Sagevaani.com /Chennai। धर्म की पाल बांधने से जीवन संवरता है और आत्मा को मोक्ष । मंगलवार साहुकारपेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने श्रावक-श्राविकाओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि संसार मे जितनें भी महापुरुष हुए उन्होंने धर्म की शरण लेकर अपनी आत्मा को मोक्ष दिलवाया। संसार में भक्ति का मार्ग मनुष्य के लिए मोक्ष की प्राप्ति के द्वार खोलता है परंतु भक्ति पूर्ण लगन से होनी चाहिए। भक्त पूरी तरह से स्वयं भी भगवान की शरण में सौंप दे। सांसारिक बातों से कोई मोह न रखें तो वह धर्म की पाल को बांधकर अपनी आत्मा को मोक्ष दिलवा सकता है।व्यक्ति को भाग्यवादी न बनकर कर्मवादी बनना चाहिए।अच्छा और सात्विक आचरण एवं अच्छे कर्मों के द्वारा ही व्यक्ति इस जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। मनुष्य को यह नहींं सोचना चाहिए कि दुसरें क्या कर रहे है उसे स्वंय की सोच रखकर अपनी आत्मा के उत्थान का लक्ष्य लेकर धर्म के सहारा...
Sagevaani.com /चैन्नई। दृढ़ निश्चय और लक्ष्य नहीं है तो मनुष्य जीवन मे सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है।सोमवार जैन भवन साहुकारपेट के मरूधर केसरी दरबार में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रोताओं को सम्बोंधित करतें हुए कहा कि जीवन मे सफलता वही इंसान प्राप्त कर सकता है और दुविधा मे रहने वाला जीवन में लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता है। काम कोई भी हो उसमें सफलता तभी मिलती है जब उस काम को करने के लिए दृढ़ निश्चय किया जाए। बिना सोचे-समझे शुरू किया गया काम कभी भी पूरा नहीं किया जा सकता।समय को व्यर्थ करने वाला मनुष्य कभी भी जीवन में ऊंचाई या सफलता नहीं पा सकता। अपने आपको पूरी तरह लक्ष्य के प्रति समर्पित और एक ही नीति पर चलने वाला जीवन में लक्ष्य प्राप्त करता है। मनुष्य की सोच अच्छी है और इरादे बुंलद है,तो वह कभी भी असफल नहींं हो सकता है। जीवन में दुःख और कठिनाइयों के आने बावजूद वह गलत मार्ग पर न...
भगवान ने बताया कि ज्ञानी और सम्यक ज्ञान का आराधक होता है पूज्यनीय Sagevaani.com /शिवपुरी ब्यूरो। दीपावली की रात्रि को मोक्ष गमन से पूर्व भगवान महावीर ने 48 घंटे तक धर्मदेशना दी थी। जो उत्तराध्यन सूत्र में वर्णित है। उत्तराध्यन सूत्र के 11 वें अध्याय में भगवान महावीर स्वामी ने ज्ञानी और अज्ञानी व्यक्ति की पहचान बताई थी। भगवान ने बताया था कि ज्ञानी और सम्यक ज्ञान का आराधक पूज्यनीय होता है। केवल सिद्धी और विद्या प्राप्त करने से ज्ञानी नहीं हुआ जा सकता। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने कमला भवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी जयश्री जी और साध्वी वंदना श्री जी ने प्रभू भक्ति से पूरे सभा स्थल को आध्यात्मिकता के रंग से सराबोर कर दिया। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने बताया कि भगवान महावीर ने फरमाया है जो व्यक्ति अहंकारी, क्रोधी, आलसी, प्रमादी और रोगी होत...
नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि भगवान ने समय मात्र के प्रमाद का निषेध किया है। एक समय भी अनन्त संसार का परिभ्रमण बढ़ा सकता है यदि प्रमाद में व्यतीत किया हो तो ज्ञानीजन कहते है कि जो समय का मूल्य जानता है वास्तव में वही पण्डित है। गौतम गणधर एक क्षण का प्रमाद नहीं करते थे सदैव भगवान के चरणों में रहते, ज्ञान पिपासु रहते, फिर भी उनके मन में संशय आ गया कि मैं सिद्ध बुद्ध मुक्त होऊंगा या नहीं। महत्व ज्ञान चारित्र दर्शन का होता है अतिशय का नहीं । वन्दन पद को नहीं ज्ञान, दर्शन और चारित्र और तप को किया जाता है। भगवान ने गौतम गणधर के संशय का निवारण करते हुए कहा कि तुम्हारा मेरे प्रति जो राग है वही तुम्हारे सिध्द-बुद्ध होने में बाधक है। गणधर गौतम लब्धि कै भण्डार है ऐसा संसार में कोई दुसरा वर्तमान में नहीं । संसार में हर वस्तु आसानी से उपलब्ध हो सकती है पर मनुष्य जन्म संसार में बह...
किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केसरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में आत्मा के विनय गुण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सब गुणों का मुख्य द्वार विनय है। यह गुण तीर्थंकर बनने के बाद भी अपनाते हैं। तीर्थंकर परमात्मा के दो तरह के विनय होते हैं, पहला कृतज्ञता के रूप में अशोक वृक्ष की तीन प्रदक्षिणा देना। परमात्मा को जिस वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त होता है, उसी वृक्ष की रचना उनके समवसरण में होती है। दूसरा है तीर्थ को शिक्षा देने का विनय। श्रमण- श्रमणियों का विनय उत्कृष्ट गुणवत्ता का बताया गया है। साधु के विनय के तीन स्वरूप होते हैं पहला, वह आचार्य की आज्ञा का पालन करे, दूसरा वह गुरु की आंखों का इशारा समझे और तीसरा, वह गुरु के समीप रहे। गृहस्थ में ऐसा विनय कभी देखने को नहीं मिलता। गृहस्थ अपेक्षा भी अस्थानीय रखते हैं। विनय करने वाले शिष...
उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के 14वें दिवस उपाध्याय प्रवर ने बताई अष्टप्रवचन माता की महिमा Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि कैसे कोई केशी श्रमण और इंद्रभूति बनता है? भगवान पार्श्वनाथ और महावीर ने उन्हें क्या सीख दी थी? जिस सीख से कोई केशी श्रमण और इंद्रभूति बनता है, जिनशासन में उसे प्रवचन माता कहते हैं। परमात्मा ने आठ आयाम की प्रवचन माता कही है। एक माँ में ये आठ आयाम होने चाहिए, तभी उनकी संतानें केशी श्रमण और इंद्रभूति बनती है। और ये आठ आयाम जीवन को किस ऊंचाई पर ले जाते हैं, इसका वर्णन सुधर्म स्वामी श्रुतदेव आराधना के 24, 25 व 26वें अध्याय में किया है। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के 14वें दिवस सोमवार को उपाध्याय प्रवर ने विजयी जीवनशैली और खुशहाल परिवार के बारे में बताया। आज के लाभार्थी परिवार श्रीमती र...
Sagevaani.com /चैन्नई। मनवांछित इच्छित फल प्राप्त होता है पैंसठिया यंत्र के जाप करने पर ।रविवार को साहुकार पेठ जैन भवन में 108 पैंसठिया जाप के दौरान महासती धर्मप्रभा ने जाप करने वालें श्रावक-श्राविकाओं को सम्बोधिंत करतें हुए कहा कि भारतीय परंपरा में मंत्र स्त्रोत्र आदि का बहुत बड़ा महत्व है। जैन धर्म में अनेक मंत्र स्त्रोत्र जो स्वयं में सिद्ध एवं चमत्कारी हैं। पैंसठिया यंत्र ऐसा विशिष्ट यंत्र है जो आधी व्याधि और उपाधि का नाश कर व्यक्ति के जीवन में समाधि प्रकट करता है इसका विधिवत साधना कर व्यक्ति अपने इच्छित फल को प्राप्त कर सकता है और अपने सिद्धि का द्वार खोल सकता है। यह यंत्र आत्मा को नव्यता दिव्यता और भव्यता प्रदान करता है।पैंसिठिया के जाप करने से कैंसर जैसे रोग खत्म हो जाते हैं, परंतु उसके लिए भावना और श्रद्धा शुद्ध रखकर विश्वास के साथ जाप करता है तो वह अपने रोग और दुःखों से छुटकारा पा...
आज रविवार 5 नवम्बर 2023 को रत्नवंश के प्रथम आचार्य पूज्यश्री गुमानचंद्रजी म.सा का स्मृति दिवस श्री जैन रत्न हितैषी श्रावक संघ तमिलनाडु के तत्वावधान में स्वाध्याय भवन, साहूकारपेट, चेन्नई में जप-तप-त्याग पूर्वक सामायिक स्वाध्याय दिवस के रुप मे मनाया गया | लीलमचन्दजी बागमार, गौतमचंदजी मुणोत ने श्री गौतममुनिजी म.सा द्वारा रचित प्रभु महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्ययन सूत्र के नवमें अध्ययन नमि प्रव्रज्या अध्ययन की सुन्दर रागपूर्वक स्तुति की | कांतिलालजी तातेड़ रुपराजजी सेठिया ने महावीर चालीसा की स्तुति की | श्रावक संघ तमिलनाडु के कार्याध्यक्ष आर नरेन्द्रजी कांकरिया ने जोधपुर में अखेराजजी – चैनाबाई के यहां जन्में गुमानचंद्र का बाल्यकाल व माताश्री के वियोग हो जाने पर मेडता में कुशलचंद्रजी म.सा के पास वैराग्य को प्राप्त करने के पश्चात अपने पिताश्री के संग दीक्षा लेने वाले रत्नवंशीय प्रथम आचार्य...
