9 फैकल्टी के 500 ट्रेनर्स के साथ सकल जैन समाज होगा शामिल Sagevaani.com /रायपुर (वीएनएस)। 5 माह का चातुर्मास अपने अंतिम दौर में है, और लालगंगा पटवा भवन में शिखर दिवस की तैयारी चल रही है। वहीं अर्हम विज्जा की 9 फैकल्टी के 500 ट्रेनर्स भी सर्टिफिकेशन कोर्स के लिए पहुंचे हैं। यह पहली बार नहीं है कि लालगंगा पटवा भवन में कोई कार्यक्रम बिना किसी उल्लास और उमंग के मनाया जा रहा है। इस चातुर्मास में रायपुर श्रमण संघ के सदस्यों ने हर पल को यादगार बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है, तो फिर चातुर्मास का समापन कैसे अछूता रहेगा। शिखर दिवस की तैयारियां जोर-शोर से चल रही है। 25 नवंबर की सुबह 7 बजे विवेकानंद नगर से अर्हम विज्जा की विजय यात्रा प्रारंभ होगी, जिसमे अर्हम विज्जा के 500 ट्रेनर्स और सकल जैन समाज शामिल होगा। वहीं 24 नवंबर की शाम 7 बजे से रात्रि 9 बजे तक गुरुभक्ति का कार्यक्रम लालगंगा पटवा भवन में आ...
ए यम के यम स्थानक नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने कहा कि अतिथि संविभाग व्रत का निरुपण भगवान ने किया। कहते हैं श्रावक के 12 व्रतों को सुनकर समझकर अपनाना चाहिए। व्रत पालन से जीवन धर्म के निकट रहता है। धर्म से ही जीवन सुन्दर व सार्थक लगता है। धर्म के बिना जीवन का कोई महत्व नहीं। संसार में रहते हुए भी जीवन में धर्म व्रत अवश्य धारण करना चाहिए। धर्म के बिना जीवन प्रिय नहीं लगता। धर्म व्रत धारण करने से संसार में सम्मान बढ़ता है। श्रावक भी धर्म पालन से मोक्ष मार्ग की ओर आगे बढ़ता है। धर्म पालन से व्रत अंगीकार करने से जीवन मर्यादित होता है। जिससे संसार के बहुत सारे पाप खत्म हो जाते हैं। जिससे सभी जीव सुखी होते हैं धर्म ध्यान करने से अभयदान की वृद्धि होती है। धर्म सभी के लिए कल्याणकारी व हितकारी है। अतिथि यानि जिसके आने की तिथि निश्चित न हो। परंतु आज परिवर्तन आ गया है। पहले बिना सुचना के अति...
उन्होंने बताया जीवन में कर्मों का खेल और इससे मुक्त होने के उपाय Sagevaani.com /शिवपुरी ब्यूरो। संसार में जीवन चलाने के लिए कुछ न कुछ गलत काम और पाप करने होते हैं, लेकिन पाप करते समय उसमें अपने मन को मत लगाओ वहीं धर्म मन लगाकर करो। बिना मन के धर्म किए जाने का कोई अर्थ नहीं है। उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने स्थानीय कमला भवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने भगवान महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्यन सूत्र का वाचन करते हुए जीवन में कर्मों का क्या महत्व और प्रभाव है इसे विस्तार से समझाया और कर्मों से मुक्त होने के उपाय भी बताए। धर्मसभा में साध्वी वंदनाश्री जी ने कभी खुशियों का मेला है, कभी आंखों में पानी है। जिंदगी और कुछ नहीं सुख दुख की कहानी है, भजन का गायन कर माहौल को भक्ति रस की गंगा से सराबोर कर दिया। साध्वी नूतन प्रभाश्री जी ने आ...
श्री सुमतिवल्लभ मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने धर्म उपदेश देते हुए कहा कि आत्मसम्मान एक सफल सुखी जीवन का आधारभूत तत्व है। व्यक्ति आत्मसम्मान के अभाव में सफल तो हो सकता है, बाह्य उपलब्धियों भरा जीवन भी सकता है, किंतु वह अंदर से भी सुखी, संतुष्ट और संतृप्त होगा, यह संभव नहीं है। आत्मसम्मान के अभाव में जीवन एक गंभीर अपूर्णता व रिक्तता से भरा रहता है। यह रिक्तता एक गहरी कमी का अहसास देती है और जीवन एक अनजानी- रिक्तता, एक अज्ञात पीड़ा, असुरक्षा और अशांति से बेचैन रहता है। आत्मसम्मान का बाहरी उपलब्धियों और सफलताओं से बहुत अधिक लेना-देना नहीं है। आत्मविश्वास स्वयं की सहज स्वीकृति, स्व-प्रेम और स्व-सम्मान की व्यक्तिगत अनुभूति है, जो दूसरों की प्रशंसा, निंदा और मूल्यांकन आदि से स्वतंत्र है। वस्तुत: आत्मविश्वास व्यक्ति का अपनी नजरों में अपना मूल्यांकन है और अपनी मौलिक अद्वित...
