Blog

संबंध रखो पर बंधन मत रखो: आगमश्रीजी म.सा

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने बताया संबंध रखो पर बंधन मत रखो, संतों का सम्मान होना चाहिए ना कि अनादर। कीर्ति ध्वज मुनि के माध्यम से बताया। संत अपनी क्रिया, ज्ञान, तप में रत रहता है फिर भी परिषह आने पर अपनी समाधि भाव में रहते हैं। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने बताया दो अक्षर का लक, ढाई अक्षर का भाग्य, तीन अक्षर का नसीब, साडे तीन अक्षर का किस्मत, यह चारों भी कारगर बनते हैं। तब चार अक्षर का मेहनत शब्द इसके साथ जुड़ जाता है तो बताया आलसी मत बनो। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने स्वागत किया। मंत्री हस्तीमल बाफना ने संचालन किया

ज्ञान से पुण्य का उदय होता है ओर अज्ञान मनुष्य के पाप व भय को जन्म देता है: साध्वी धर्मप्रभा 

 Sagevaani.com @चैन्नाई। ज्ञान से पुण्य का उदय होता है और अज्ञान मनुष्य के पाप व भय को जन्म देता है। सोमवार को साहूकार पेठ के जैन भवन मे मरूधर केसरी दरबार मे साध्वी धर्मप्रभा ने प्रवचन में फरमाया कि संसार में ज्ञान से बड़ी कौई भी वस्तु नहीं हैं।ज्ञान और अज्ञान मनुष्य के जीवन में नदी के दो तट कि तरह है। एक का उद्देश्य जीवन-लक्ष्य की खोज है तो दूसरे का आत्मा को ज्ञान से भटकाना है। मनुष्य ज्ञान को धारणकर आत्मा को उज्जवल बनाकर मानव जीवन को बना सफल बना सकता है, जबकि अज्ञान का साथ जीते -जी कितनी ही बार मनुष्य को कलंकित करता है और अस्तित्व को शून्य में मिलाकर अपमान की गर्त में धकेलकर आत्मग्लानि से भर देता है। ज्ञान ही देवत्व का मार्ग है, जो शांति, दया, उपकार, संतोष, प्रेरणा व उत्साह का सृजनकर मनुष्य को सन्मार्ग की ओर ले जाने में सहायक बनाकर आत्मा को परमात्मा मे विलय करवा सकता है। साध्वी स्नेहप्रभा...

कर्म ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण भी करते है ओर पतन भी: साध्वी प्रितीसुधा 

Sagevaani.com @शास्त्री नगर भीलवाड़ा। कर्म किसी को भी नहीं छोड़तें है। अहिंसा भवन में प्रखर वक्ता साध्वी प्रितीसुधा ने प्रवचन मे श्रध्दालुओं को धर्मसंदेश प्रदान करतें हुए कहा कि संसार में कर्म बलवान होते है बिना भोगे कौई भी जीव संसार से छुटकारा नही पा सकता है । जब तक उसकेपुण्य प्रबल रहते है,उग्र पाप का फल भी तत्काल नही मिलता। जब पुराने पुण्य खत्म होते ही तब हमारे अशुम पाप कर्मो की बारी आती है। ओर उन अशुभ पाप कर्मो को भोगना ही भोगना पड़ेगा। कर्म ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण करते है ओर पतन भी, परमात्मा के वहा पर देर हो सकती है परन्तु अंधेर नहीं है सजा भोगनी ही पड़ेगी, चाहे धनवान हो या गरीब कौई भी भगवान कि नजरों से नहीं बच सकता है। हमारे कर्म, विचार और भावना के अनुसार ही हमें सुख या दुःख की जीवन मे प्राप्ति देतें है। साध्वी संयम सुधा ने कहा कि इंसान के अच्छे बुरे कर्म ही उसके साथ जाएंगे। मनुष्य ...

