- नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में कहा कि श्रावक धर्म एक प्रकार से साधक को तारने वाला, पाप को अल्प कराने वाला और ज्यादा से ज्यादा समय आत्म साधना, त्याग तप आदि में लगाने वाला है। श्रावक धर्म यही प्रेरणा देता है कि अपने आपको आत्मा से जोडो और संसार से निवृत हो।
संसारी जीव जो पाप करने में लगा है उसे सीमित करने का निर्देश श्रावक धर्म देता है। सागर जितनी मर्यादा को तालाब जितनी तालाब जितनी मर्यादा को कुएँ जितनी करने का निर्देश सिमीत करने का निर्देश बारह व्रतों में मिलता है। देसवागासिक व्रत में श्रावक का विचार और ज्यादा सामायिक करने का व रात्रि संवर करने का हो जाता है।
इस प्रकार अपनी आवश्यकताओं को और कम करते हुए बिना प्रयोजन के कार्यों को छोड़ अपना समय सामायिक प्रतिक्रमण करते हुए धर्म ध्यान को बढ़ाता है। पोरसी, डेढपोरसी, दो पोरसी एकासन आदि करते हुए तप करने लगता है। छब्बीस बोलो को 14 नियम में दिन भर की मर्यादा कर दसवें व्रत में करता है। भोजन बनाने का विवेक रखते हुए द्रव्य की मर्यादा करनी चाहिए।