सर्टिफिकेशन के लिए देशभर से 9 फैकल्टी के ट्रेनर्स पहुंचे लालगंगा पटवा भवन Sagevaani.com /रायपुर। 5 माह का चातुर्मास अपने अंतिम दौर में है, लालगंगा पटवा भवन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि के मुखारविंद से श्रावक पुच्छिंसुणं (वीर स्तुति) आराधना का लाभ ले रहे हैं। इस दौरान देशभर से अर्हम विज्जा के लगभग 400 से 500 ट्रेनर्स लालगंगा पटवा भवन पहुँच चुके है। अर्हम विज्जा के इतिहास में पहली बार एक साथ 9 फैकल्टी के ट्रेनर्स का सर्टिफिकेशन कोर्स एक ही छत के नीचे होने जा रहा है। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी है। पुच्छिंसुणं (वीर स्तुति) आराधना के 9वें व अंतिम दिवस गुरुवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर ने कहा कि चार प्रकार की फिलॉसॉफी (तत्त्वज्ञान) है। जीवन में प्रायः जो समस्या आती है वह चार प्रकार से आती हैं। और इन समस्याओं का समाधान जानना है तो आपको यह स...
नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में कहा कि श्रावक धर्म एक प्रकार से साधक को तारने वाला, पाप को अल्प कराने वाला और ज्यादा से ज्यादा समय आत्म साधना, त्याग तप आदि में लगाने वाला है। श्रावक धर्म यही प्रेरणा देता है कि अपने आपको आत्मा से जोडो और संसार से निवृत हो। संसारी जीव जो पाप करने में लगा है उसे सीमित करने का निर्देश श्रावक धर्म देता है। सागर जितनी मर्यादा को तालाब जितनी तालाब जितनी मर्यादा को कुएँ जितनी करने का निर्देश सिमीत करने का निर्देश बारह व्रतों में मिलता है। देसवागासिक व्रत में श्रावक का विचार और ज्यादा सामायिक करने का व रात्रि संवर करने का हो जाता है। इस प्रकार अपनी आवश्यकताओं को और कम करते हुए बिना प्रयोजन के कार्यों को छोड़ अपना समय सामायिक प्रतिक्रमण करते हुए धर्म ध्यान को बढ़ाता है। पोरसी, डेढपोरसी, दो पोरसी एकासन आदि करते हुए तप करने लगत...
श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन मूर्तिपूजक जैन संघ में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि हमें अपने सपने साकार करने के लिए कड़ी मेहनत और अपने समय का सही उपयोग करने की जरूरत है। सफलता केवल उन्हें ही मिलती है जो इसके काबिल होते हैं। लोग अपने सपनों को साकार करने के लिए अपने समय का सही इस्तेमाल और कड़ी मेहनत और उसी के अनुसार काम करते हैं। असफलता भी सफलता का ही एक हिस्सा है। हमें अपनी असफलता से निराश होने की जरुरत नहीं है, बल्कि हमें अपनी असफलता से सीखने की जरुरत है। हमने कहां गलतियां की है उसे पहचान कर उसे ठीक करने की जरुरत है। इससे हमने जो गलतियां की है उस गलती को हम सही कर सकते है। सफलता के मायने सबके लिए अलग-अलग होते हैं। किसी के लिए यह एक अच्छी स्थिति तो किसी के लिए अधिक सम्पत्ति या धन प्राप्ति करना है। मेरे अनुसार वास्तविक सफलता वो...
Sagevaani.com/चैन्नई। संसार में सांसो का कोई भरोसा नहींं दुसरी सांस आऐ भी या नहीं आऐगी कोई भी बता नहीं सकता है।मंगलवार साहुकारपेट जैन भवन में महासती धर्मप्रभा ने आयोजित धर्मसभा में श्रोताओं को धर्मसंदेश प्रदान करतें हुए कहा कि समय अमूल्य है और जीवन क्षणभंगुर है और मनुष्य शरीर की नश्वरता को जानतें हुए भी संसार के क्षण मात्र के सुख को पाने की चाह में वो परलोक के सुख को खो रहा है। जबकि संसारी सुख से आत्मा को सुख नहींं दुःख मिलता है आत्मा को तब सुख मिल सकता है जब मनुष्य अपने मोह को छोड़ेगा तभी वह परलोक के सुख को प्राप्त कर सकता है। भगवान महावीर स्वामी के प्रथम शिष्य गौतम स्वामी को मोह के कारण देर से केवलज्ञान प्राप्त हो पाया था। हमारा मोह घटेगा नहींं तब तक है हमारी आत्मा संसार से तिर नहीं सकती है और नाही आत्मा को मुक्ति मिलने वाली है। जितना हमारा मोह बढ़ेगा उतनी ही बार संसार की अलग-अलग जीवा योनि...
यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि जिनेश्वर भगवान ने सकल जीवों को धर्म मार्ग का निरुपण तारने के लिए किया। श्रुत यानि सुनना, चारित्र यानी आचरण करना। कुछ विशिष्ट आत्मायें होती है जिनके पास जन्म से ही ज्ञान होता है ऐसी भवि आत्माएं ही मोक्ष गामी होती हैं। मोक्षगामी आत्माओं से जो वचन श्रवण किये जाते है वो वानी जिनवाणी कहलाती है। जीवन तभी सफल होता है जब कर्म बन्धनों को तोड़ आत्मा सिध्द बुद्ध होती है। आत्मा का संसार घटता बढ़ता रहता है जब संसार घटता है तो आत्मा उच्च गति में जाती है और संसार बढ़ता है तो नीच गति में जाती है ये उच्च नीच गति में जाना ही संसार है। संसार परिभ्रमण से बचने के लिए भगवान ने आगार व अणगार धर्म का निरुपण किया। जीव अभ्यास करने के लिए श्रावक के व्रतों को अपनाता है। मूल व्रत एक ही है। जैसे वृक्ष के मूल से वृक्ष के अन्य भाग पेड़, पत्ती, शाखा...
Sagevaani.com /रायपुर। उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि समय बड़ा मूल्यवान है। इस संसार ने उत्कृष्ठ स्थित दो जगहों की है, एक है 33 सागरोपम और दूसरी है सर्वार्थ सिद्धि विमान की। इन दो जगहों की स्थिति उत्कृष्ट है। लेकिन दोनों ही स्थितियों का बंद है। 33 सागरोपम को लवसप्तम कहा गया है। सात श्वास का एक प्राण होता है, सात प्राण का एक स्तोक होता है और सात स्तोक का एक लव होता है। आज के समय में लव सप्तम का मतलब है 7 से 8 मिनट। इस समय अंतराल में 33 सागरोपम का आयुष बनता है, शुभ और अशुभ दोनों। अगर मनुष्य लोक में इतना समय सर्वार्थ सिद्धि विमान के देवताओं के पास होता तो वे सीधे मोक्ष में जाते। कोई गलती नहीं, ज्ञान में कमी नहीं, कमी केवल इतनी कि उन्होंने साधना 7 मिनट देरी से शुरू की। अगर उनके पास 7 मिनट का और आयुष होता तो वो मोक्ष में जाते। 7 मिनट का आयुष नहीं रखने के कारण उन्हें 33 सागरोपम में रहना पड़ता...
Sagevaani.com /रायपुर। सुधर्मा स्वामी की अनुभूति जिन शब्दों में अक्षुण्य है, उन्ही शब्दों के माध्यम से परमात्मा महावीर के उस अक्षर स्वरुप को जानने के लिए लालगंगा पटवा भवन में पुच्छिंसुणं आराधना अनवरत जारी है। जंबूस्वामी की जिज्ञासा को शांत करने के लिए सुधर्मा स्वामी ने जिस स्तोत्र की रचना की थी, उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि में मुखारविंद से श्रावक उसका रसपान कर रहे हैं। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय प्रवर ने कहा कि यदि आपसे पूछा जाए कि सबसे सर्वश्रेष्ठ वृक्ष कौन सा है तो आप क्या उत्तर देंगे? प्रायः लोग कहेंगे कि कल्पवृक्ष सबसे श्रेष्ठ है। ज्यादातर हम उस पेड़ को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं जिसमे फूल-फल लगते हैं। यदि आपसे कहा कहा जाए कि ज्ञान को उपमा देनी है, तो उसके लिए हमारे पास सूर्य है, ज्योति है। लेकिन सुधर्मा स्वामी ने जब परमा...
हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान हैl वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैंl बंधुओं जैसे कि वर्धमान जैन स्थानक वासी भायंदर मैं कल हमारे यहां पर विराज सत्य साधना जी महाराज साहब अर्हत ज्योति जी महाराज साहब तन्मय श्री जी महाराज साहब हित साधना जी महाराज साहब हर्ष प्रज्ञा जी महाराज साहब गुरु छाया जी महाराज साहब सौम्य ज्योति जी महाराज साहब आदि 7 ठाणा के सानिध्य में उप वर्तनी संथारा प्रेरिका सत्य साधना जी महाराज साहब की 50वी दीक्षा जयंती बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाई गईl हमारे संघ के अध्यक्ष मोहनलाल जी सिसोदिया मंत्री बाबूलाल जी दूगड़ कोषाध्यक्ष श्री दिनेश जी कोठारी, हस्तीमल जी, पोखरना सुरेश जी कागरेचा, संपत जी पामेचा, कृष्ण जी तलेसरा भुरीलाल जी इटोदिया, रतन जी नागोरी, उमेश जी सिसोदिया, भगवती लाल जी...