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आत्म समाधि ही आत्म आनन्द है, आत्म ऊर्जा है: आचार्य जिनमणिप्रभसूरिश्वरजी

★ हठाग्रह, कदाग्रह, पूर्वाग्रह से दूर रहने की दी प्रेरणा Sagevaani.com @चेन्नई : श्री मुनिसुव्रत जिनकुशल जैन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्री सुधर्मा वाटिका, गौतम किरण परिसर, वेपेरी, चेन्नई में शासनोत्कर्ष वर्षावास में गच्छाधिपति आचार्य भगवंत जिनमणिप्रभसूरीश्वर म.सा ने उत्तराध्यन सूत्र के चौथे अध्याय के विवेचन में धर्म परिषद् को सम्बोधित करते हुए कहा कि ऐसा जीवन जो टुटने के बाद सधता नहीं है, जीवन की डोर ऐसी है जिसमें गांठ नहीं लगती, जिसमें कोई संधि नहीं होती। एक बार टुटने के बाद किसी भी कीमत पर जोड़ा नहीं जा सकता। ऐसे दुर्लभ, महत्वपूर्ण, अवसरों से भरा, विकल्पों से परिपूर्ण जीवन का उपयोग करना है। यह हमारा मनुष्य जीवन चौराहे के समान है, जहां से हम दशों दिशाओं में से कही भी जा सकते है। बाकी जन्म तो संकड़ी गली के समान ही होते है, जहां से आगे या पिछे जाया जा सकता है। गुरुवर ने प्रतिबोध देते हुए कहा क...

संस्कार विहीन व्यक्ति धन विहीन बटुए के समान होता है : देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई. बिन्नी नोर्थटाउन सोसायटी सुमतिवल्लभ जैन संघ के संघ भवन में जिन वाणी का श्रवण कराते हुए पूज्य आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि संस्कार विहीन व्यक्ति धन विहीन बटुए के समान होता है, जो ऊपर से तो अच्छा लगता है, पर भीतर से खाली होता है। अच्छा व्यवहार करने से हमें कई तरह से मदद मिल सकती है। इसलिए हमें हमेशा दूसरों के प्रति अच्छा व्यवहार करना चाहिए और जीवन में अच्छे संस्कारों का पालन करना चाहिए। अच्छे संस्कार जीवन में आगे बढ़ने की पहली सीढ़ी है। जीवन में सफल होने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, आपको अच्छे शिष्टाचार की आवश्यकता है। अच्छे शिष्टाचार न केवल हमारे आस-पास चीजों को बेहतर बनाएंगे, बल्कि वे लंबे समय में हमारे लिए चीजों को बेहतर भी बनाएंगे। इसके अलावा, अच्छे व्यवहार से अच्छी आदतें पैदा होती हैं और अच्छी आदतें विकास और सफलता की ओर ले जाती हैं। वे आगे ...

हमें समझदार बनकर धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपनी आत्मा को को निर्मल बनाना है: रविन्द्रमुनि जी म सा

  दिवाकर भवन पर जप तप आराधना के साथ विभिन्न धार्मिक गतिविधीयो के साथ पाँच माह का चातुर्मास गतिमान है। प्रतिदिन नवकार आराधक श्रावक श्राविकाओ के साथ ज्ञान जिज्ञासु महानुभव प्रवचनो की श्रंखला के माध्यम से जिनवाणी का श्रवण कर रहे है। प्रवचनो के माध्यम से प्रखर वक्ता मेवाड़ गोरव पुज्यश्री रविन्द्रमुनि जी म सा “नीरज” ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि जब तक आप भोले बनकर रहेंगे तब तक आप समझदार नहीं बन सकते हैं। हमें समझदार बनकर धर्म के मार्ग पर चलते हुए अपनी आत्मा को को निर्मल बनाना है। जिस तरह एक फूल भी मुरझाकर भी अपनी सुगंध छोड़कर जाता है उसी तरह क्या आप भी दुनिया में कुछ छोड़कर जाना चाहते हो। दुनिया में व्यक्ति कैसा भी हो लेकिन श्रद्धांजलि सभा में व्यक्ति की तारीफ की जाती है कैसा जीवन जीने से कोई लाभ नहीं। शाकाहार एवं मांसाहार मानव सभ्यता की दो अलग-अलग विपरित शाखा है जो ...

