग दूसरों को ठोकर खाता देख सुधर जाते है, और कुछ लोग खुद ठोकर खाकर सुधरते हैं। क्या सोच होती है जिसके कारण से व्यक्ति सागर में डूबता नहीं है, तिर जाता है। यह सोच कोई किसी को खरीदकर नहीं दे सकता है। आप गुरु से बोध ले सकते हैं, लेकिन उस बोध को समझने की दृष्टि स्वयं के अंदर पैदा करनी पड़ती है। इस बोध को जगाने का प्रयास है महावीर के एक श्रावक की कथा। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी।

उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के 12वें दिवस शनिवार को भाजपा विधायक व पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी लालगंगा पटवा भवन पहुंचे और प्रवीण ऋषि महाराज के दर्शन कर और उनका आशीर्वाद लिया। बृजमोहन अग्रवाल ने प्रवीण ऋषि महाराज का दर्शन कर प्रवचन लाभ लिया। उन्होंने कहा कि आज कोई भी सुखी नहीं है, लेकिन साधु-संतों की शरण में हमें सुख शांति की प्राप्ति होती है। उन्होंने समाज के प्रबुद्धजनों से मुलाकात भी की और समाज के साथ ही छत्तीसगढ़ को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। वहीं लाभार्थी परिवार गौतमचंदजी नीलेश बोथरा परिवार, प्रकाशचंद महेंद्र कुमार गोलछा परिवार तथा श्रीमती प्रेमलता प्रकाशचंद सुराना परिवार सरदावाले ने तिलक लगाकर श्रावकों का लालगंगा पटवा भवन में स्वागत किया।

उपाध्याय प्रवर ने धर्मसभा को संबोधित करते प्रभु महावीर के समय में घटी एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पाणित श्रावक व्यापर के लिए विदेश गया था। वहां एक सेठ ने उसे अपने जंवाई बना लिया। व्यापारी जब समुद्र के रास्ते वापस लौट रहा था, तो समुद्र में ही पुत्र का जन्म हो गया।

बच्चे ने जन्म से ही खुला आकाश और विशाल समुद्र देखा। उसका नाम रखा गया समुद्रपाल। एक बार समुद्रपाल अपने घर की छत पर बैठा था। नीचे एक अपराधी, जिसे फांसी की सजा मिली थी, उसे घुमाया जा रहा था। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि मृगापुत्र ने एक मुनि को देखा और उसके मन में संयम की भावना जागी, लेकिन जरुरी नहीं है कि जागने के लिए किसी श्रवण को देखा जाए। जिसे जागना होता है तो वह किसी अपराधी को देख कर भी जग जाता है। महावीर के समय सजा एक संदेश देती थी कि कोई किसी को दंड नहीं देता है, उसका अपराध ही उसे दण्डित करता है। समुद्रपाल ने देखा, उसने सोचा कि यदि मैंने ऐसा किया तो मुझे भी ऐसा ही भुगतना पड़ेगा। मेरे अंदर ही मेरे पाप के बीज मुझे सजा देंगे। अगर पाप के फल नहीं लेने है तो मुझे अपने अंदर पाप के बीज नहीं बोन हैं। मुझे महावीर के बीज बोन होंगे। और जैसे ही स्वयं के चिंतन में डूबा, उसने प्रमाद नहीं किया और प्रभु की राह पर चल पड़ा।

उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जिनशासन में रिश्ते किसी शैतान को भी भगवान बना देते हैं। जन्मों-जन्मों के होते हैं रिश्ते जो जीना जानते हैं उनके लिए। जो तन से जुड़ते हैं वो मौत के साथ बिछड़ जाते हैं, जो श्रद्धा से जुड़ते हैं, उन रिश्तों को मौत भी समाप्त नहीं कर सकती है। उत्तराध्ययनसूत्र का अध्याय 22 श्रद्धा के रिश्तों की अहमियत बताते हैं। इस कथा में अरिष्टनेमि व राजुल की कहानी है। जिस जन्म में अरिष्ठनेमि परमात्मा की आत्मा ने बोधि की प्राप्ति की, उसी जन्म से एक चेतना के साथ रिश्त बना वो थी राजुल। हर जन्म में रिश्ता रहा तो राजुल के साथ रहा। जिस जन्म में अरिष्ठनेमि ने तीर्थंकर नाम का बंद किया उस जन्म में भी वो साथ हैं। रिश्ते जब गहरे होते हैं तो तीसरा आ कर टकरा सकता है, लेकिन उन रिश्तों को तोड़ नहीं सकता है। एक ऐसी त्रिकोणीय कहानी है, जो तीनो आत्माओं को मोक्ष में ले जाती है। द्वारिका नगरी है, अरिष्ठनेमि बारात लेकर राजुल के घर पहुंचे हैं विवाह करने के लिए। लेकिन रास्ते में उन्हें क्रंदन सुनाई दिया, वे रुक गए और देखा कि बाड़े में कई पशु-पक्षी क्रंदन कर रहे हैं। उन्होंने पूछा तो बताया गया कि तुम्हारे विवाह के निमित्त से इनकी मौत होने वाली है।

अरिष्ठनेमि ने सोचा कि मेरी वजह से इतने प्राणियों की मौत होने वाली है, उसने सभी पशु-पक्षियों को मुक्त करने का आदेश दिया, अपना रास्ता बदला और योगी बन गया। राजुल को जब पता चला तो वह दुखी हो गई। उसने भी योगन बनने का मन बना लिया। अरिष्ठनेमि का भाई रथनेमि भी राजुल से प्रेम करता था। उसने देखा कि अब मेरे पास अवसर है, तो वह राजुल के पास पहुंचा और उसे अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करने लगा। लेकिन राजुल ने उसे ठुकरा दिया और साधना के पथ पर चल पड़ी। रथनेमि इससे व्यथित हो गया और उसने भी साधना का पथ अपना लिया। वह सोचता था कि इस बहाने वह राजुल के करीब आ सकता है। लेकिन जन्म-जन्म का रिश्ता ऐसे ही नहीं टूट सकता। वह बहुत प्रयास करता है, लेकिन अंत में उसे भी बोध होता है, और तीनो एक साथ मोक्ष के पथ पर आगे बढ़ जाते हैं।

आज के लाभार्थी परिवार :

रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने बताया कि रायपुर की धन्य धरा पर 13 नवंबर तक लालगंगा पटवा भवन में उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना होगी जिसमे भगवान महावीर के अंतिम वचनों का पाठ होगा। यह आराधना प्रातः 7.30 से 9.30 बजे तक चलेगी। उन्होंने सकल जैन समाज को इस आराधना में शामिल होने का आग्रह किया है। उन्होंने बताया कि 5 नवंबर के लाभार्थी परिवार हैं गौतमचंदजी सम्पतकुमारजी झाबक परिवार, तिलोकचंदजी शांतिलालजी अशोककुमारजी बरडिया परिवार, शांति-चंदन महेंद्र-अलका मुकीम परिवार, ख़ुशी संगीता संजय गोलेछा परिवार एवं भंवरलालजी अशोककुमारजी योगेशकुमारजी मुकेशकुमारजी पगारिया परिवार। श्रीमद उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के लाभार्थी बनने के लिए आप रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा से संपर्क कर सकते हैं।

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