धर्म की सुरक्षा ही वास्तविकता से स्वयं की सुरक्षा है: मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.

     🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय श्री अभिधान राजेंद्र कोष भाग7* ~ यदि हमे जीवन में धर्म रक्षा, राष्ट्र रक्षा करनी है तो हमें सर्वप्रथम धर्म, राष्ट्र को सत्य रूप से समझना ही चाहिए। ~ जो मानव धर्म, राष्ट्र, समाज, परिवार की महत्वता समझता है वह उनके हित के लिए सब कुछ बलिदान दे ही सकता है। ~ हमारे मन में पैसा, हीरा, सोना का महत्व होता है इसलिए सुरक्षा होती है वैसे ही जीव की, धर्म की महत्वता होगी तो उसकी सुरक्षा भी होगी। ~हमारे (शरीर, वचन, मन) का उपयोग यदि धर्म की श्रेष्ठता के लिए हो रहा है तो (शरीर, वचन, मन )निख...

भोग मे नही, त्याग मे सुख है: प्रकाश मुनिमी मासा

पुज्य प्रवर्तक की प्रकाश मुनिमी मासा. — जीवन साधना के लिये मिला के भोग के लिये मिला? भव परम्परा से जीव चलता है, आयुष्य पुरा हुआ शरीर को छोड़कर जाना। परमात्मा का उपदेश मुख्यतः मनुष्य के लिये, मनुष्य में बुद्धि ज्यादा होती है। मतलब जुगाड़ – जुगाड में बुद्धि का उपयोग होता है, मनुष्य सुनकर मनन करके जीवन में उतार सकते है। परमात्मा की वाणी मनुष्य के लिये है,। 🔰 10 वे आश्चर्य में एक आता है कि *भगवान महावीर स्वामी की पहली देशना खाली गई*, केवल ज्ञान के बाद उनको बोलना ही है, मोन खुलता है, मनुष्य नहीं थे , देवता और तिर्यंच थे। भगवान पावापुरी पधारे, 11 गणधर 4400 शिष्यों के साथ यज्ञ कर रहे थे। आर्यवृत्त में ,11 पंडितो का नाम चलता था। भगवान रातभर विहार करके यहाँ आये। छदमस्तों के लिये प्रतिबंध है रात्रि को विहार नही करना , *सुनना सबकी करना मनकी,* देखा देखी क्यो ? देखा देखी वृत वाले की करो, साधु...

लोगों को योग-साधना से जोड़ने जैन समाज ने निकाली ध्यान मंगल यात्रा 

 टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन से धूमधाम से निकाली गई यात्रा  Sagevaani.com @रायपुर. उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि जी महाराज साहब चातुर्मास के लिए रायपुर पधारे हैं। नित्य प्रवचन में वे महावीर गाथा के जरिए समाज को सार्थक जीवन जीने की राह दिखा रहे हैं। अर्हम विज्जा शिविर में लोगों को ध्यान और साधना के जरिए पर्सनल, सोशल और प्रोफेशनल लाइफ का मैनेजमेंट भी सीखा रहे हैं। इन शिविर से लोगों को जोड़ने के लिए सोमवार दोपहर 2 बजे टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन से ध्यान मंगल यात्रा निकाली गई। धार्मिक प्रतीक चिन्ह साथ लेकर चल‌ रही समाज की सैकड़ों महिलाएं और पुरुष लोगों से आह्वान कर रहे थे कि जीवन को बेहतर बनाने अर्हम विज्जा के तहत आयोजित शिविर में हिस्सा लें। रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने बताया कि अर्हम विज्जा का मतलब है परम शक्ति का जागरण। गुरुदेव इन शिविर के जरिए लोगों के भीतर छिपी प्रत...