समाज में व्यक्ति का सबसे बड़ा दायित्व है परमार्थ : देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई. श्री सुमतिवल्लभ नोर्थटाउन श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने कहा कि मनुष्य और समाज, शरीर और उसके अंगों के सदृश हैं। दोनों परस्पर पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का स्थायित्व संभव ही नहीं है। दोनों में आपसी सहयोग परमावश्यक है। मनुष्य की समाज के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी होती है, जिसके बिना समाज सुव्यवस्थित नहीं रह सकता। इसे हम मानव शरीर के उदाहरण द्वारा उचित तरीके से समझ सकते हैं। शरीर के विभिन्न अंग यदि अपना काम करना छोड़ दें तो वह शिथिल और जर्जर हो जाएगा। शरीर को स्वस्थ व सुदृढ़ बनाने के लिए प्रत्येक अंग का कार्यरत और क्रियाशील होना जरूरी है। ठीक यही स्थिति समाज के लिए आवश्यक है। समाज को समुचित स्थिति में रखने के लिए प्रत्येक मनुष्य में अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिए क्रियाशीलता अपेक्षित ह...

   पुण्य पाप की फलश्रूति बहोत कुछ है: आगमश्रीजी म.सा.

 श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ कम्मनहल्ली में कर्नाटक तप चंद्रिका प.पू. आगमश्रीजी म.सा. ने कहां महा पुण्योदय से शासन मिला, इस शासन में क्या-क्या है यह पूछना ही नहीं है। इसमें नौ तत्वों का अद्भुत खजाना है। कर्मों की बेजोड़ फिलॉसाफी, आत्मा परमात्मा के स्वरूप की जानकारी है। पुण्य पाप की फलश्रूति बहोत कुछ है पर हमें ज्यादा से आगे बढ़ना है। प.पू. धैर्याश्रीजी म.सा. ने बताया इसे इबादत करें, बगावत नहीं। इंसान की जिंदगी बंदगी करने के लिए मिली है, गंदगी फैलाने के लिए नहीं। मंत्री हस्तीमल बाफना ने अभिवादन किया। अध्यक्ष विजयराज चुत्तर ने संचालन ने किया।

धर्म ही एक मात्र शरण, जो करे सब दुखो का वरण: जयतिलक मुनिजी

नार्थ टाउन में गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने बताया कि जब आत्मा निज स्वरूप में रमन करने लगती है तो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होने लगता है। प्रश्न ये है आत्मा भोग रही या शरीर । उत्तर है वेदना तो शरीर को मिलती है। पर शरीर जड है इसलिए आत्मा को दुख की अनुभूति होती है जिससे आर्त ध्यान रौद्र ध्यान आत्मा करती है। और कर्म बन्धन होते रहते हैं। ज्ञानी जन कहते हैं यदि चार कषायों का शमन कर लिया जाये तो कर्म बन्धन रूक जायेगे। जैसे पारस पत्थर में लोहे को सोना बनाने का सामर्थ्य है। पर यदि लोहे पर मिट्टी का लेप आ जाये तो पारस पत्थर का स्पर्श पाकर भी वह सोना नही बन पायेगा! वैसे ही आत्मा में अनन्त साम्थर्य है जिससे मोक्ष प्राप्त हो सकता है। पर कर्म आवरण की वजह से आत्मा बेभान हो जाती है। और आत्मा को अपने साम्थर्य का बोध नही होता है। अत: ज्ञानीजन कहते है कि कर्म आवरण को हटाने का पुरुषार्थ करो जिससे आत्मा की अनन्त शक्त...