Sagevaani.com /चेन्नई. बिन्नी के नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में बिराजमान आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरीश्वरजी महाराज एवं मुनि श्री महापद्मसागरजी महाराज को 2024 के आगामी चातुर्मास के लिए मयलापुर के श्री वासुपूज्यस्वामी मूर्तिपूजक जैन संघ चातुर्मास की विनती लेकर उपस्थित हुआ. भाव भरे चातुर्मास निवेदन से प्रभावित होकर आचार्यश्री ने रविवार को उपस्थित श्रद्धालुओं के सामने मयलापुर चातुर्मास के लिए स्वीकृति प्रदान की। जैसे ही चतुर्मास की घोषणा हुईं, वैसे ही सर्वत्र उल्लास छा गया। इस मौके पर आचार्य श्री ने कहा कि जैन धर्म पूर्णतः अहिंसा पर आधारित है। जैन धर्म में जीवों के प्रति शून्य हिंसा पर जोर दिया जाता है। जैन धर्म के अनुसार बारिश के मौसम में कई प्रकार के कीड़े, सूक्ष्म जीव जो आंखों से दिखाई नहीं देते वे सर्वाधिक सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में मनुष्य के अधिक चलने-उठने के कारण इन जीवों को ...
उत्तराध्ययन श्रुतदेव आराधना के 13वें दिवस उपाध्याय प्रवर ने सिखाई संवाद की कला Sagevaani.com /रायपुर। प्रवीण ऋषि ने कहा कि दो तीर्थंकरों की शक्तियों का स्रोत जब मिल जाता है तब एक युग में परिवर्तन आ जाता। संवाद की कला आती हो तो कितनी भी पुरानी समस्या हो, समाधान मिल जाता है। समाधान प्राप्त करने के, संवाद करने के सहज सरल सूत्रों को प्रदान करता यह श्रुतदेव हम सभी से इस भावना के साथ कि अपने अंदर में इंद्रभूति गौतम की भक्ति का भाव जागृत करें। प्रभु को स्वीकार करने वाले, लेकिन उनकी राह पर नहीं चलते वाले और प्रभु के प्रति भक्ति रखते हुए उनके शासन में नहीं आने वाले भगवन पार्श्वनाथ के विशाल संघ को इंद्रभूति गौतम महावीर के संघ में समर्पित कराते हैं। इंद्रभूति गौतम की इस कला की, सोच की आज हमें आवश्यकता है। अपने अंदर के केशी श्रमण को जगाएं, किसी भी नई बात का, किसी नए व्यक्ति का स्वागत करने में समर्थ जग...
नार्थ टाउन के ए यम के यम स्थानक में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि आत्म बंधुओ :- जिनशासन में दीक्षा का यानि ‘संयम का बहुत बड़ा महत्व है। क्योंकि संयम ही मोक्ष का मार्ग है, जीवन की अनिवार्य क्रिया है । गृहस्थ एवं साधु दोनों के लिए संयमी होना आवश्यक है। शरीर को रोगो का घर न बनाना हो तो मर्यादा करो संयमी बनो । संयम से असातावेदनीय कर्म, मोह कर्म दोनो वश में हो जाते हैं। इसलिए जिनेश्वर ने आठ कर्मो को जीवन के लिए संयम को महत्व दिया है। एक शरीर के पालन के लिए जीवन भर आरम्भ सारम्भ करना पड़ता है। जीतने ज्यादा भोग है उतने ज्यादा रोग होते है इसलिए भगवान कहते है । भोग उपभोग की मर्यादा करो। शरीर को ज्यादा भोजन की आवश्यकता नहीं पर जिह्वा को ज्यादा की चाह रहती है इसलिए व्यक्ति बिना प्रायोजन खाता रहता है। जहाँ ज्यादा भोग की अभिलाषा रहती है वहाँ रोग टिका रहता है। संसार में तीन हर...
किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान में रविवार को गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा. के द्वितीय सूरिमंत्र पीठिका एवं साध्वी हितार्थरत्नाश्रीजी के भद्रतप की पूर्णाहुति के उपलक्ष्य में श्री गौतमस्वामी पूजन एवं सूरिमंत्र वंद्नावली का आयोजन किया गया। इस आयोजन के लाभार्थी गजेश निपा हीरालाल शाह परिवार थे। कार्यक्रम में धीरज निब्जिया ने संगीत की मार्मिक प्रस्तुति दी। इस मौके पर आचार्यश्री ने कहा कि जिस प्रकार भावों में उपशम भाव, तप में आयंबिल, व्रत में ब्रह्मचर्य, आराधना में सर्वविरति श्रेष्ठ हैं, उसी तरह मंत्रों में नवकार मंत्र और सूरिमंत्र एवं गुरु में गौतम स्वामी श्रेष्ठ है। सूरिमंत्र गौतम स्वामी के पूर्वकाल से चला आ रहा है। उन्होंने कहा जाप पहले स्वयं की भूमिका और फिर जाप की भूमिका बनाकर करना चाहिए। ज्ञानी कहते हैं तू तेरी भूमिका बना, फिर जाप के लिए भूमिका बना। स्वय...