दु:ख में भी आत्मोन्मुखी रहने वाला होता आत्मार्थी: गच्छाधिपति जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

★ श्रद्धा रुपी पात्रता की योग्यता बढ़ाने की दी प्रबल प्रेरणा ★ तपस्या, साधना के आधार पर कर्म रुपी कचरों से बने साफ चेन्नई : श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी, चेन्नई में शासनोत्कर्ष वर्षावास में धर्मपरिषद् को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म.सा ने धर्म परिषद् को सम्बोधित करते हुए कहा कि परमात्मा अध्यात्म का संदेश देते है, उसे ग्रहण करने के लिए जरूरी है, 1. पात्र खाली होना चाहिए, 2. साफ होना चाहिए और 3. पात्र में ग्रहण करने की क्षमता भी होनी चाहिए। हमारे भीतर में पात्रता के लिए अन्तर में भरे कषायों से हमारा हृदय मुक्त हो। तपस्या, साधना के आधार पर कर्म रुपी कचरों से साफ करना, भव्य व्यक्ति ही ग्रहण कर जीवन आचरण में ला सकता है। मनुष्य भव साश्वत नहीं है, दुर्लभ है अतः हर समय जागरुकता से पालन करना चाहिए। ह...

आत्मा रूपी मछली कुविकल्प रूपी जालों के द्वारा ही दुर्गति में जाती है: आचार्य उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी ने अध्यात्म कल्पद्रुम ग्रंथ के नवें अधिकार चित्त दमन अधिकार की विवेचना करते हुए कहा जीवन के उतार-चढ़ाव, धूप- छांव, संघर्ष- समाधान की केंद्रीय वस्तु चित्त है। लेकिन अपने चित्त के पास दमन करने के लिए विकल्प नहीं है। चित्त, मन और मति तीनों एक अपेक्षा से समान है। मनन करे वह मन, चिंतन करे वह चित्त, मति व मन में लंबा फर्क नहीं है। ज्ञानी कहते हैं आत्मा राजा है और मन गुलाम है, लेकिन अब यह उलटी गंगा बह रही है। हमारी आत्मा मन का गुलाम बनकर रही है, इसलिए मन का दमन करना जरूरी है। उन्होंने कहा आत्मा का स्मरण भूल जाना अज्ञानता है। विवेक के अभाव में हमारी इंद्रियां थोड़े से आनंद के लिए भटक जाती है। हमारी आत्मा मछली, मन मच्छीमार, जाल कुविकल्प और समुद्र संसार के समान है। आत्मा रूपी मछली कुविकल्प...

कर्मबन्ध के मूल तीन साधन है मन, वचन, काया: गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा 

यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा ने बताया कि कर्मबन्ध के मूल तीन साधन है मन, वचन, काया। भगवान कहते है इन साधनो को शस्त्र कहा है। संसार के समस्त पाप इन्ही से होते है। द्रव्य इन्द्रियो से न कर्म बन्ध होता है ना ही कर्मो की निर्जरा। जैसे ही भाव जुड़ जाते हैं इन्द्रियों के साथ वैसे ही कर्म बन्ध हो जाता है । कर्म बांधते समय जीव को पता नही चलता पर जब कर्म उदय में आते है तो जीव को स्मरण होता है कि मैंने मन वचन काया से कैसे -2 कर्म बांधे है। ज्ञानीजन कहते है कि कर्म बन्ध के लिए प्रवृत्ति आवश्यक नहीं है जीव बैठे-2 सोये-2 ही कर्म बन्ध कर लेता है। कर्मबन्ध के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता नही होती पर कर्मों को आत्मा से अलग करने के लिए अत्यधिक पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। कर्मों से कोई बचा नही सकता क्योंकि स्वयं ने कर्म बाँधे है तो स्वयं की आत्मा को ही कर्म से छु...