सम्मान समारोह में भावुक हुईं साध्वी पूनमश्री, कहा- पिता और बुआ की कृति हूं मैं

सिद्धि तप करने पर तपस्वी रत्ना की उपाधि से हुईं सम्मानित, निकली भव्य शोभायात्रा शिवपुरी। सिद्धि तप की पूर्णाहूति पर आयोजित समारोह में साध्वी पूनमश्री जी ने भावुक होकर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि सिद्धि तप का पूरा श्रेय मेरे पिता, मेरे गुरू और मेरी गुरूणी को है जिनके आशीर्वाद के बिना तप करना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं अपने पिता और सांसारिक बुआ तथा आध्यात्मिक गुरूणी मैया की कृति हूं। मुझे अपने गुरू पूज्य सौभाग्यमल जी म.सा. का भी बहुत आशीर्वाद मिला है। उनके कई प्रत्यक्ष चमत्कार मैं स्वयं देख चुकी हूं। सिद्धि तप पूर्ण करने पर श्वेताम्बर जैन श्रीसंघ ने साध्वी पूनमश्री जी को तपस्वी रत्ना की उपाधि से अलंकृत किया। सम्मान समारोह से पूर्व पाश्र्वनाथ श्वेताम्बर जैन मंदिर से तपस्वी साध्वी पूनमश्री जी म.सा. की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में जैन धर्मावलंबियों ने ...

जो साधक सत्य रस्ते पर सम्यक भाव से चलता है उसे सत्य मिलता ही है: डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.

     🛕 *स्थल: श्री राजेन्द्र भवन चेन्नई*  🪷 *विश्व वंदनीय प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहब के प्रशिष्यरत्न राष्ट्रसंत, दीक्षा दाणेश्वरी प.पू. युगप्रभावक आचार्य श्रीमद् विजय जयंतसेनसुरीश्वरजी म.सा.के कृपापात्र सुशिष्यरत्न श्रुतप्रभावक मुनिप्रवर श्री डॉ. वैभवरत्नविजयजी म.सा.* के प्रवचन के अंश    🪔 *विषय श्री अभिधान राजेंद्र कोष भाग 7*🪔 ~ जो साधक स्वयं के अंतःकरण, गुणों के अनुभव, परिवर्तन से जुड़ता है उसका मानव जीवन, धर्म, ज्ञानी भगवान सफल कहते हैं। ~ जब हम कोई भी क्रिया रस पूर्वक करते हैं तब उसके संस्कार भावों भाव तक हमें साथ देते ही हैं। ~ जो साधक सत्य रस्ते पर सम्यक भाव से चलता है उसे सत्य मिलता ही है। ~ परम पूज्य प्रभु महावीर स्वामी ने जगत को बोध दिया कि परमात्मा केवल मार्ग को समझाने वाले हैं लेकिन चलना तो हमें ही पड़ेगा । ~प. प. प्रभु श्रीमद् विजय राजेंद्र सूरीश्वरजी मह...

41 उपवास की तपस्या गतिशील है

मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले मे स्थित खाचरौद नगर में मालव केसरी श्री सौभाग्य मल जी म.सा.के सुशिष्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी म.सा.आदि ठाणा 3 के सानिध्य में तपस्या के ठाठ लगे है।चातुर्मास काल के मात्र लगभग एक माह के काल में ही दो मासक्षमण की पूर्णाहुति हो चुकी है तथा एक तपस्वी के 41 उपवास की तपस्या गतिशील है। खाचरोद संघ के वरिष्ठ सदस्य श्री सुशील जी कल्पना जी बुपक्या की पुत्रवधू एवं सुमीत जी बुपक्या की धर्म सहायिका मासक्षमण तपस्वी श्रीमती राजनन्दिनी जी बुपक्या के मासक्षमण तप की पूर्णाहुति पर श्रावक संघ खाचरौद के अध्यक्ष श्री मनोहर लाल भटेवरा, चातुर्मास समिति अध्यक्ष श्री पारस सिसोदिया स॔घ के सचिव महेंद्र चण्डालिया, संघ के कोषाध्यक्ष अनिल छाजेड, चंद्रप्रकाश चौरड़िया, बाबूलाल जी भटेवरा, श्रेणीक खेमसरा, राकेश चण्डालिया, राजेन्द्र छाजेड, संतोष बरखेडा वाला, ऋतुराज बुडावन वाला सहित बडी संख्या मे ...

