यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी म सा ने बताया कि कर्मबन्ध के मूल तीन साधन है मन, वचन, काया।
भगवान कहते है इन साधनो को शस्त्र कहा है। संसार के समस्त पाप इन्ही से होते है। द्रव्य इन्द्रियो से न कर्म बन्ध होता है ना ही कर्मो की निर्जरा। जैसे ही भाव जुड़ जाते हैं इन्द्रियों के साथ वैसे ही कर्म बन्ध हो जाता है । कर्म बांधते समय जीव को पता नही चलता पर जब कर्म उदय में आते है तो जीव को स्मरण होता है कि मैंने मन वचन काया से कैसे -2 कर्म बांधे है। ज्ञानीजन कहते है कि कर्म बन्ध के लिए प्रवृत्ति आवश्यक नहीं है जीव बैठे-2 सोये-2 ही कर्म बन्ध कर लेता है।
कर्मबन्ध के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता नही होती पर कर्मों को आत्मा से अलग करने के लिए अत्यधिक पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। कर्मों से कोई बचा नही सकता क्योंकि स्वयं ने कर्म बाँधे है तो स्वयं की आत्मा को ही कर्म से छुटकारा पाने के लिए पुरुषार्थ करना पड़ेगा। मन-वचन-काया से बाँधे गय कर्म मन-वचन- काया से ही भोगना पड़ता है। जैसे नया वस्त्र पड़े पड़े ही महीने में मैला हो जाता है।
उसी प्रकार आत्मा में भी बिना कुछ किये निरन्तर कर्म का आगमन होता रहता है। जैसे जैसे पुरुषार्थ द्वारा मैला कपड़ा पानी साबुन से साफ किया जाता है। उसी प्रकार पुरुषार्थ द्वारा आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल को दूर किया जाता है। 18 पापों का त्याग कर धर्म में पुरुषार्थ कर के ही आत्म शुद्धि की जाती है। धर्म में पुरुषार्थ के बिना सुख प्राप्त नहीं होता। धर्म में पुरुषार्थ करने से पुण्यवान भी बढ़ती है और संसार से निवृति भी मिलती है।
संसार छोड़ने के लिए उम्र की सीमा नहीं है वय निश्चित नहीं है भगवान कहते है 8 वर्ष से 100 वर्ष तक का कोई भी व्यक्ति संयम अंगीकार कर सकता है नवकार मन्त्र भी यदि भाव पूर्ण बोला जाये तो आप संसार से मुक्त हो सकते है। प्रतिक्रमण रूपी साबुन से ही आत्मा की सफाई की जा सकती है।
जैसे घर की सफाई मे प्रमाद नहीं करते है सुबह शाम दो टाइम प्रतिदिन की करते है वैसे ही सुबह- शाम प्रतिक्रमण के द्वारा आत्मा की सफाई करना आवश्यक है। इसलिए भगवान कहते है यदि द्रव्य से प्रतिक्रमण कण्ठस्थ है तो ही भाव पूर्वक प्रतिक्रमण कर आत्मशुद्धि की जाती है।
बिना द्रव्य-भाव प्रतिक्रमण भी नही किया जा सकता। भगवान कहते है। सामायिक भी द्रव्य से करते ही रहो क्योंकि द्रव्य सामयिक या द्रव्य प्रतिक्रमण करते -2 जैसे ही भावों में उत्कृष्टता आ जायेगी वैसे ही कर्म क्षय होने लगेगे । अत: प्रमाद मत करो। हर क्षण जागृत रहो तभी आपके कर्म की निर्जरा होंगी। कर्म से मुक्त हो सिद्ध बुद्ध होने के लिए भगवान ने धर्म का निरुपण किया है।
धर्म चाहे दिखावे के लिए भी कीया तो नुकसान नहीं क्योंकि दिखावे का धर्म जब भविष्य में सच्चे धर्म में बदल कर आत्मा का कल्याणकारी बन जायेगा। जब तक आत्मा के भीतर धर्म प्रवेश नहीं करता तब तक वह दिखावटी रहता है। जैसे ही हृदय में आत्मा में धर्म बस जायेगा तब वह पाप करने लिए अग्रसर नही होगा। इसलिए प्रवचन करने के लिए और भाषण मात्र कहने के लिए होता है। धर्म स्थान कर्म धोने के लिए है कर्म बांधने के लिए नहीं ।