आत्मा और शरीर के स्वास्थ्य के लिए जीवन में तपस्या जरूरी : साध्वी नूतन प्रभाश्री जी

उन्होंने बताया कि असली तपस्या वह जो मन और पेट की भूख को सीमित करे Sagevaani.com @चेन्नई। जैन दर्शन में जन्मो-जन्मो के कर्मों की निर्जरा का सबसे आसान और सरल उपाय तपस्या को बताया गया है। 12 प्रकार की तपस्या में सबसे पहला तप अनशन या उपवास है। शरीर के स्वास्थ्य के लिए हर 7 दिन या 15 दिन में हमें एक उपवास अवश्य करना चाहिए। उपवास का अर्थ सिर्फ पेट की भूख को लगाम लगाना ही नहीं है, बल्कि पेट के साथ-साथ मन की भूख को भी सीमित करना उपवास का लक्ष्य होना चाहिए। यह कहना है प्रसिद्ध जैन साध्वी नूतन प्रभाश्री जी का जो आज सोमवार को स्थानीय पोषद भवन में एक धर्मसभा को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि जीवन में तपस्या चलती रहनी चाहिए। धर्मसभा में साध्वी जयश्री जी ने बताया कि भगवान के दर्शन और उनकी वाणी श्रवण से कहीं अधिक लाभ उनके आचरण को अपने जीवन में उतारने से मिलता है। धर्मसभा में सिद्धि तप कर रहीं साध्वी...

जहां आशा है उत्साह है वहीं सफलता है : देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन मूर्तिपूजक जैन संघ में चातुर्मासिक प्रवचन देते हुए पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि मनुष्य को अपना सुखी जीवन जीने के लिए सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। जीवन में रात व दिन की तरह आशा व निराशा के क्षण आते जाते रहते हैं। आशा जहां जीवन में संजीवनी शक्ति का संचार करती है वहीं निराशा मनुष्य को पतन की तरफ ले जाती है। निराश मानव जीवन में उदासीन और विरक्त होने लगता है। उसे अपने चारों तरफ अंधकार नजर आता है। निराशा का संबंध एकतरफा सोच भी है। साथ ही मनुष्य के दृष्टिकोण पर भी आधारित है, मनुष्य जिस तरह की भावनाएं रखता है वैसी ही प्रेरणाएं मिलती हैं। जो लोग स्वयं के लाभ के लिए जीवन भर व्यस्त रहते हैं उन्हें जीवन में निराशा, अवसाद, असंतोष ही परिणाम में मिलता है। यह एक बड़ा सत्य है कि जो लोग जीवन में परमार्थ सेवा एवं जनकल्याण का कार्य करते हैं उनमें आ...

अपने अंदर झांके आपको परमात्मा का स्वरूप दिखेगा: उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया

हमारे भाईन्दर में विराजीत उपप्रवृत्तिनि संथारा प्रेरिका सत्य साधना ज गुरुणी मैया आदि ठाणा 7 साता पूर्वक विराजमान है। वह रोज हमें प्रवचन के माध्यम से नित नयी वाणी सुनाते हैं, वह इस प्रकार हैं। बंधुओं जैसे कि आप अपने अंदर झांकते हैं वह परमात्मा का स्वरूप दिखता है। माना दुनिया की आंखों में धूल झोंक सकते हैं पर याद रखना लाख कोशिश के बावजूद खुद की आंखों में धुल नहीं झोंक सकते हो। उस परम तत्व को धोखा नहीं दे पाओगे। एक दूसरे को धोखा दे सकते हैं लेकिन स्वयं को कब तक धोका दोगे। हमारे साथ अब तक यही होता आया है हम सोचते हैं बंद कमरे में कोई गलत कार्य करेंगे तो उसे कौन देख पाएगा पर इस सत्य को नहीं भुलना चाहिए हमारे भीतर दो सूक्ष्म तत्व है वह परमात्मा का ही स्वरूप तुम्हारे अस्तित्व में जो आता है। सत्ता है वही तो परमात्मा तत्व का आभा है व्यक्ति को यह सच्च समझ लेना चाहिए कि बाहर जो दिखाई दे रहा है अ चेतन...

Skip to toolbar