तन में स्वस्थता- तपस्या तन, मन, जीवन, को शुद्ध करती है: प्रकाश मुनि जी

सौभाग्य प्रकाश संयम सवर्णोत्सव चातुर्मास खाचरोद जीवन में चार -→ चीजे मीलना दुर्लभ है- तन मे स्वस्थता, मन मे प्रसन्नता, जीवन में शांति , परिवार का प्रेम यह बात बताते हुए पूज्य प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनि जी महाराज साहब ने फरमाया कि.. 1- तन में स्वस्थता- तपस्या तन, मन, जीवन, को शुद्ध करती है। नंद गुरु के घर में आनंद है, आज नंदनी सुमित जी बुपक्या के 30 उपवास है ,परिवार के प्रेम के बिना, सहयोग के बिना पतस्या नहीं होती। साता पूछने में मजा कि साता पुछवाने में मजा ! तप से तन शुद्ध होता है लंघम परम औषधे- तप ऐसी दवा है जो शरीर व कर्मो की गंदगी को साफ करती है। गुरुदेव कहते थे कैंसर हो जाय तो 8 उपवास कर लो । लकवा हो जाये हो 72 घंटे का चोविहार तेला कर लो । तपस्या से शरीर शुद्ध, सुंदर हो जाता है, और वह जीव मोक्ष का आराधक बन जाता है। 2- मन मे प्रसन्नता- मन में खुशी हो तो चेहरे पर चमक दिखती है चहरे पर मुस्...

जिनवाणी से मन पवित्र होता है,और आत्मा पवित्र बनती है: साध्वी प्रितीसुधा

Sagevaani.com @भीलवाड़ा। जिनवाणी को सुनने से मन पवित्र होता है और आत्मा शुध्द बनती है। गुरूवार अहिंसा भवन शास्त्री नगर मे प्रंखर वक्ता डॉ. प्रिती सुधा ने सैकड़ों श्रध्दालूओं को धर्म उपदेश देतें हुए कहा कि जिनवाणी सुनने से मनुष्य की जीवन कि शैली में बदलाव आता है। श्रवण करने से वास्तविक मनुष्य जन्म के जीवन के सार को जानकर अपने विचारों को शुद्ध बनाकर जीवन मे परिवर्तन करके मानव जीवन को मनुष्य सार्थक बना सकता है। जीनवाणी ही वो मार्ग है जिसे मनुष्य भीतर मे उतारले और धर्म के मार्ग पर चले तो शास्वत सुख को प्राप्त कर सकता है। परमात्मा की वाणी को आत्मसात किये बिना कौई भी प्राणी आत्म उत्थान नहीं कर पाएगा। जिनवाणी से व्यक्ति आत्मा के अशुम कर्मो के बंधन छुड़वा सकता है। साध्वी संयम सुधा ने कहा कि जीनवाणी ही वो मार्ग है जिससे श्रवण करके मनुष्य आत्म कल्याण का मार्ग प्राप्त कर सकता है। अहिंसा भवन के मुख्य मार...

सामायिक की साधना से मनुष्य मे समभाव आ सकते है: महासाध्वी धर्मप्रभा

Sagevaani.com @चैन्नाई । सामायिक की साधना आत्मा की साधना है। गुरूवार एस.एस.जैन भवन साहूकार पेठ में महासाध्वी धर्मप्रभा ने श्रध्दालुओं को धर्म उपदेश दे हुए कहा कि सामायिक की साधना से मनुष्य मे समभाव आ सकते है । जीवन मे समभाव आ जाऐंगे तो आत्मा शुध्द और पवित्र बन जाएगी। सामायिक शुध्द भाव से होने पर ही समभाव आयेगें सामायिक एक साधना है, जीवन पद्धति है, अकुशल मन को कुशल बनाने की कला है। अवगुणों को खो दिया तो समभाव स्वयं प्रकट हो जायेगे। एकान्त रूप से शांति से अभिलाषा रहित सामायिक हमारी शुद्ध हो जाएगी। हमारे बाहरी अवगुण जैसे आए है वैसे ही चले जाएंगे। आत्मा का निज गुण है समभाव वो सामायिक से ही प्राप्त किया जा सकता है । धर्म तो सिर्फ हमारी आत्मा को धोने का कार्य करता है। लेकिन मन वचन काया को साधने का साधन हमारी सामायिक है। यदि सामायिक से आत्मा में समभाव आ गये तो गृहस्थ भी साधु है मोक्ष प्राप्त कर स...

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